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On Aug 25, 2016 16:40, "Shreenivas Naik" <
[email protected]> wrote:

> रेखाचित्र
>
> रेखाचित्र आधुनिक युग में विकसित एक गद्य विधा है जो अन्य आधुनिक विधा की तरह
> ही पश्चिम से आई है और अंग्रेजी के ‘स्केच’ के समानार्थी है। रंगविहीन रेखाओं
> के दायरे को घटाना-बढ़ाना, सूक्ष्म अन्तर्दर्शी कला-चेतना को मांजकर कलाकार जब
> अपनी आत्मा को रेखाओं की वृतों में घेरकर आकार देता है, वह रेखाचित्र के रूप
> में हमारे सामने आता है। साहित्यिक क्षेत्र में यही रेखाएं शब्दों में
> परिवर्तित हो जाती है।
>
>             वैसे तो रेखाचित्र की कई परिभाषाएँ प्रस्तुत की गयी हैं, परन्तु
> सबसे सटीक और व्यापक परिभाषा डॉ. भगीरथ मिश्र की लगती है जिनके अनुसार –
>
>             “संपर्क में आये किसी विलक्षण व्यक्ति अथवा संवेदनाओं को
> जगानेवाली सामान्य विशेषताओं से युक्त किसी प्रतिनिधि चरित्र के मर्मस्पर्शी
> स्वरुप को, देखी-सुनी या संकलित घटनाओं की पृष्ठभूमि में इस प्रकार उभारकर
> रखना कि उसका हमारे हृदय पर एक निश्चित प्रभाव अंकित हो जाए रेखाचित्र या
> शब्दचित्र कहलाता है।”
>
>             जिस प्रकार चित्रकार चित्र बनाने के लिए आड़ी-तिरछी रेखाओं का
> प्रयोग करता है, उसी प्रकार रेखाचित्र लिखने वाला चित्र-शब्दों द्वारा जीवन की
> विविध घटनाओं, व्यक्तियों और दृश्य का ऐसा सजीव चित्र उपस्थित करता है कि पाठक
> के सम्मुख वह व्यक्ति, स्थान, वातावरण या प्रसंग साकार हो उठता है। गद्य में
> लिखे गए इसी चित्र को रेखाचित्र कहते हैं। रेखाचित्रकार अपने मन पर छाई हुई
> स्मृति रेखाओं और विगत अनुभवों को कला की तूलिका से स्वानुभूति के रंग में
> रंगकर सजीव शब्द-चित्र का रूप देता है।      प्रकाशचन्द्र गुप्त ने अपने
> रेखाचित्रों के सम्बन्ध में लिखा है –
>
>             “मैं शब्दों की रेखाओं से अपने अनुभव के चित्र उतारने का प्रयास
> कर रहा था और निरंतर सोचता था कि मैं इन रेखाओं को तूलिका या पेंसिल से खींच
> सकता तो कितना अच्छा होता।”
>
>             इस वक्तव्य से स्पष्ट है कि शब्दचित्र छोटे, चलते और जीवंत होते
> हैं। हिंदी साहित्य कोष के अनुसार – “रेखाचित्र किसी व्यक्ति, वस्तु, घटना या
> भाव का कम से कम शब्दों में मर्मस्पर्शी भावपूर्ण एवं सजीव अंकन है।”
> [8/25, 4:17 PM] 🙏🏼🙏🏼🙏🏼: रेखाचित्र कहानी से मिलता-जुलता साहित्य रूप
> है। यह नामअंग्रेज़ी के 'स्केच' शब्द की नाप-तोल पर गढ़ा गया है।
> स्केचचित्रकला का अंग है। इसमें चित्रकार कुछ इनी-गिनी रेखाओं द्वारा किसी
> वस्तु-व्यक्ति या दृश्य को अंकित कर देता है-स्केच रेखाओं की बहुलता
> और रंगों की विविधता में अंकित कोई चित्र नहीं है, न वह एक फ़ोटो ही है,
> जिसमें नन्हीं से नन्हीं और साधारण से साधारण वस्तु भी खिंच आती है।
>
> साहित्य में रेखाचित्र
>
> साहित्य में जिसे रेखाचित्र कहते हैं, उसमें भी कम से कम शब्दों में कलात्मक
> ढंग से किसी वस्तु, व्यक्ति या दृश्य का अंकन किया जाता है। इसमें साधन शब्द
> है, रेखाएँ नहीं। इसीलिए इसे शब्दचित्र भी कहते हैं। कहीं-कहीं इसका अंग्रेज़ी
> नाम 'स्केच' भी व्यवहृत होता है।
>
> रेखाचित्र का स्वरूप
>
> रेखाचित्र किसी व्यक्ति, वस्तु, घटना या भाव का कम से कम शब्दों में
> मर्म-स्पर्शी, भावपूर्ण एवं सजीव अंकन है। कहानी से इसका बहुत अधिक साम्य है-
> दोनों में क्षण, घटना या भाव विशेष पर ध्यान रहता है, दोनों की रूपरेखा
> संक्षिप्त रहती है और दोनों में कथाकार के नैरेशन और पात्रों के संलाप का
> प्रसंगानुसार उपयोग किया जाता है। इन विधाओं के साम्य के कारण अनेक कहानियों
> को भी रेखाचित्र कह दिया जाता है और इसके ठीक विपरीत अनेक रेखाचित्रों को
> कहानी की संज्ञा प्राप्त हो जाती है। कहीं-कहीं लगता है, कहानी और रेखाचित्र
> के बीच विभाजन रेखा खींचना सरल नहीं है। उदाहरण के लिए रायकृष्णदास लिखित
> 'अन्त:पुर का आरम्भ' कहानी है, पर वह आदिम मनुष्य की अन्त:वृत्ति पर आधारित
> 'रेखाचित्र' भी है। रामवृक्ष बेनीपुरी की पुस्तक 'माटी की मूरतें' में संकलित
> 'रज़िया', 'बलदेव सिंह', 'देव' आदि रेखाचित्र कहानियाँ भी हैं। श्रीमती
> महादेवी वर्मा लिखित 'रामा', 'घीसा' आदि रेखाचित्र भी कहानी कह जाते हैं।
> कहानी और रेखाचित्र में साम्य है अवश्य, पर जैसा कि 'शिप्ले' के 'विश्व
> साहित्य कोश' में कहा गया है, रेखाचित्र में कहानी की गहराई का अभाव रहता है।
> दूसरी बात यह भी है कि कहानी में किसी न किसी मात्रा में कथात्मकता अपेक्षित
> रहती है, पर रेखाचित्र में नहीं।
>
> आत्मकथा और संस्मरण से भिन्न
>
> व्यक्तियों के जीवन पर आधारित रेखाचित्र लिखे जाते हैं, पर रेखाचित्र
> जीवनचरित नहीं है। जीवनचरित के लिए यथातथ्यता एवं वस्तुनिष्ठता अनिवार्य है।
> इसमें कल्पना के लिए अवकाश नहीं रहता, लेकिन रेखाचित्र साहित्यिक कृति है-
> लेखक अपनी भावना एवं कल्पना की तूलिका से ही विभिन्न चित्र अंकित करता है।
> जीवनचरित में समग्रता का भी आग्रह रहता है, इसमें सामान्य एवं महत्त्वपूर्ण सब
> प्रकार की घटनाओं के चित्रण का प्रयत्न रहता है, लेकिन रेखा चित्रकार
> गिनी-चुनी रेखाओं, गिनी-चुनी महत्त्वपूर्ण घटनाओं का ही उपयोग करता है। इन
> बातों से यह भी स्पष्ट है कि रेखाचित्र आत्मकथा और संस्मरण से भी भिन्न
> अस्तित्व रखता है।
>
> रेखाचित्र की विशेषता
>
> रेखाचित्र की विशेषता विस्तार में नहीं, तीव्रता में होती है। रेखाचित्र
> पूर्ण चित्र नहीं है-वह व्यक्ति, वस्तु, घटना आदि का एक निश्चित विवरण की
> न्यूनता के साथ-साथ तीव्र संवेदनशीलता वर्तमान रहती है। इसीलिए रेखाचित्रांकन
> का सबसे महत्त्वपूर्ण उपकरण है, उस दृष्टिबिन्दु का निर्धारण, जहाँ से लेखक
> अपने वर्ण्य विषय का अवलोकन कर उसका अंकन करता है। इस दृष्टि से व्यंग्य चित्र
> और रेखाचित्र की कलाएँ बहुत समान हैं। दोनों में दृष्टि की सूक्ष्मता तथा कम
> से कम स्थान में अधिक से अधिक अभिव्यक्त करने की तत्परता परिलक्षित होती है।
> रेखाचित्र के लिए संकेत सामर्थ्य भी बहुत आवश्यक है- रेखाचित्रकार शब्दों और
> वाक्यों से परे भी बहुत कुछ कहने की क्षमता रखता है। रेखाचित्र के लिए उपयुक्त
> विषय का चुनाव भी बहुत महत्त्वपूर्ण है। इसकी विषय वस्तु ऐसी होती है, जिसे
> विस्तृत वर्णन और रंगों की अपेक्षा न हो और जो कुछ ही रेखाओं के संघात से चमक
> उठे।
>
> उदाहरण-
>
> चाँदनी रात में 'ताजमहल' की शोभा को रेखाचित्र में बाँधा जा सकता है,
> पर शाहजहाँ और मुमताज़ महल की प्रेमकथा को रेखाचित्र की सीमा में बाँध सकना
> कठिन काम है।
>
> विषय और शैली
>
> रेखाचित्र के लिए विषय का बन्धन नहीं रहता, सब प्रकार के विषयों का इसमें
> समावेश हो सकता है। मूल चेतना के आधार पर रेखाचित्रों को अनेक वर्गों में रखा
> जा सकता है-
>
> संस्मरणात्मकवर्णनात्मकव्यंग्यात्मकमनोवैज्ञानिक आदि
>
> हिंदी में रेखाचित्र
>
> हिन्दी में अनेक लेखकों ने रेखाचित्र लिखे हैं। इस क्षेत्र के कुछ
> महत्त्वपूर्ण नाम हैं-
>
> बनारसीदास चतुर्वेदी : 'रेखाचित्र'महादेवी वर्मा : 'अतीत के चलचित्र',
> 'स्मृति की रेखाएँ' और 'शृंखला की कड़ियाँ'रामवृक्ष बेनीपुरी : 'माटी की
> मूरतें' तथा 'गेहूँ और गुलाब'प्रकाशचन्द्र गुप्त : 'पुरानी स्मृतियाँ और नये
> स्केच तथा रेखाचित्र'कन्हैयालाल मिश्र 'प्रभाकर' : 'भूले हुए चेहरे' आदि।
> [8/25, 4:22 PM] 🙏🏼🙏🏼🙏🏼: रेखाचित्र एवं संस्मरण का सम्बन्ध
>
> पाश्चात्य साहित्य विशेषकर अंग्रेजी साहित्य के स्केचों से प्रभावित
> रेखाचित्र वस्तुतः कहानी और निबंध के मध्य झूलती विधा है। हिंदी में निबंध तथा
> कहानी पर लिखी गयी आलोचना पुस्तकों में रेखाचित्र को कहानी या निबंध-कला की
> सहायक शैली मान लिया गया है अथवा कहानी और निबंध की रचना-सीमाओं को फैलाकर
> रेखाचित्र को उन्हीं के अंतर्गत समाविष्ट करने का प्रयास किया गया है।
> रेखाचित्र में कहानी से अधिक मार्मिकता, निबंध से अधिक मौलिकता एवं रोचकता
> होती है। इसमें कहानी का कौतूहल है तो निबंध की गहराई भी है। वस्तुतः
> रेखाचित्र विभिन्न विधाओं की विशेषताओं का विचित्र समुच्चय है।
>
>             यशपाल के अनुसार –
>
>             “रेखाचित्र कहानी की कला से प्रेरणा पाकर उत्पन्न हुई कला की नव
> विकसित स्वतंत्र शाखा है।”
>
>             संस्मरण रेखाचित्र के अत्यधिक निकट है। दोनों ही संवेदनशील
> स्मृतियों का प्रत्यक्षीकरण है जिसके सूत्र किसी साधारण अथवा विशिष्ट व्यक्ति
> से जुड़े होते हैं। रेखाचित्र और संस्मरण के ऊपरी खोल एक से प्रतीत होते हैं,
> किन्तु एक ही सतह से जुड़ी इन विधाओं में भी थोड़ा अंतर है। संस्मरण संस्मरणकार
> का अनुभूत यथार्थ होता है जिसका सम्बन्ध अतीत से होता है। उसमें कल्पना के लिए
> कोई स्थान नहीं होता। वह विवेच्य व्यक्ति, घटना या प्रसंग की यथातथ्यता को
> बनाए रखकर उनमें संचरित भीतरी संवेदना को पकड़ता है। रेखाचित्र संस्मरण के इन
> गुणों का अनुपालन नहीं करता। वह तो चित्रकला से उत्प्रेरित एक साहित्यिक विधा
> है। जिस प्रकार चित्रकार रेखाओं में अपने विवेच्य विषय को पूर्ण और सूक्ष्म
> आकार न देकर केवल आकार का आभास प्रदान करता है, ठीक उसी प्रकार साहित्यिक
> रेखाचित्रकार शब्दों में अपने विवेच्य विषय के स्वरुप का आकारात्मक आभास देता
> है। इस तरह रेखाचित्र और संस्मरण में स्पष्ट अंतर है।
>
>             कहानी अथवा निबंध से कहीं अधिक रेखाचित्र और संस्मरण के बीच की
> निकटता पर विद्वानों ने अपनी राय व्यक्त की है। दरअसल संस्मरण और रेखाचित्र
> दोनों एक दूसरे के इतना निकट है कि कभी-कभी तो दोनों को अलग करना कठिन हो जाता
> है। संस्मरण संवेदनशील स्मृतियों का प्रत्यक्षीकरण है जिसके सूत्र किसी साधारण
> अथवा विशिष्ट व्यक्ति से जुड़े होते हैं। रेखाचित्र के केंद्र में भी यही
> संवेदनशील स्मृति है, जो शब्दचित्र के रूप में वर्णित होता है। किन्तु इतना
> साम्य होने पर भी ये दोनों दो भिन्न विधाएँ हैं।
>
>             बाबू गुलाब राय ने दोनों विधाओं की तुलना करते हुए लिखा है कि –
>
>             “जहाँ रेखाचित्र वर्णनात्मक अधिक होते हैं, वहां संस्मरण
> विवरणात्मक अधिक होते हैं।” दूसरी ओर डॉ. नगेन्द्र दोनों को एक ही जाति का
> मानते हैं। महादेवी वर्मा और पं. बनारसीदास चतुर्वेदी की मान्यता है कि
> संस्मरण का सम्बन्ध अतीत से है और रेखाचित्र वर्तमान का भी हो सकता है। एक ही
> सतह से जुड़ी इन दोनों विधाओं में पर्याप्त समानता होने पर भी कई स्पष्ट अंतर
> भी हैं।
>
>
>
> क्या आप जानते हैं ?
>
>     हिंदी में अनेक साहित्यकारों ने रेखाचित्र लिखे हैं। उनमें सशक्त
> हस्ताक्षर हैं – महादेवी वर्मा, पं. श्री राम शर्मा,
>
> रामवृक्ष बेनीपुरी, पद्मसिंह शर्मा, बनारसी दास चतुर्वेदी, कन्हैया लाल मिश्र
> ‘प्रभाकर’, निराला, प्रकाशचंद्र गुप्त, रांगेय राघव, अज्ञेय, दिनकर,
> उपेन्द्रनाथ अश्क, देवेन्द्र सत्यार्थी आदि।
>
>
>
>             रेखाचित्र अपेक्षित, अपरिचित साधारण व्यक्ति के असाधारण
> व्यक्तित्व पर आधारित होते हैं, जबकि संस्मरण बहुधा परिचित, असाधारण
> व्यक्तित्व पर आधारित होते हैं। रेखाचित्र में वर्णनात्मक चित्रण की प्रधानता
> रहती है जबकि संस्मरण में विवरणों की प्रधानता रहती है। संस्मरण में कथाओं और
> प्रसंगों का उपयोग किया जाता है जबकि रेखाचित्र में रूप की अभिव्यक्ति पर
> ध्यान केन्द्रित होता है। संस्मरण में देशकाल और परिस्थितियों की प्रधानता
> होती है जबकि रेखाचित्र में वर्ण्य-विषय या वस्तु की। संस्मरण प्रायः बीती
> बातों या दिवंगत व्यक्तियों से सम्बंधित होते हैं जबकि रेखाचित्र में समकालीन
> घटनाओं या दृश्यों का वर्णन भी हो सकता है। रेखाचित्र में सामान्यतः लेखक की
> दृष्टि संवेदनात्मक होती है जबकि संस्मरण में श्रद्धात्मक होती है। रेखाचित्र
> में अक्सर लेखक समास शैली का आश्रय लेता है जबकि संस्मरण में लेखक व्यास शैली
> में अपनी रचना लिखता है। रेखाचित्र में प्रवृति गागर में सागर भरने की होती
> है। यही नहीं संस्मरणों में लेखक की अपनी रूचि-अरुचि, राग-द्वेष आदि विभिन्न
> प्रतिक्रियाओं और टिप्पणियों के माध्यम से व्यक्त होती चलती है, जबकि
> रेखाचित्र में लेखक इन सबसे तटस्थ होता है।
>
>             संस्मरण में अतीत की स्मृति भावात्मक, क्षणिक, अस्पष्ट, अपूर्ण
> और आंशिक होती है, किन्तु रेखाचित्र की स्मृति अपेक्षाकृत अधिक सघन, अधिक
> स्पष्ट, अपने में अधिक पूर्ण और बारम्बार हृदय को झकझोरने वाली होती है।
> रेखाचित्र में सत्य होते हुए भी स्वच्छंदता रहती है। संस्मरण में स्वच्छंदता
> और कल्पना तत्त्व का समावेश नहीं होता।
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