बहुत बहुत बढिया गुरुजी ।
On Aug 27, 2016 2:49 PM, "shashidharasingh shashidharasingh" <
[email protected]> wrote:

> मानव समाज सौन्दर्योपासक है ,उसकी इसी प्रवृत्ति ने अलंकारों को जन्म दिया
> है। शरीर की सुन्दरता को बढ़ाने के लिए जिस प्रकार मनुष्य ने भिन्न -भिन्न
> प्रकार के आभूषण का प्रयोग किया ,उसी प्रकार उसने भाषा को सुंदर बनाने के लिए
> अलंकारों का सृजन किया। काव्य की शोभा बढ़ाने वाले शब्दों को अलंकार कहते है।
> जिस प्रकार नारी के सौन्दर्य को बढ़ाने के लिए आभूषण होते है,उसी प्रकार भाषा
> के सौन्दर्य के उपकरणों को अलंकार कहते है। इसीलिए कहा गया है - 'भूषण बिना न
> सोहई -कविता ,बनिता मित्त।'
>
> अलंकार के भेद - इसके तीन भेद होते है -
> १.शब्दालंकार २.अर्थालंकार ३.उभयालंकार
>
> १.शब्दालंकार :- जिस अलंकार में शब्दों के प्रयोग के कारण कोई चमत्कार
> उपस्थित हो जाता है और उन शब्दों के स्थान पर समानार्थी दूसरे शब्दों के रख
> देने से वह चमत्कार समाप्त हो जाता है,वह पर शब्दालंकार माना जाता है।
> शब्दालंकार के प्रमुख भेद है - १.अनुप्रास २.यमक ३.शेष
>
> १.अनुप्रास :- अनुप्रास शब्द 'अनु' तथा 'प्रास' शब्दों के योग से बना है ।
> 'अनु' का अर्थ है :- बार- बार तथा 'प्रास' का अर्थ है - वर्ण । जहाँ स्वर की
> समानता के बिना भी वर्णों की बार -बार आवृत्ति होती है ,वहाँ अनुप्रास अलंकार
> होता है । इस अलंकार में एक ही वर्ण का बार -बार प्रयोग किया जाता है । जैसे -
> जन रंजन मंजन दनुज मनुज रूप सुर भूप ।
> विश्व बदर इव धृत उदर जोवत सोवत सूप । ।
>
> २.यमक अलंकार :- जहाँ एक ही शब्द अधिक बार प्रयुक्त हो ,लेकिन अर्थ हर बार
> भिन्न हो ,वहाँ यमक अलंकार होता है। उदाहरण -
> कनक कनक ते सौगुनी ,मादकता अधिकाय ।
> वा खाये बौराय नर ,वा पाये बौराय। ।
> यहाँ कनक शब्द की दो बार आवृत्ति हुई है जिसमे एक कनक का अर्थ है - धतूरा और
> दूसरे का स्वर्ण है ।
>
> ३.श्लेष अलंकार :- जहाँ पर ऐसे शब्दों का प्रयोग हो ,जिनसे एक से अधिक अर्थ
> निलकते हो ,वहाँ पर श्लेष अलंकार होता है । जैसे -
> चिरजीवो जोरी जुरे क्यों न सनेह गंभीर ।
> को घटि ये वृष भानुजा ,वे हलधर के बीर। ।
> यहाँ वृषभानुजा के दो अर्थ है - १.वृषभानु की पुत्री राधा २.वृषभ की अनुजा
> गाय । इसी प्रकार हलधर के भी दो अर्थ है - १.बलराम २.हल को धारण करने वाला बैल
>
> अर्थालंकार
> जहाँ अर्थ के माध्यम से काव्य में चमत्कार उत्पन्न होता है ,वहाँ अर्थालंकार
> होता है । इसके प्रमुख भेद है - १.उपमा २.रूपक ३.उत्प्रेक्षा ४.दृष्टान्त
> ५.संदेह ६.अतिशयोक्ति
>
> १.उपमा अलंकार :- जहाँ दो वस्तुओं में अन्तर रहते हुए भी आकृति एवं गुण की
> समता दिखाई जाय ,वहाँ उपमा अलंकार होता है । उदाहरण -
> सागर -सा गंभीर ह्रदय हो ,
> गिरी -सा ऊँचा हो जिसका मन।
> इसमे सागर तथा गिरी उपमान ,मन और ह्रदय उपमेय सा वाचक ,गंभीर एवं ऊँचा साधारण
> धर्म है।
>
> २.रूपक अलंकार :- जहाँ उपमेय पर उपमान का आरोप किया जाय ,वहाँ रूपक अलंकार
> होता है , यानी उपमेय और उपमान में कोई अन्तर न दिखाई पड़े । उदाहरण -
> बीती विभावरी जाग री।
> अम्बर -पनघट में डुबों रही ,तारा -घट उषा नागरी ।'
> यहाँ अम्बर में पनघट ,तारा में घट तथा उषा में नागरी का अभेद कथन है।
>
> ३.उत्प्रेक्षा अलंकार :- जहाँ उपमेय को ही उपमान मान लिया जाता है यानी
> अप्रस्तुत को प्रस्तुत मानकर वर्णन किया जाता है। वहा उत्प्रेक्षा अलंकार होता
> है। यहाँ भिन्नता में अभिन्नता दिखाई जाती है। उदाहरण -
> सखि सोहत गोपाल के ,उर गुंजन की माल
> बाहर सोहत मनु पिये,दावानल की ज्वाल । ।
> यहाँ गूंजा की माला उपमेय में दावानल की ज्वाल उपमान के संभावना होने से
> उत्प्रेक्षा अलंकार है।
>
> ४.अतिशयोक्ति अलंकार :- जहाँ पर लोक -सीमा का अतिक्रमण करके किसी विषय का
> वर्णन होता है । वहाँ पर अतिशयोक्ति अलंकार होता है। उदाहरण -
> हनुमान की पूंछ में लगन न पायी आगि ।
> सगरी लंका जल गई ,गये निसाचर भागि। ।
> यहाँ हनुमान की पूंछ में आग लगते ही सम्पूर्ण लंका का जल जाना तथा राक्षसों
> का भाग जाना आदि बातें अतिशयोक्ति रूप में कहीं गई है।
>
> ५.संदेह अलंकार :- जहाँ प्रस्तुत में अप्रस्तुत का संशयपूर्ण वर्णन हो ,वहाँ
> संदेह अलंकार होता है। जैसे -
> 'सारी बिच नारी है कि नारी बिच सारी है ।
> कि सारी हीकी नारी है कि नारी हीकी सारी है । '
> इस अलंकार में नारी और सारी के विषय में संशय है अतः यहाँ संदेह अलंकार है ।
>
> ६.दृष्टान्त अलंकार :- जहाँ दो सामान्य या दोनों विशेष वाक्य में बिम्ब
> -प्रतिबिम्ब भाव होता है ,वहाँ पर दृष्टान्त अलंकार होता है। इस अलंकार में
> उपमेय रूप में कहीं गई बात से मिलती -जुलती बात उपमान रूप में दूसरे वाक्य में
> होती है। उदाहरण :-
> 'एक म्यान में दो तलवारें ,
> कभी नही रह सकती है ।
> किसी और पर प्रेम नारियाँ,
> पति का क्या सह सकती है । । '
> इस अलंकार में एक म्यान दो तलवारों का रहना वैसे ही असंभव है जैसा कि एक पति
> का दो नारियों पर अनुरक्त रहना । अतः यहाँ बिम्ब-प्रतिबिम्ब भाव दृष्टिगत हो
> रहा है।
>
> उभयालंकार
> जहाँ काव्य में शब्द और अर्थ दोनों का चमत्कार एक साथ उत्पन्न होता है ,वहाँ
> उभयालंकार होता है । उदाहरण - 'कजरारी अंखियन में कजरारी न लखाय।'
>
> इस अलंकार में शब्द और अर्थ दोनों है।
>
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