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   Himanshu 
Kumar<https://www.facebook.com/himanshukumardantewada?hc_location=timeline>
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     आदिवासियों के संसाधनों पर पैसे वाली कंपनियों के कब्ज़ा कर लेने और
   आदिवासियों को उनके अपने ही घर से भगा देने का मुद्दा इस देश के लिये कोई बड़ी
   समस्या नहीं बन पा रहा है .

   यह बात सच है कि हम तभी चेतते हैं जब समाज में किसी मुद्दे पर कहीं हिंसा
   होती है . विनोबा का भूदान आन्दोलन भी भूमि को लेकर फैले हुए अन्याय और उससे
   उत्पन्न होने वाली हिंसा में से ही निकला था .

   अभी आदिवासी इलाकों में अमीर कंपनियों के ...लोभ के लिये करोड़ों आदिवासियों
   के जीवन , आजीविका और सम्मान पर हमला जारी है ,

   भारत को एक राष्ट्र के रूप में सोचना पड़ेगा कि यह देश अपने मूल निवासियों
   के साथ क्या सुलूक करेगा ?

   क्या हम आदिवासियों की ज़मीनों पर पुलिस की बंदूकों के दम पर कब्ज़ा जायज़
   मानते हैं ? क्या हम मानते हैं कि आदिवासियों की बस्तियों में आग लगा कर
   उन्हें उनके गाँव से भगा कर उनकी ज़मीनों पर कब्ज़ा करने के बाद हम इस देश में
   शांति ला सकते हैं ?

   एक बार हमें अगर अपने ही देशवासियों के साथ अन्याय करने की आदत पड़ गई तो
   क्या यह आदत हमें किस किस के साथ अन्याय करने का रास्ता नहीं खोल देगी ?

   आज हम आदिवासी पर हमला करेंगे ,फिर हम दलितों को मारेंगे, फिर हम गाँव
   वालों को मारेंगे . और एक दिन हम चारों तरफ से दुश्मनों से अपने ही बनाये गये
   दुश्मनों से घिर जायेंगे .

   इसलिये आज ही हमें आदिवासियों के साथ हमारे सुलूक की समीक्षा करनी चाहिये .

   मेरी विनम्र कोशिश है कि इसी मौके को हम आदिवासियों के साथ इस देश को कैसा
   सुलूक करना चाहिये इस मुद्दे पर सोचने के रूप में सदुपयोग करें .

   इस मुद्दे पर आत्म चिंतन करने के लिये मैं एक जून से जंतर मंतर पर एक उपवास
   शुरू करने का प्रस्ताव करता हूं .

   इस दौरान सामान मन के साथी अपने अपने क्षेत्र में इस विषय में कार्यक्रम और
   चर्चा करेगे तो हम देश भर में न्याय के पक्ष में और अन्याय के विपक्ष में एक
   माहौल तैयार कर पायेंगे .

   इस विषय पर आपके सुझाव का स्वागत है .

   हिमांशु कुमार

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