Bahut bahut dhanyavad sir On 21-Jan-2016 12:27 pm, "Shreenivas Naik" < [email protected]> wrote:
> गीतांजलि का काव्यात्मक हिन्दी रूपान्तर... > > प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश > ‘गीतांजलि’ गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर (1861-1941) की सर्वाधिक प्रशंसित और > पठित पुस्तक है। इसी प्रकार उन्हें 1910 में विश्व प्रसिद्ध नोबेल पुरस्कार भी > मिला । इसके बाद अपने जीवन काल में अपने पूरे जीवन काल में वे भारतीय साहित्य > पर छाए रहे है। साहित्य की विभिन्न विधाओं, संगीत और चरित्र कला में सतत् > सृजनरत रहते हुए उन्होंने अन्तिम साँस तक सरस्वती की साधना की और भारतवासियों > के लिए गुरू देव के रूप में प्रतिष्ठित हुए। > प्रकृति, प्रेम ईश्वर के प्रति निष्ठा, और मानवतावादी मूल्यों के प्रति > समर्पण भाव से सम्पन्न गीतांजलि के गीत पिछली एक सदी से बांग्लाभाषी जनों की > आत्मा में बसे हुए हैं। विभिन्न भाषाओं में हुए इसके अनुवादों के माध्यम से > विश्व भर के सह्रदय पाठक इसका रसास्वादन कर चुके हैं। > प्रस्तुत अनुवाद हिंदी में भिन्न है कि इसमें मूल बांग्ला रचनाओं के > गीतात्मकता को बरकरार रखा गया है, जो इन गीतों का अभिन्न हिस्सा है, इस गेयता > के कारण आप इन गीतों को याद रख सकते हैं। > तुम्हें रहूँ, प्रभु ! अपना सतत बनाए, इतना-सा ही मेरा ‘मैं’ रह जाए। > तुम्हें निरखता हूँ प्रत्येक दिशा में, अर्पित कर सर्वस्य मिलूँ मैं तुम से; > प्रेम लगाए रहूँ अहर्निश तुम में,इच्छा मेरी इतनी सी रह जीए। > तुम्हें रहूँ प्रभु ! अपना सतत बनाए।। > तुम्हें रखूँ मैं कहीं ढक करके, इतना सा ही मन मेरा बचा रहे। > प्राण-भरित हो लीला,नाथ ! तुम्हारी, रखे हुए हो मुझे इसी भाव से में; > बँधा रहूँ तव-पाश में चिर मैं, इतना-सा ही बन्धन मेरा रह जाए। > तुम्हें रहूँ प्रभू ! अपना सतत बनाए।। > > आमुख > > बँगला भाषा की ‘गीतांजलि’ विश्वविश्रुत कवि रवीन्द्रनाठ ठाकुर (1861-1941 ई.) > की कालजयी कृति है जिस पर उन्हें साहित्य के क्षेत्र में विश्व का सर्वोच्च > ‘नोबेल पुरस्कार’ प्राप्त करने का गौरव उपलब्ध रहा है। वस्तुतः विश्व-साहित्य > की एक अपूर्व/अमूल्य निधि है ‘गीतांजलि’। > > ‘गीतांजलि’ के गीतों के अनुवाद अनेक भाषाओं में हुए हैं। उसके कुछ गीतों के > अंग्रेजी अनुवाद मैंने पढ़े हैं, परन्तु उनके हिन्दी-अनुवाद, जो विभिन्न > साहित्यकारों द्वारा किए गए हैं, मैं अब तक देख नहीं पाया हूँ। हाँ, पिछले > दिनों मेरे एक मित्र ने उस पुस्तक के कुछ गीतों के अनुवाद सन्ताली भाषा में > किए हैं जिन्हें संशोधित करने के क्रम में मैं उन गीतों के पद्यात्मक अनुवाद > हिन्दी में करने को उत्प्रेरित हुआ जिसका परिणाम प्रस्तुत रचनाओं के रूप में > है। > विश्वभारती-ग्रन्थ-विभाग, कोलकत्ता द्वारा प्रकाशित बँगला ‘गीतांजलि’ की जो > प्रति मेरे पास है उसमें कुल 157 गीत हैं। उनमें से जो गीत आत्माभिव्यंजन, > अध्यात्म-चिन्तन, जीवन-दर्शन, प्रकृ़ति-चित्रण, भाव-प्रकाशन आदि की दृष्टि से > मुझे ‘विशिष्ट’ लगे उन 138 गीतों के अनुवाद मैंने इस संग्रह में संकलित किए > हैं। शेष तीन गीत रबि बाबू की अन्य तीन पुस्तकों से हैं। > > मेरे द्वारा अनूदित ये सभी गीत लयात्मक और छन्दोबद्ध हैं। यद्यपि इनमें > अन्त्यानुप्रास के निर्वाह का कोई आग्रह नहीं है ताकि मूल बँगला गीतों की > भाव-सम्पदा की सुरक्षा में कोई व्यवधान न पड़े। > प्रस्तुत अनूदित गीतों का प्रकाशन राधाकृष्ण प्रा. लि. नई दिल्ली द्वारा किया > जा रहा है जिसके लिए मैं अपना हार्दिक आभार उक्त प्रकाशन-संस्था के प्रति > अभिव्यक्त करना चाहूँगा। आशा है, हिन्दी-जगत में इन अनुवादों का स्वागत होगा। > इति शुभम् ! > 21 नवम्बर, 2002 ई. > > -डॉ. डोमन साहु ‘समीर > > (1) > > मेरा माथा नत कर दो तुम > अपनी चरण-धूलि-तल में; > मेरा सारा अहंकार दो > डुबो-चक्षुओं के जल में। > गौरव-मंडित होने में नित > मैंने निज अपमान किया है; > घिरा रहा अपने में केवल > मैं तो अविरल पल-पल में। > मेरा सारा अहंकार दो > डुबो चक्षुओं के जल में।। > > अपना करूँ प्रचार नहीं मैं, > खुद अपने ही कर्मों से; > करो पूर्ण तुम अपनी इच्छा > मेरी जीवन-चर्या से। > चाहूँ तुमसे चरम शान्ति मैं, > परम कान्ति निज प्राणों में; > रखे आड़ में मुझको > आओ, हृदय-पद्म-दल में। > मेरा सारा अहंकार दो। > डुबो चक्षुओं के जल में।। > ----------------------------- > (आमार माथा नत क’रे दाव तोमार चरण धूलार त’ ले।) > > (2) > > विविध वासनाएँ हैं मेरी प्रिय प्राणों से भी > वंचित कर उनसे तुमने की है रक्षा मेरी; > संचित कृपा कठोर तुम्हारी है मम जीवन में। > > अनचाहे ही दान दिए हैं तुमने जो मुझको, > आसमान, आलोक, प्राण-तन-मन इतने सारे, > बना रहे हो मुझे योग्य उस महादान के ही, > अति इच्छाओं के संकट से त्राण दिला करके। > > मैं तो कभी भूल जाता हूँ, पुनः कभी चलता, > लक्ष्य तुम्हारे पथ का धारण करके अन्तस् में, > निष्ठुर ! तुम मेरे सम्मुख हो हट जाया करते। > > यह जो दया तुम्हारी है, वह जान रहा हूँ मैं; > मुझे फिराया करते हो अपना लेने को ही। > कर डालोगे इस जीवन को मिलन-योग्य अपने, > रक्षा कर मेरी अपूर्ण इच्छा के संकट से।। > ------------------------------------------------- > (आमि / बहु वासनाय प्राणपणे चाइ...। ) > > (3) > > अनजानों से भी करवाया है परिचय मेरा तुमने; > जानें, कितने आवासों में ठाँव मुझे दिलवाया है। > दूरस्थों को भी करवाया है स्वजन समीपस्थ तुमने, > भाई बनवाए हैं मेरे अन्यों को, जानें, कितने। > > छोड़ पुरातन वास कहीं जब जाता हूँ, मैं, > ‘क्या जाने क्या होगा’-सोचा करता हूँ मैं। > नूतन बीच पुरातन हो तुम, भूल इसे मैं जाता हूँ; > दूरस्थों को भी करवाया है स्वजन समीपस्थ तुमने। > > जीवन और मरण में होगा अखिल भुवन में जब जो भी, > जन्म-जन्म का परिचित, चिन्होगे उन सबको तुम ही। > तुम्हें जानने पर न पराया होगा कोई भी; > नहीं वर्जना होगी और न भय ही कोई भी। > > जगते हो तुम मिला सभी को, ताकि दिखो सबमें ही। > दूरस्थों को भी करवाया है स्वजन समीपस्थ तुमने।। > ---------------------------------------------------- > (कत’ अजानारे जानाइले तुमि...। ) > > (4) > > मेरी रक्षा करो विपत्ति में, यह मेरी प्रार्थना नहीं है; > मुझे नहीं हो भय विपत्ति में, मेरी चाह यही है। > दुःख-ताप में व्यथित चित्त को > यदि आश्वासन दे न सको तो, > विजय प्राप्त कर सकूँ दुःख में, मेरी चाह यही है।। > मुझे सहारा मिले न कोई तो मेरा बल टूट न जाए, > यदि दुनिया में क्षति-ही-क्षति हो, > (और) वंचना आए आगे, > मन मेरा रह पाये अक्षय, मेरी चाह यही है।। > > मेरा तुम उद्धार करोगे, यह मेरी प्रार्थना नहीं है; > तर जाने की शक्ति मुझे हो, मेरी चाह यही है। > मेरा भार अगर कम करके नहीं मुझे दे सको सान्त्वना, > वहन उसे कर सकूँ स्वयं मैं, मेरी चाह यही है।। > नतशिर हो तब मुखड़ा जैसे > सुख के दिन पहचान सकूँ मैं, > दुःख-रात्रि में अखिल धरा यह जिस दिन करे वंचना मुझसे, > तुम पर मुझे न संशय हो तब, मेरी चाह यही है।। > ------------------- > (विपोदे मोरे रक्षा क’रो, ए न’हे मोर प्रार्थना) > > (5) > > प्रेम, प्राण, गीत, गन्ध, आभा और पुलक में, > आप्लावित कर अखिल गगन को, निखिल भुवन को, > अमल अमृत झर रहा तुम्हारा अविरल है। > > दिशा-दिशा में आज टूटकर बन्धन सारा- > मूर्तिमान हो रहा जाग आनंद विमल है; > सुधा-सिक्त हो उठा आज यह जीवन है। > > शुभ्र चेतना मेरी सरसाती मंगल-रस, > हुई कमल-सी विकसित है आनन्द-मग्न हो; > अपना सारा मधु धरकर तब चरणों पर। > > जाग उठी नीरव आभा में हृदय-प्रान्त में, > उचित उदार उषा की अरुणिम कान्ति रुचिर है, > अलस नयन-आवरण दूर हो गया शीघ्र है।। > -------------- > (प्रेमे प्राणे गाने गन्धे आलोके पुलके...।) > > (6) > > आओ नव-नव रूपों में तुम प्राणों में; > आओ गन्धों में, वर्णों में, गानों में। > आओ अंगों में तुम, पुलिकत स्पर्शों में; > आओ हर्षित सुधा-सिक्त सुमनों में। > आओ मुग्ध मुदित इन दोनों नयनों में; > आओ नव-नव रूपों में तुम प्राणों में। > > आओ निर्मल उज्ज्वल कान्त ! > आओ सुन्दर स्निग्ध प्रशान्त ! > आओ, आओ हे वैचित्र्य-विधानों में। > > आओ सुख-दुःख में तुम, आओ मर्मों में; > आओ नित्य-नित्य ही सारे कर्मों में। > आओ, आओ सर्व कर्म-अवसानों में; > आओ नव-नव रूपों में तुम प्राणों में।। > (तुमि ! नव-नव रूपे एसो प्राणे...।) > > (7) > > लगी हवा यों मन्द-मधुर इस > नाव-पाल पर अमल-धवल है; > नहीं कभी देखा है मैंने > किसी नाव का चलना ऐसा। > > लाती है किस जलधि-पार से > धन सुदूर का ऐसा, जिससे- > बह जाने को मन होता है; > फेंक डालने को करता जी > तट पर सभी चाहना-पाना ! > पीछे छरछर करता है जल, > गुरु गम्भीर स्वर आता है; > मुख पर अरुण किरण पड़ती है, > छनकर छिन्न मेघ-छिद्रों से। > > कहो, कौन हो तुम ? कांडारी। > किसके हास्य-रुदन का धन है ? > सोच-सोचकर चिन्तित है मन, > बाँधोगे किस स्वर में यन्त्र ? > मन्त्र कौन-सा गाना होगा ? > ---------------- > (लेगेछे अमल धवल पाले मन्द मधुर हावा) > > (8) > > कहाँ आलोक, कहाँ आलोक ? > विरहानल से इसे जला लो। > दीपक है, पर दीप्ति नहीं है; > क्या कपाल में लिखा यही है ? > उससे तो मरना अच्छा है; > विरहानल से इसे जला लो।। > व्यथा-दूतिका गाती-प्राण ! > जगें तुम्हारे हित भगवान। > सघन तिमिर में आधी रात > तुम्हें बुलावें प्रेम-विहार- > करने, रखें दुःख से मान। > जगें तुम्हारे हित भगवान।’ > मेघाच्छादित आसमान है; > झर-झर बादल बरस रहे हैं। > किस कारण इसे घोर निशा में > सहसा मेरे प्राण जगे हैं ? > क्यों होते विह्वल इतने हैं ? > झर-झर बादल बरस रहे हैं। > बिजली क्षणिक प्रभा बिखेरती, > निविड़ तिमिर नयनों में भरती। > जानें, कितनी दूर, कहाँ है- > गूँजा गीत गम्भीर राग में। > ध्वनि मन को पथ-ओर खींचती, > निविड़ तिमिर नयनों में भरती। > कहाँ आलोक, कहाँ आलोक ? > विरहानल से इसे जला लो। > घन पुकारता, पवन बुलाता, > समय बीतने पर क्या जाना ! > निविड़ निशा, घन श्याम घिरे हैं; > प्रेम-दीप से प्राण जला लो।। > --------------------------------------------------- > > Thanks and Regards > Shreenivas Naik, > M.A., M.Ed., M.Phil. > G.P.U.College > Vogga > Bantwal > D.K. 574265 > 9481758822 > 9448593978 > > 2016-01-20 15:53 GMT+05:30 Ujwala Bhajantri <[email protected]>: > >> Send about Geetanjali byrabindranath Tagore. sir >> On 20-Jan-2016 2:32 pm, "Shreenivas Naik" < >> [email protected]> wrote: >> >>> पुस्तकालय >>> *********** >>> >>> पुस्तकालय से तात्पर्य है पुस्तकों का घर। विद्या के प्रचार-प्रसार में >>> विद्यालयों के अतिरिक्त पुस्तकालयों का ही सर्वाधिक योगदान होता है। यह वही >>> स्थल है जहां हमें भांति-भांति के विषयों की सहज जानकारी उपलब्ध हो जाती है। >>> >>> पुस्तकालयों का इतिहास अत्यन्त प्राचीन है। प्राचीन काल से ही जब से भाषा >>> को लिपिबद्ध करने का प्रचलन हुआ पुस्तकालयों का भी गठन किया गया। विश्व के >>> अनेक प्रांतों में आज भी प्राचीनतम पुस्तकालयों के साक्ष्य भरे पड़े हैं। भारत >>> के नालन्दा विश्वविधालय में एक समृद्ध एवं विस्तृत पुस्तकालय के अवशेष प्राप्त >>> हुए हैं। रोमन एवं यूनानी इतिहासकारों के समृद्ध पुस्तकें आज भी इन देशों में >>> मौजूद हैं। सामान्यतः हमें मूलभूत विषयों की जानकारी शिक्षण-संस्थानों में >>> मिलती है लेकिन विषय की वृहत जानकारी हेतु हमें पुस्कालयों की ही शरण में जाना >>> पड़ता है। >>> >>> पूरे विश्व में हजारों पुस्तकालय मौजूद है जहां छात्र-छात्राएं निःशुल्क >>> अथवा कुछ राशि अदा कर अपना ज्ञानार्जन करते हैं। पुस्तकालयों का वर्गीकरण दो >>> रूपों में किया जा सकता है सार्वजनिक पुस्तकालय और सरकारी पुस्तकालय। >>> सार्वजनिक पुस्तकालय वैसे पुस्तकालय हैं जहां कोर्इ भी व्यकित निःशुल्क अथवा >>> निश्चित राशि अदा कर वहां मौजूद पुस्तकों को पढ़ सकता है अथवा जरूरत होने पर >>> अल्पावधि के लिए अपने साथ ले जा सकता है। इनके विपरीत सरकारी पुस्तकालय की >>> सुविधा केवल विेशेष सदस्यों को दी जाती है,जो कि उस विभाग से संबंधित हो अथवा >>> उनके पास विेशेष अनुमति हो। ऐसे पुस्तकालयों का सदस्य सरकारी अथवा उक्त >>> कार्यालय से संबंधित कर्मचारी ही हो सकता है। आज इंटरनेट पर भी अनेक पुस्तकों >>> का संग्रह है जिसे र्इ-लाइब्रेरी कहा जाता है। इस तरह कोर्इ भी व्यकित इंटरनेट >>> के प्रयोग से किसी भी विषय पर अपनी जानकारी को बढ़ा सकता है। इससे समय और पैसे >>> की भी बचत होती है। आज के इलेक्टानिक युग में लोग पुस्तकालय जाने के बजाय >>> र्इ-लाइब्रेरी का अधिकाधिक प्रयोग करने लगे हैं। >>> >>> प्रत्येक पुस्तकालय में पुस्तकों को उनके विषय तथा महत्ता के अनुरूप >>> संग्रहित किया जाता है। हर पुस्तक को एक विशेष कूट संख्या से अंकित किया जाता >>> है, ताकि उसे आसानी से खोजा तथा संग्रहित किया जा सके। हम पुस्तकालय में >>> पुस्तकाध्यक्ष की अनुमति से अथवा सदस्य बनकर वांछित पुस्तक प्राप्त कर सकते >>> हैं अथवा वहां बैठकर उक्त पुस्तक को पढ़ सकते हैं। वैसे स्थल जहां उच्च >>> गुणवत्ता के विधालयों का अभाव है वहां पुस्कालयों की भूमिका और भी बढ़ जाती >>> है। पुस्तकालय आर्थिक तंगी से जूझ रहे लोगों के लिए वरदान स्वरूप होता है। >>> निर्धन व्यकित या छात्र-छात्राएं भी यहां महंगी पुस्तकों का लाभ उठा सकते हैं। >>> >>> ऐसा देखा जाता है कि कर्इ शरारती तत्व पुस्तकालयों में पुस्तकों पर >>> अनवांछित कथन लिख देते हैं या उन्हें क्षतिग्रस्त कर देते हैं। कर्इ बार तो >>> अत्यन्त दुर्लभ पुस्तकें भी क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। इस तरह हम अत्यन्त महत्व >>> के पुस्तकों को नष्ट कर जाते हैं। अत: हमें पुस्तकालयों में पुस्तकों का लाभ >>> लेते समय यह ध्यान देना चाहिए कि किसी भी कारण हमसे कोर्इ पुस्तक क्षतिग्रस्त >>> न हों। हमारी जागरूकता और आपसी समझ कर्इयों के लिए वरदान साबित हो सकती है। >>> पुस्तकालयों में महत्व के कारण ही विद्यालयों महाविद्यालयों एवं सरकारी >>> कार्यालयों आदि में पुस्तकालयों का प्रचलन बढ़ा है। पुस्तकालय जाने के प्रति >>> आज के युवा थोड़े असंवेदनशील हो गए हैं। अतः हमें अपने अतिरिक्त समय में >>> पुस्तकालय अवश्य जाना चाहिए ताकि अनवरत हमारे ज्ञान का दायरा बढ़ता जाए। >>> >>> Thanks and Regards >>> Shreenivas Naik, >>> M.A., M.Ed., M.Phil. >>> G.P.U.College >>> Vogga >>> Bantwal >>> D.K. 574265 >>> 9481758822 >>> 9448593978 >>> >>> -- >>> 1. Webpage for this HindiSTF is : >>> https://groups.google.com/d/forum/hindistf >>> Hindi KOER web portal is available on >>> http://karnatakaeducation.org.in/KOER/en/index.php/Portal:Hindi >>> >>> 2. For Ubuntu 14.04 installation, visit >>> http://karnatakaeducation.org.in/KOER/en/index.php/Kalpavriksha (It has >>> Hindi interface also) >>> >>> 3. For doubts on Ubuntu and other public software, visit >>> http://karnatakaeducation.org.in/KOER/en/index.php/Frequently_Asked_Questions >>> >>> 4. If a teacher wants to join STF, visit >>> http://karnatakaeducation.org.in/KOER/en/index.php/Become_a_STF_groups_member >>> >>> 5. Are you using pirated software? 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Webpage for this HindiSTF is : >> https://groups.google.com/d/forum/hindistf >> Hindi KOER web portal is available on >> http://karnatakaeducation.org.in/KOER/en/index.php/Portal:Hindi >> >> 2. For Ubuntu 14.04 installation, visit >> http://karnatakaeducation.org.in/KOER/en/index.php/Kalpavriksha (It has >> Hindi interface also) >> >> 3. For doubts on Ubuntu and other public software, visit >> http://karnatakaeducation.org.in/KOER/en/index.php/Frequently_Asked_Questions >> >> 4. If a teacher wants to join STF, visit >> http://karnatakaeducation.org.in/KOER/en/index.php/Become_a_STF_groups_member >> >> 5. Are you using pirated software? 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