दम तोड़ती रिश्ते के बीच की उलझी हुई डोर की कहानी 'आपका बंटी'

पुस्तक  - आपका बंटी
लेखिका - मन्नू भंडारी
आपका बंटी मन्नू भंडारी के उन बेजोड़ उपन्यासों में है जिनके बिना न बीसवीं
शताब्दी के हिन्दी उपन्यास की बात की जा सकती है, न स्त्री-विमर्श को सही
धरातल पर समझा जा सकता है। दजर्नों संस्करण और अनुवादों का यह सिलसिला आज भी
वैसा ही है जैसा धमर्युग में पहली बार धारावाहिक के रूप में प्रकाशन के दौरान
था। बच्चे की निगाहों और घायल होती संवेदना की निगाहों से देखी गई परिवार की
यह दुनिया एक भयावह दु: स्वप्न बन जाती है। कहना मुश्किल है कि यह कहानी बालक
बंटी की है या माँ शकुन की और अजय-शकुन के बिखरे रिश्ते की। सभी तो एक-दूसरे
में ऐसे उलझे हैं कि त्रासदी सभी की यातना बन जाती है। शकुन के जीवन का सत्य
है कि स्त्री की जायज महत्वाकांक्षा और आत्मनिर्भरता पुरुष के लिए चुनौती
है-नतीजे में दाम्पत्य तनाव से उसे अलगाव तक ला छोड़ता है। यह शकुन का नहीं,
समाज में निरन्तर अपनी जगह बनाती, फैलाती और अपना कद बढ़ाती हर स्त्री का है।
पति-पत्नी के इस द्वन्द में यहाँ भी वही सबसे अधिक पीसा जाता है जो नितान्त
निर्दोष, निरीह और असुरक्षित है-बंटी। बाल मनोविज्ञान की गहरी समझ-बूझ के लिए
चर्चित, प्रशंसित इस उपन्यास का हर पृष्ठ ही मर्मस्पर्शी और विचारोत्तेजक है।
हिन्दी उपन्यास की एक मूल्यवान उपलब्धि के रूप में आपका बंटी एक कालजयी
उपन्यास है।
मंन्नु भंडारी का वक्तव्य
उपन्यास के प्रारंभ में लेखिका का वक्तव्य अत्यंत ही मर्मस्पर्शी है। उसके कुछ
अंश इस प्रकार हैं-वह बांकुरा की एक साँझ थी। अचानक ही पी। का फोन आया- तुमसे
कुछ बहुत जरूरी बात करनी है, जैसे भी हो आज शाम को ही मिलो, बांकुरा में। मैं
उस जरूरी बात से कुछ परिचित भी थी और चिंतित भी। रेस्त्राँ की भीनी रोशनी में
मेज पर आमने-सामने बैठकर, परेशान और बदहवास पी। ने कहा- समस्या बंटी की है।
तुम्हें शायद मालूम हो कि बंटी की माँ (पी। की पहली पत्नी) ने शादी कर ली। मैं
बिलकुल नहीं चाहता कि अब वह वहाँ एक अवांछनीय तत्त्व बनकर रहे, इसलिए तय किया
है कि बंटी को मैं अपने पास ले आऊँगा। अब से वह यहीं रहेगा और फिर वे देर तक
यह बताते रहे कि बंटी से उन्हें कितना लगाव है, और इस नई व्यवस्था में वहाँ
रहने से उसकी स्थिति क्या हो जाएगी.यहां एक ऐसे बच्ची की स्थिति की वर्णना है
जो अपने माता-पिता के टूटे हुए रिश्ते के बीच एक मात्र कड़ी है।

बंटी जैसे बच्चों की दशा का वर्णन
लेखिका ने बंटी जैसे बच्चों की दशा का कुछ इस तरह से वर्णन किया है कि -बंटी
अपनी नई माँ के घर आ गया है। नई माँ और पिता के बीच एक बालिका। लगभग छ: महीने
बाद की घटना है। ड्राइंग रूम में अनेक बच्चे धमा-चौकड़ी मचाए हैं-उन्मुक्त और
निश्चिंत। बारी-बारी से सब सोफे पर चढ़कर नीचे छलाँग लगा रहे हैं। उस बच्ची का
नंबर आता है। सोफे पर चढ़ने से पहले वह अपनी नई माँ की ओर देखती है। माँ शायद
उसकी ओर देख भी नहीं रही थी, पर उन अनदेखी नजरों में भी जाने ऐसा क्या था कि
सोफे पर चढ़ने के लिए बच्ची का ऊपर उठा हुआ पैर वापस नीचे आ जाता है। बच्ची
सहमकर पीछे हट जाती है। अनायास ही मेरे भीतर छ: महीने पहले का बंटी उस वातावरण
में व्याप्त एक सहमेपन के रूप में जाग उठता है। खेल उसी तरह चल निकला है,
लेकिन अगर कोई इस सारे प्रवाह से अलग हटकर सहमा हुआ कोने में खड़ा है, तो वह
है बंटी। रात में सोई तो लगा छ: महीने पहले जिस बंटी को अपने साथ लाई थी, वह
सिर्फ़ एक दयनीय मुरझायापन बनकर रह गया है।लेखिका बंटी के संदर्भ में कहती हैं
कि किसी एक व्यक्ति के साथ घटी घटना दया, करूणा और भावुकता पैदा कर सकती है,
लेकिन जब अनेक जि Þ ंदगियाँ एक जैसे साँचे में ही सामने आने लगती हैं तो दया
और भावुकता के स्थान पर मन में धीरे-धीरे एक आतंक उभरने लगता है। बंटी के इन
अलग-अलग टुकड़ों ने उस समय मुझे करुणा-विगलित और उच्छ्वसित ही किया था, लेकिन
जब सब मिलाकर बंटी मेरे सामने खड़ा हुआ तो मैंने अपने-आपको आतंकित ही अधिक
पाया, समाज की दिनों-दिन बढ़ती हुई एक ऐसी समस्या के रूप से, जिसका कहीं कोई
हल नहीं दिखाई देता। यही कारण है कि बंटी मुझे तूफानी समुद्र-यात्रा में किसी
द्वीप पर छूटे हुए अकेले और असहाय बच्चे की तरह नहीं वरन अपनी यात्रा के
कारणों के साथ और समानांतर जीते हुए दिखाई दिया। भावना के स्तर पर उद्वेलित और
विगलित करनेवाला बंटी जब मेरे सामने एक भयावह सामाजिक समस्या के रूप में आया
तो मेरी दृष्टि अनायास ही उसे जन्म देने, बनाने या बिगाड़नेवाले सारे सूत्रों,
स्रोतों और संदर्भों की खोज और विश्लेषण की ओर दौड़ पड़ी। बंटी के तत्काल
संदर्भ अजय और शकुन हैं.दूसरे शब्दों में वे संदर्भ अजय और शकुन के वैवाहिक
संबंधों का अध्ययन और उसकी परिणति के रूप में ही मेरे सामने आए। इस पूरी
स्थिति की सबसे बड़ी विडंबना ही यह है कि इन संबंधों के लिए सबसे कम जि Þ
म्मेदार और सब ओर से बेगुनाह बंटी ही त्रास को सबसे अधिक भोगता है इस ट्रैजडी
के। लेखिका ने बंटी को उन तमाम बच्चों का प्रतिनिधि बनाया जो कि अक्सर
पति-पत्नी के रिश्ते के बीच बेटी या बेटा बन कर पिसते हैं।
महिला के दो रूपों का वर्णन
लेखिका ने मां और कामकाजी महिला के बीच की टकराहट को बड़ी ही अनोखी तरह से
पेशकश की है। लेखिका ने कुछ इस तरह बयां किया है कि बंटी जानता है, ममी अब
पीछे मुड़कर नहीं देखेंगी। नपे-तुले क़दम रखती हुई सीधी चलती चली जाएँगी। जैसे
ही अपने कमरे के सामने पहुँचेंगी चपरासी सलाम ठोंकता हुआ दौड़ेगा और चिक
उठाएगा। ममी अंदर घुसेंगी और एक बड़ी-सी मेज के पीछे रखी कुर्सी पर बैठ
जाएँगी। मेज पर ढेर सारी चिट्ठियाँ होंगी। फाइलें होगी। उस समय तक ममी एकदम
बदल चुकी होंगी। कम से कम बंटी को उस कुर्सी पर बैठी ममी कभी अच्छी नहीं लगीं।
पहले जब कभी उसकी छुट्टी होती और ममी की नहीं होती, ममी उसे भी अपने साथ कॉलेज
ले जाया करती थीं। चपरासी उसे देखते ही गोद में उठाने लगता तो वह हाथ झटक
देता। ममी के कमरे के एक कोने में ही उसके लिए एक छोटी-सी मेज-कुर्सी लगवा दी
जाती, जिस पर बैठकर वह ड्राइंग बनाया करता। कमरे में कोई भी घुसता तो एक बार
हँसी लपेटकर, आँखों ही आँखों में जरूर उसे दुलरा देता। तब वह ममी की ओर देखता।
पर उस कुर्सी पर बैठकर ममी का चेहरा अजीब तरह से सख़्त हो जाया करता है।
प्रंसिपल की कुर्सी पर बैठी ममी उसे कभी अच्छी नहीं लगतीं। वहाँ उसके और ममी
के बीच में बहुत सारी चीजें आ जाती हैं। ममी का नक़ली चेहरा, कॉलेज, कॉलेज की
बड़ी-सी बिल्डिंग, कॉलेज की ढेर सारी लड़कियाँ, कॉलेज के ढेर सारे काम! पर ममी
है कि फूफी को कुछ नहीं कहतीं। बस, हँसती रहती हैं, क्योंकि उस समय घर में जो
रहती हैं ममी! वह भी एकदम ममी बनी हुई।
आपका बंटी उपन्यास पर इतिश्री सिंह के विचार
आपका बंटी एक ऐसी बच्चे की मनो: गाथा है जो अपनी मम्मी और पापा के रिश्तों की
डोर है वह भी उलझा

इतिश्री सिंह
हुआ। मन्नु भंडारी ने जब यह उपन्यास लिखी शायद तब तलाक के उतने मामले न होते
होंगे जितना की आज होता है। आज बात-बात पर रिश्तेटूट जाया करते हैं और दूसरी
बार हो या फिर बार फिर से रिश्ते जुड़ते भी हैं लेकिन इन सबके बीच जिसकी
जिंदगी सूनेपन की गठरी बन जाती है वह है बंटी यानि बंटी जैसे बच्चों को।
लेखिका ने शायद इस समस्या को पहले ही भांप लिया है। लेखिका ने बंटी के माध्यम
से उन तमाम बच्चों की मनोदशा जो कि माता-पिता के विखराब के बीच एक मात्र डोर
हैं, अतुल्य वर्णना दी है जो कि आपको दूसरी बार कहानी पढ़ने से नहीं रोक पाएगा।

यह समीक्षा इतिश्री सिंह राठौर जी द्वारा लिखी गयी है . वर्तमान में आप हिंदी
दैनिक नवभारत के साथ जुड़ी हुई हैं. दैनिक हिंदी देशबंधु के लिए कईं लेख लिखे ,
इसके अलावा इतिश्री जी ने 50 भारतीय प्रख्यात व्यंग्य चित्रकर के तहत 50
कार्टूनिस्टों जीवनी पर लिखे लेखों का अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद किया. इतिश्री
अमीर खुसरों तथा मंटों की रचनाओं के काफी प्रभावित हैं.
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