Thanks a lot sir. We are greatful to you sir.
On Feb 2, 2016 11:57 AM, "Shreenivas Naik" <
[email protected]> wrote:

> बढती हुई जनसंख्या
>
> जनसंख्या किसी भी राष्ट्र के लिए अमूल्य पूंजी होती है, जो वस्तुओं व सेवाओं
> का उत्पादन करती है, वितरण करती है और उपभोग भी करती है । जनसंख्या देश के
> आर्थिक विकास का संवर्द्धन करती है । इसीलिए जनसंख्या को किसी भी देश के साधन
> और साध्य का दर्जा दिया जाता है । लेकिन अति किसी भी चीज की अच्छी नहीं होती ।
> फिर चाहे वह अति जनसंख्या की ही क्यों न हो ? वर्तमान में भारत की जनसंख्या
> वृद्धि इसी सच्चाई का उदाहरण है ।
>
> अनुमान है कि २०२५ तक भारत की जनसंख्या बढकर १५ अरब हो जाएगी । वर्ष २०३० तक
> यह आबादी जहाँ १.५३ अरब हो जाएगी वहीं २०६० तक यह बढकर १.७ अरब हो जाएगी ।
> झपना ही नहीं, २०३० तक भारत चीन से भी आगे निकल जाएगा । भारत में इस बढी हुई
> आबादी का २०३० में क्या परिणाम होगा, इसका अनुमान वर्ष २००८ में यदि लगाया जाए
> तो स्थितियाँ चौंकाने वाली और डरावनी हैं ।
>
> जनसंख्या वृद्धि के कारण पूरे देश की दो तिहाई शहरी आबादी को २०३० में शुद्ध
> पेय जल नसीब नहीं होगा । वर्तमान में पानी की प्रतिवर्ष प्रति व्यक्ति
> उपलब्धता जहाँ १५२५ घन मी. है, वहीं २०२५ में यह उपलब्धता मात्र १०६० घन मी.
> होगी । वर्तमान में प्रति दस हजार व्यक्तियों पर ३ चिकित्सक तथा १० बिस्तर है,
> २०३० में उनके बारे में सोचना भी मुश्किल होगा ।
>
> भारत की जनसंख्या वृद्धि के लिए जिम्मेदार राज्यों में आंध्र-प्रदेश,
> कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल देश की कुल आबादी का १४ प्रतिशत योगदान करते हैं तो
> वहीं महाराष्ट्र, गुजरात इसमें ११ प्रतिशत की वृद्धि करते हैं । जनसंख्या
> वृद्धि के बोझ का ही यह परिणाम है कि एक तरफ जहाँ हमारी जमीन उर्वरकों के कारण
> अनउपजाऊ होती जा रही है । पैदावार कम होने के कारण लोग आत्महत्या करने को
> मजबूर हो रहे हैं ।
>
> चार दशक पीछे देखें तो देश में गरीबी का प्रतिशत आधा रह गया है । सिर्फ शहर
> की १० प्रतिशत आबादी का ही यह ऑकडा ६२ रुपये प्रतिदिन है । जनसंख्या वृद्धि का
> ही परिणाम है कि देश में शहरी आबादी के साथ ही साथ स्लम आबादी भी लगातार बडती
> जा रही हैए । देश की कुल आबादी का १.३ भाग झुग्गी, झोपडियों में रहती है
> अर्थात मुंबई में १.६३ लाख, दिल्ली में १.१८ लाख तथा कोलकाता में १.४९ लाख लोग
> स्लम सीमा में रहते हैं ।
>
> विश्व के कृषि भू-भाग का मात्र २.४ प्रतिशत भारत में है जबकि यहाँ की आबादी
> दुनिया की कुल आबादी का १६.७ प्रतिशत है । विश्व में सबसे पहले १९५२ में
> आधिकारिक रूप से जनसंख्या नियंत्रण हेतु परिवार नियोजन कार्यक्रम को अपनाया ।
>
> भारत जनसंख्या के मामले’ में चीन के बाद दूसरा स्थान रखता है । लेकिन वह दिन
> दूर नहीं जब हम चीन को भी पीछे छोड देंगे, इस बात का पक्का सबूत यह है कि चीन
> की वार्षिक जनसंख्या वृद्धि जहाँ महज 1 प्रतिशत है वहीं हम भारतवासी जनसंख्या
> की वृद्धि दर २ प्रतिशत प्रतिवर्ष किए हुए हैं । पूरे विश्व से हम आगे हैं ।
> विश्व में प्रति मिनट जहाँ कुल १५० शिशु जन्म लेते हैं वहीं भारत में अकेले यह
> ऑकडा प्रति मिनट करीब ६० है ।
>
> भारत की आबादी २००१ की जनगणना में एक अरब के आश्चर्यजनक आँकड़े को पार कर
> १०२.८७ करोड हो गई थी । जनसंख्या की औसत वार्षिक वृद्धिदर वर्ष २००१ में कम
> होकर १.९५ प्रतिशत रह गई । बावजूद इसके भारत की जनसंख्या की वृद्धिदर विकसित
> देशों की तुलना में तथा विकासशील देशों की तुलना में भी बहुत अधिक है।
>
> जनसंख्या नियंत्रण एक संवेदनशील सामाजिक मुद्दा है । भारत ही वह एकमात्र देश
> है जहाँ २१ वीं सदी में भी बच्चों का जन्म भगवान की देन माना जाता है ।
> पढे-लिखे लोग भी यह समझने को तैयार नहीं हैं कि जनसंख्या वृद्धि स्वयं के
> हाथों में है जिसे हम चाहें तो रोक सकते है ।
>
> गाँवों में ऐसे लोगों को देखा जा सकता है जो वह तर्क देते मिल जाएंगे कि
> जितने हाथ होंगे उतना काम होगा । यह देश का दुर्भाग्य है कि हम सब यह सोच नहीं
> पाते कि दो हाथों के साथ-साथ एक पेट भी होता है जिसकी अपनी जरूरतें होती हैं ।
> लोगों का मानना है कि मृत्युदर कम हो गई है, जीवन प्रत्याशा बढ गई है, प्रजनन
> व स्वास्थ्य सेवाएं पहले से बेहतर हैं । लोग असमय मौत का शिकार नहीं होते ।
> जिस कारण जनसंख्या बढी हुई प्रतीत होती है । गाँवों में टेलीविजन की पहुँच
> होगी और जनसंख्या वृद्धि पर लगाम लगाई जा सकेगी ।
>
> दक्षिण राज्यों में जहाँ जनसंख्या कम हो रही है, वहीं उत्तरी राज्यों में
> जनसंख्या वृद्धि दर ज्यादा है । केरल में १७.२ प्रतिशत और तमिलनाडु में २५.२
> प्रतिशत ही बालिकाएं ऐसी हैं जिनकी शादी १८ साल तक की उस में हुई है। व्यक्ति
> केवल दो बच्चों की सोच तक ही सीमित रहे ताकि जनसंख्या पर नियंत्रण रह सके ।
> इसके प्रति जागरुकता के लिए शिक्षा को बढावा दिया जाना चाहिए । बच्चे ‘भगवान
> की देन’ होते हैं, वाली मानसिकता का त्याग करना ही होगा वरना यदि हमनें समय
> रहते ही जागरुक प्रयासों से बढती जनसंख्या को नहीं रोका तो एक दिन भूक और
> प्यास से हमारे अपने ही त्रस्तहोंगे । प्रैति व्यक्ति जागरूकता और प्रति
> व्यक्ति शिक्षा के बिना ऐसा सम्भव नहीं है । आने वाली पीडियों को सुखी और
> समृद्ध बनाने के लिए जनसंख्या पर नियंत्रण जरुरी है ।
>
> जनसंख्या वृद्धि की गति से मानव की आवश्यकताओं और संसाधनों की पूर्ति करना
> असंभव होता जा रहा है । इससे जीवन मूल्यों में गिरावट आ रही है । अमीर और अमीर
> होते जा रहे हैं, गरीब और गरीब । अमीर-गरीब के बीच की खाई गहराती जा रही है ।
> पर्यावरण विषाक्त करने में भी जनसंख्या एक प्रमुख कारण है । इन सारी बातों पर
> गौर करें तो यही निष्कर्ष निकलकर आता है कि जनसंख्या पर नियंत्रण युद्ध स्तर
> पर करना होगा ।
>
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