राजकीय जनजातीय हिजला मेला महोत्सव,आदिवासी हुनर,गरीबी, आप और हम


राजकीय जनजातीय हिजला मेला महोत्सव,आदिवासी हुनर,गरीबी, आप और हम :
आज राजकीय जनजातीय हिजला मेला महोत्सव का पहला दिन है.एक बुजुर्ग संताल 
आदिवासी बजल मुर्मू जो गोपीकांदर प्रखंड के दुर्गापुर गांव से बहुत उत्साह के 
साथ लकड़ी का पोपलेन बना कर प्रदर्शनी के लिय बना कर लाये थे.आज अचानक उनसे 
मेला परिसर में स्थित दिसोम मारंग बुरु थान(संतालों का पूज्य स्थल) में भेट हो 
गयी.उसने कहा मै इसका प्रदर्शनी करना चाहता हूँ.मैंने कहा तत्काल आप यही 
प्रदर्शनी लगाये.मै देखता हूँ आपके लिय क्या कर सकता हूँ ?मैंने मेला के सह 
संयोजक श्री गौरी कान्त झा से कहा सर इसके लिय क्या किया जा सकता है ? उसने 
कहा कही खाली है तो प्रदर्शनी लगा सकते है.मैंने कहा इस तरह के प्रदर्शनी 
लगाने से किसी तरह के प्रोत्साहन राशि दी जाती है?उसने कहा नहीं इसके लिय कोई 
प्रोत्साहन राशि नहीं दिया जाता है.मैंने यह बात उस बुजुर्ग आदिवासी को 
कहा.उसपर वह मायूस हुआ.उस समय करीब 5.30 pm हो रहा था.वह कुछ सामान मेला से 
खरीद कर घर के ओर निकल रहा था.मैंने कहा चलिय आपको कुछ नाश्ता करा दूँ. नाश्ता 
दुकान में हमलोगों ने चार्ट का ऑर्डर दिया,मैंने उन्हें खाने को कहा और मै 
कागज कलम लेकर उसका इन्टरवियु लेने लगा.मैंने उनसे पूछा आखिर कैसे आप यहाँ 
प्रदर्शनी के लिय आ गए.उसपर उसने कहा शिकारीपाड़ा के एक शिक्षक ने कहा था इस 
प्रदर्शनी के लिय.मैंने पूछा आपको इसको बनाने में कितना समय लगा ?उसने कहा दो 
से तीन सप्ताह तक लगा.मैंने पूछा आखिर आप क्या सोच कर यह प्रदर्शनी के लिय 
आये?उसने कहा झारखण्ड के लोग यह जान पाए हम संताल आदिवासियों में भी इस तरह का 
हाथ का कला है.प्रदर्शनी लगाने से मेरा फोटो भी आयेगा और कुछ पैसे भी 
मिलेगे.मैंने उसके घर-परिवार के बारे में भी पूछा.दो बच्चे है और तीसरा पास 
है.मैंने पूछा आपका अंतिम बस कब है,उसने कहा करीब 6 बजे हमारे गांव से बस 
गुजरती है.तो मैंने कहा अभी तो 5.30 pm हो रहा है,गाड़ी तो नहीं मिलेगी.तो आप 
कहा रहियेगा और खाना खायेगे ?तो मैंने उसे मेला में स्थित एक दुकान में में 
गया जहाँ युवा अपना दुकान सजाने में व्यस्त थे.पहुचने पर डोबोह जोहार हुआ.उसके 
बाद मैंने उन युवाओ को कहा भाई यहाँ सोने का व्यवस्था हो जायेगा.उसपर युवा 
बच्चे लोग बोले जरुर.उसके बाद मैंने पूछा तुमलोग खाना कहा खाओगे ?वे बोले खाना 
तो यही बनायेगे.तो मैंने कहा इस बुजुर्ग के साथ मेरे लिय भी खाना बनादो.मैंने 
चावल और अंडे के लिय पैसे दिए.हमलोगों ने खाना बनाया और खाना खाया.इस बीच 
बुजुर्ग ने बच्चों के दुकान सजाने में मदद किया.और हाँ मै कुछ भूल रहा हूँ इस 
बुजुर्ग ने दिसोम मांझी थान मरम्मत करने में भी मदद किये.उस बुजुर्ग को घर 
जाने के लिय पैसे दिए और उसे सुलाकर मै अपने घर निकल चला.रास्ते में मै यह 
सोचते रहा आखिर ग्रामीणों को कब अपना इस तरह के हुनर को दिखाने का मौका मिलेगा 
?






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