​How many Adivasi Brother & sistes are qualified in ITI?
From Thana District Maharastra only .
Any Record as do we have .

Thanks' & Regards,
Dhaval H. Raut.
.

(9930869119)

2015-04-14 21:26 GMT+05:30 AYUSH Adivasi Yuva Shakti <[email protected]>:

>
> ।। एक तीर एक कमान सभी आदिवासी एक समान ।।
>
> ।। अस्पतालों में भ्रष्टाचार की गोलीयाँ खाकर नसबंदीें से मरती वो हर माताएं
> आदिवासी है।
> नक्सली कांड की गोलियां खाकर मरता हुआ वो हर जवान भी आदिवासी है। भूमि
> अधिग्रहण से मरता हुआ वो हर किसान भी आदिवासी है
> ये संयोग नहीं साजिश है । उठो संघर्ष करो। यह अस्तित्व की लड़ाई है ।।
>
> माओवादियों के सामने विधि का शासन ध्वस्त है और उनकी संगठित हिंसा अब राज्य
> सरकारों पर भारी पड़ रही है। आज लगभग 1200 गांवों के एक हजार वर्ग किलोमीटर
> क्षेत्र में माओवादी रणनीति के सामने पुलिस व प्रशासन पूर्ण रूप से विवश हैं।
> इससे यह जरूर साबित हो जाता है कि सरकारी खुफिया तंत्र के मुकाबले नक्सलियों
> का अपना तंत्र काफी मजबूत है। नक्सलवाद वर्ग विषमता व अन्याय के विरुद्ध है।
> यह किसानों, भूमिहीन कृषकों व श्रमिकों का पक्षधर भी है। खासतौर पर उनका जिनका
> शोषण जमींदार, महाजन, नेता और नौकरशाही करती है। इसलिए नक्सलवादी विचारधारा इस
> भ्रष्ट, अनैतिक व अनाचारी व्यवस्था को समाप्त करते हुए एक भेदभाव रहित समाज
> बनाने का स्वप्न संजोए हैं।
> ऐसा लगता है जैसे नक्सलवाद की समस्या को अभी तक समझने का प्रयास नहीं किया
> गया। सरकारों ने पुलिस अथवा केंद्रीय बलों के दमनकारी दृष्टिकोण के चलते
> नक्सलवादी आंदोलन को दबाने का प्रयास किया है। सरकारों के सामने नक्सलवाद को
> लेकर हमेशा ही यह दुविधा रही है कि इसे कानून व्यवस्था की समस्या माना जाए
> अथवा एक सामाजिक-आर्थिक समस्या। आज तक नक्सलवादी आंदोलन का दमन करने के
> सरकारों के जो भी प्रयास किए गए उनसे नक्सलवाद पर अंकुश लगने के बजाय, उल्टे
> हिंसक गतिविधियों में वृद्धि तथा उनके प्रभाव में विस्तार ही हुआ है। लगता है
> कि पिछले दो दशकों में गरीबों, बेरोजगारों, भूमिहीन कृषकों की संख्या में
> वृद्धि, भूमि-वितरण में असमानता तथा आदिवासियों के स्थानीय अधिकारों से बेदखली
> के मामले जैसे-जैसे बढ़ रहे हैं, उसी अनुपात में नक्सलवाद की समस्या भी बढ़
> रही है। 2002 में जहां नक्सलवादी हिंसा की 1465 घटनाएं हुईं, वहीं 2003 में
> इनकी संख्या 1597 और 2004 में यह आंकड़ा बढ़कर 1800 हो गया। 2005 से लेकर 2008
> तक नक्सली घटनाओं में थोड़ी कमी देखने को मिली, परंतु 2009-10 के बीच इनमें फिर
> चार फीसद की वृद्धि हो गई। वर्तमान 2012-13 से जुड़े सरकारी आंकड़े नक्सली
> घटनाओं में कमी का दावा कर रहे हैं। इंस्टीटयूट ऑफ डिफेंस रिसर्च एंड एनालिसिस
> की रिपार्ट भी खुलासा करती है कि पिछले कुछ सालों में नक्सलवाद के स्वरूप में
> बदलाव देखने को मिला है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि नक्सली हिंसा में मामूली
> कमी तो आई है, परंतु इसके प्रभाव में विस्तार भी हुआ है। 28 मई, 2013 को गृह
> मंत्रालय से जुड़ी संसद की स्थायी समिति ने भी साफ कहा कि वामपंथी उग्रवाद भारत
> की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा है।
> नक्सलवाद प्रभावित क्षेत्रों का दौरा करने वाले लोग भली-भांति जानते हैं कि
> स्थानीय लोगों के दिलों में नक्सलवादियों के प्रति सम्मान है। नक्सलियों का
> अपना कोई हित नहीं हैं। वे एक विचारधारा की लड़ाई लड़ रहे है। उनका आंदोलन उल्फा
> व बोड़ो की तरह न तो कोई पृथकतावादी आंदोलन है और न ही जाति, धर्म व अर्थपरक।
> परंतु यहां यह बात ध्यान देने योग्य है कि नक्सली संगठनों को स्थानीय स्तर पर
> प्रथकतावादी संगठनों से भी अधिक समर्थन प्राप्त है।
> उन कारकों पर विचार करना समय की मांग है कि आखिर यह विचारधारा वहां के लोगों
> में अपनी गहरी पैठ क्यों बना रही है? देश में लगभग 56 नक्सली गुट मौजूद हैं,
> जिनमें 50,000 से ज्यादा नक्सली सक्रिय हैं। इनमें 22,000 से अधिक आधुनिक
> हथियारों से लैस हैं। देश के वनों का एक तिहाई से भी अधिक भाग इनके कब्जे में
> है। स्त्री पुरुष व बच्चे तक इन गुटों के सक्रिय सदस्य हैं। गरीबी रेखा से
> नीचे अपनी गुजर-बसर करने वाले आदिवासियों की औसत आमदनी रोजाना 12 रुपये है।
> उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पश्चिमी बंगाल, ओडीशा, बिहार, झारखंड, छत्ताीसगढ़,
> आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र व कर्नाटक जैसे 20 राच्यों के 230 जनपदों में नक्सली
> पार्टियां बनी हैं। दुर्भाग्यपूर्ण सच्चाई यह है कि इन राज्यों में खदानों के
> मालिक और ठेकेदार स्थानीय आदिवासियों का खुलकर शोषण और उत्पीड़न करते हैं।
> नक्सलवादी उद्योगपतियों, व्यापारियों और सरकारी अफसरों तक से वसूली करते हैं।
> एक मोटे अनुमान के अनुसार नक्सलवादियों का सालाना बजट करीब चार हजार करोड़
> रुपये है। इस धन से वे आधुनिक हथियार और विस्फोटक सामग्री खरीदकर अपने संगठन
> का विस्तार करते हैं। दुखद पहलू यह है कि नक्सली पुलिस व प्रशासनिक भ्रष्टाचार
> का फायदा उठाते हुए अपने कैडर का विस्तार कर रहे हैं। विगत चार दशकों में यदि
> देश में नक्सलवाद फला-फूला है तो इसके लिए राज्य सरकारों के साथ ही केंद्र
> सरकार भी जिम्मेदार है। आदिवासियों के साथ में यदि वहां अन्याय हुआ है तो शोषक
> के रूप में उन्हें अपनी जिम्मेदारी स्वीकारनी ही पड़ेगी। अब समय आ गया है जब
> राच्य व केंद्र सरकार को राष्ट्रहित में माओवादियों पर अंकुश लगाने में सख्ती
> से काम करना चाहिए। सच यह है कि नक्सलवादी विचारधारा सीधे तौर पर सामाजिक शोषण
> व आर्थिक असमानता से जुड़ी है। इसलिए सरकारों को आंकड़ों की बाजीगरी से अलग रहते
> हुए इन बिंदुओं पर भी गहन मंथन करने की आवश्यकता है। इससे भी आगे बढ़कर
> विस्थापित आदिवासी समाज के दबे-कुचले व वंचित लोगों के लिए ईमानदारी व
> प्रतिबद्धता से किए किए गए सघन विकास कार्य नक्सली विचारधारा पर अंकुश लगाने
> में कारगर उपाय हो सकते हैं।
>
> ‪#‎सेवा_जौहार‬
> <https://www.facebook.com/hashtag/%E0%A4%B8%E0%A5%87%E0%A4%B5%E0%A4%BE_%E0%A4%9C%E0%A5%8C%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B0?source=feed_text>
> । ॠषि कुमार मरावी §
>
>
>
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> सर्व शिक्षित/अशिक्षित बेरोजगार आदिवासी तरुण तरुणी साठी "स्थानिक आदिवासी
> बेरोजगार मेळावा"
> (१४/०४/२०१५ सकाळी १० वाजता) स्थळ कासा, तालुका डहाणू, जिल्हा पालघर.
> संपर्क | 9960 879 780 | 9272 275 794 | 9158 171 137 | www.jago.adiyuva.in
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