प्रिय साथियों;  १३ जुलाई  २०११ की शाम न केवल मुम्बई वासियों के लिए,
 अपितु सभी भारत वासियों के लिए दर्द भरा वह अहसास छोड़ गयी है,
 जिस के ज़ख्म को भर पाना वक़्त के किसी भी मरहम के लिए असंभव है.
किसे पता था की जो लोग उस शाम् बाज़ार में अपने भविष्य के ख़्वाबों की
ताबीर खरीदने निकले थे,
 खुद उनका जीवन परिवार वालों के लिए एक अधूरा स्वप्न बन कर रह जाएगा.
         क्योंकि उस शाम उनके जीवन काल के कपाल पर दरिंदगी और बर्बरता के
पुजारियों ने
 मौत की मोहर लगा दी है, यह कैसी खुनी प्यास है?  जो इतना लहू पीकर भी
बुझने को तैयार नहीं है.
 यह कैसा मौत का खेल है? जो असंख्य जिंदगियों को दांव पर लगाकर भी खत्म
होना नहीं चाहता?.
 कोइ तो पूछे मौत के इन सौदागरों   से, क्या मिलता है इन्हें? निर्दोष
इंसानियत का खून बहाकर?
किस लालच में इंसानी जानों का सौदा बे रहम मौत के सौदागरों से किया जाता है?.
 क्या कुसूर है उनका, जिन्हें असामायिक    मौत की गोद में सुला दिया गया है?
शायद; उन बेगुनाह मनुष्यों को इस जुर्म की सज़ा मिलती है, की उनका कोई
जुर्म ही  नहीं?
यह,  और इन जैसे अनेकों प्रश्न, अभी तक अनुत्तरित  हैं.
आएये , इन सभी प्रश्नों के उत्तर ढूँढने का प्रयास एकजुट होकर करें,
 और यह दिखा दें आतंकियों को,      की भारत को कमज़ोर कर पाना असंभव है.
इसी प्रका का सन्देश देता हुआ एक गीत आज मैं आपको दे रहा हूँ, जिसे
स्वर्गीय हरीन्द्र नाथ चट्टोपाध्याय ने लिखा है, तथा स्वर्गीय रफ़ी  साहब
ने गाया है.
     http://www.sendspace.com/file/fvp6ip
 सैफ
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