Thank u sir bahut achha message sih hindi me likhane ke liye kya karana chahiye.
Shivanand Badiger Hindi Teacher Sri Guru nityanand High school K.K.Halli Tq. Haliyal Dist:Karwar(U.K) 8105332252 2016-10-29 9:58 GMT+05:30 Shreenivas Naik < [email protected]>: > *एकांकी* > > एक अंक वाले नाटकों > <https://hi.m.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%9F%E0%A4%95> को > *एकांकी* कहते हैं। अंग्रेजी > <https://hi.m.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%85%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%9C%E0%A5%80> > के > "वन ऐक्ट प्ले" शब्द के लिए हिंदी > <https://hi.m.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A5%80> > में > "एकांकी नाटक" और "एकांकी" दोनों ही शब्दों का समान रूप से व्यवहार होता है। > > पश्चिम में एकांकी २० वीं शताब्दी में, विशेषत: प्रथम महायुद्ध > <https://hi.m.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A5%E0%A4%AE_%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A5%81%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7>के > बाद, अत्यंत प्रचलित और लोकप्रिय हुआ। हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में उसका > व्यापक प्रचलन इस शताब्दी के चौथे दशक में हुआ। > > इसका यह अर्थ नहीं कि एकांकी साहित्य की सर्वथा आभिजात्यहीन विधा है। पूर्व > और पश्चिम दोनों के नाट्य साहित्य में उसके निकटवर्ती रूप मिलते हैं। सस्कृंत > <https://hi.m.wikipedia.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A4&action=edit&redlink=1> > नाट्यशास्त्र > <https://hi.m.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%9F%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0> > में > नायक के चरित, इतिवृत्त, रस आदि के आधार पर रूपकों और उपरूपकों के जो भेद किए > गए उनमें से अनेक को डॉ॰ कीथ ने एकांकी नाटक कहा है। इस प्रकार "दशरूपक > <https://hi.m.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%A6%E0%A4%B6%E0%A4%B0%E0%A5%82%E0%A4%AA%E0%A4%95>" > और "साहित्यदर्पण > <https://hi.m.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%A6%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AA%E0%A4%A3>" > में वर्णित व्यायोग, प्रहसन, भाग, वीथी, नाटिका, गोष्ठी, सट्टक, नाटयरासक, > प्रकाशिका, उल्लाप्य, काव्य प्रेंखण, श्रीगदित, विलासिका, प्रकरणिका, हल्लीश > आदि रूपकों और उपरूपकों को आधुनिक एकांकी के निकट संबंधी कहना अनुचित न होगा। > "साहित्यदर्पण में "एकांक" शब्द का प्रयोग भी हुआ है : > > भाण : स्याद् धूर्तचरितो नानावस्थांतरात्मक :। > > एकांक एक एवात्र निपुण : पण्डितो विट:।। > > और > > ख्यातेतिवृत्तो व्यायोग: स्वल्पस्त्रीजनसंयुत:। > > हीनो गर्भविमर्शाभ्यां नरैर्बहुभिराश्रित:।। > > एकांककश्च भवेत्... > > पश्चिम के नाट्यसाहित्य में आधुनिक एकांकी का सबसे प्रारंभिक और अविकसित > किंतु निकटवर्ती रूप "इंटरल्यूड' है। १५वीं और १६वीं शताब्दियों में प्रचलित > सदाचार और नैतिक शिक्षापूर्ण अंग्रेजी मोरैलिटी नाटकों के कोरे उपदेश से पैदा > हुई ऊब को दूर करने के लिए प्रहसनपूर्ण अंश भी जोड़ दिए जाते हैं। ऐसे ही खंड > इंटरल्यूड कहे जाते थे। क्रमश: ये मोरैलिटी नाटकों से स्वतंत्र हो गए और अंत > में उनकी परिणति व्यंग्य-विनोद-प्रधान तीन पात्रों के छोटे नाटकों में हुई। > > "कर्टेन रेज़र' या पटोन्नायक कहा जानेवाला एकांकी, जिसकी तुलना संस्कृत > नाटकों के अर्थोपक्षेपक या प्रेक्षणक से की जा सकती है, पश्चिम में आधुनिक > एकांकियों का निकटतम पूर्ववर्ती था। रात्रि में देर से खाना खाने के बाद > रंगशालाओं में आनेवाले संभ्रांत सामाजिकों के कारण समय से आनेवाले साधारण > सामाजिकों को बड़ी असुविधा होती थी। रंगशालाओं के मालिकों ने इस बीच साधारण > सामाजिकों को मनोरंजन में व्यस्त रखने के लिए द्विपात्रीय प्रहसनपूर्ण संवाद > प्रस्तुत करना शुरू किया। इस प्रकार के स्वतंत्र संवाद को ही "कर्टेन रेज़र' > कहा जाता था। इसमें कथानक एवं जीवन के यथार्थ और नाटकीय द्वंद्व का अभाव रहता > था। बाद में "कर्टेन रेज़र' के स्थान पर यथार्थ जीवन को लेकर सुगठित कथानक और > नाटकीय द्वंद्ववाले छोटे नाटक प्रस्तुत किए जाने लगे। इनके विकास का अगला कदम > आधुनिक एकांकी था। > > एकांकी इतना लोकप्रिय हो उठा कि बड़े नाटकों की रक्षा करने के लिए व्यावसायिक > रंगशालाओं ने उसे अपने यहाँ से निकालना शुरू किया। लेकिन उसमें प्रयोग और > विकास की संभावनाओं को देखकर पश्चिम के कई देशों में अव्यावसायिक और > प्रयोगात्मक रंगमंचीय आंदोलनों ने उसे अपना लिया। लंदन, पेरिस, बर्लिन, > डब्लिन, शिकागो, न्यूयार्क आदि ने इस नए ढंग के नाटक और उसके रंगमंच को आगे > बढ़ाया। इसके अतिरिक्त एकांकी नाटक को पश्चिम के अनेक महान् या सम्मानित > लेखकों का बल मिला। ऐसे लेखकों में रूस के चेख़व, गोर्की और एकरीनोव, फ्रांस > के जिराउदो, सार्त्र और एनाइल, जर्मनी के टालर और ब्रेख्ट, इटली के पिरैंदेली > तथा इंग्लैंड, आयरलैंड और अमरीका के आस्कर वाइल्ड, गाल्सवर्दी, जे.एम.बैरी, > लार्ड डनसैनी, सिंज, शिआँ ओ' केसी, यूजीन ओ'नील, नोएल कावर्ड, टी.एस.इलियट, > क्रिस्टोफ़र फ्राई, ग्रैहम ग्रीन, मिलर आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। रंगमंचीय > आंदोलनों और इन लेखकों के सम्मिलित एवं अदम्य प्रयोगात्मक साहस और उत्साह के > फलस्वरूप आधुनिक एकांकी सर्वथा नई, स्वतंत्र और सुस्पष्ट विधा के रूप में > प्रतिष्ठित हुआ। उनकी कृतियों के आधार पर एकांकी नाटकों की सामान्य विशेषताओं > का अध्ययन किया जा सकता है। > > रचना विधान > > सतह पर ही बड़े नाटकों और एकांकियों का आकारगत अंतर स्पष्ट हो जाता है। > एकांकी नाटक साधारणत: २० से लेकर ३० मिनट में प्रदर्शित किए जा सकते हैं, जबकि > तीन, चार या पाँच अंकोंवाले नाटकों के प्रदर्शन में कई घंटे लगते हैं। लेकिन > बड़े नाटकों और एकांकियों का आधारभूत अंतर आकारात्मक न होकर रचनात्मक है। > पश्चिम के तीन से लेकर पाँच अंकोंवाले नाटकों में दो या दो से अधिक कथानकों को > गूँथ दिया जाता था। इस प्रकार उनमें एक प्रधान कथानक और एक या कई उपकथानक होते > थे। संस्कृत नाटकों में भी ऐसे उपकथानक होते थे। ऐसे नाटकों में स्थान या > दृश्य, काल और घटनाक्रम में अनवरत परिवर्तन स्वाभाविक था। लेकिन एकांकी में यह > संभव नहीं। एकांकी किसी एक नाटकीय घटना या मानसिक स्थिति पर आधारित होता है और > प्रभाव की एकाग्रता उसका मुख्य लक्ष्य है। इसलिए एकांकी में स्थान, समय और > घटना का संकलनत्रय अनिवार्य सा माना गया है। कहानी और गीत की तरह एकांकी की > कला घनत्व या एकाग्रता और मितव्ययता की कला है, जिसमें कम से कम उपकरणों के > सहारे ज्यादा से ज्यादा प्रभाव उत्पन्न किया जाता है। एकांकी के कथानक का > परिप्रेक्ष्य अत्यंत संकुचित होता है, एक ही मुख्य घटना होती है, एक ही मुख्य > चरित्र होता है, एक चरमोत्कर्ष होता है। लंबे भाषणों और विस्तृत व्याख्याओं की > जगह उसमें संवादलाघव होता है। बड़े नाटक और एकांकी का गुणात्मक भेद इसी से > स्पष्ट हो जाता है कि बड़े नाटक के कलेवर को काट छाँटकर एकांकी की रचना नहीं > की जा सकती, जिस तरह एकांकी के कलेवर को खींच तानकर बड़े नाटक की रचना नहीं की > जा सकती। > > संस्कृत नाट्यशास्त्र के अनुसार बड़े नाटक के कथानक के विकास की पाँच > स्थितियाँ मानी गई हैं : आरंभ, प्रयत्न, प्राप्त्याशा, नियताप्ति और फलागम। > पश्चिम के नाट्यशास्त्र में भी इन्हीं से बहुत कुछ मिलती जुलती स्थितियों का > उल्लेख है : आरंभ या भूमिका, चरित्रों और घटनाओं के घात प्रतिघात या द्वंद्व > से कथानक का चरमोत्कर्ष की ओर आरोह, चरमोत्कर्ष, अवरोह और अंत। पश्चिम के > नाटकशास्त्र में द्वंद्व पर बहुत जोर दिया गया है। वस्तुत: नाटक द्वंद्व की > कला है; कथा में चरित्रों और घटनाओं के क्रमिक विकास की जगह बड़े नाटक में कुछ > चरित्रों के जीवन के द्वंद्वों को उद्घाटित कर कथानक को चरमोत्कर्ष पर > पहुँचाया जाता है। एकांकी में इस चरमोत्कर्ष की धुरी केवल एक द्वंद्व होता है। > बड़े नाटक के कथानक में द्वंद्वों का विकास काफी धीमा हो सकता है, जिसमें सारी > घटनाएँ रंगमंच पर प्रस्तुत होती हैं, या उस घटना से कुछ ही पूर्व होता है जो > बड़े वेग से द्वंद्व को चरमोत्कर्ष पर पहुँचा देती है। अक्सर यही चरमोत्कर्ष > एकांकी का अंत होता है। जीवन की समस्याओं के यथार्थवादी और मनोवैज्ञानिक > चित्रण के अतिरिक्त रचनाविधान की यह विशेषता आधुनिक एकांकी को संस्कृत और > पश्चिमी नाट्य साहित्य में उसके निकटवर्ती रूपों से पृथक् करती है। > > अक्सर अभिनय के लिए कहानियों के रूपांतर से यह भ्रम पैदा होता है कि एकांकी > कहानी का अभिनेय रूप है। लेकिन रचनाविधान में घनत्व और मितव्ययता की आधारभूत > समानता के बावजूद कहानी और एकांकी में शिल्पगत भेद है। रंगमंच की वस्तु होने > के कारण एकांकी में अभिनय और कथोपकथन का महत्व सबसे ज्यादा है। इन्हीं के > माध्यम से एकांकी चरित्रचित्रण, कथानक और उसके द्वंद्व, वातावरण और घटनाओं के > अनुबंध का निर्माण करता है। कहानी की तरह एकांकी वर्णन का आश्रय नहीं ले सकता। > लेकिन अभिनय की एक मुद्रा कहानी के लंबे वर्णन से अधिक प्रभावशाली हो सकती है। > इसलिए रंगमंच एकांकी की सीमा और शक्ति दोनों है। इसकी पहचान न होने के कारण > अनेक सफल कहानीकार असफल एकांकीकार रह जाते हैं। > > इसी प्रकार किसी विषय पर रोचक संभाषण या कथोपकथन को एकांकी समझना भ्रममात्र > है। जीवन के यथार्थ, घटना या कथानक, चरित्रों के द्वंद्व, संकलनत्रय इत्यादि > के अभाव में संभाषण केवल संभाषण रह जाता है, उसे एकांकी की संज्ञा नहीं दी जा > सकती। > > एकांकी की अद्भुत संभावनाओं के कारण आधुनिक काल में उसका विकास अनेक दिशाओं > में हुआ है। रेडियो रूपक, संगीत तथा काव्यरूपक और मोनोलोग या स्वगत नाट्य इन > नई दिशाओं की कुछ महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हैं। रेडियो के माध्यम से इन सबके > क्षेत्र में निरंतर प्रयोग हो रहे हैं। रंगमंच, सदेह अभिनेताओं और > अभिनेत्रियों, उनके अभिनय और मुद्राओं के अभाव में रेडियो रूपक को शब्द और > उनकी ध्वनि तथा चित्रात्मक शक्ति का अधिक से अधिक उपयोग करना पड़ता है। मूर्त > उपकरणों का अभाव रेडियो रूपक के लिए सर्वथा बाधा ही नहीं, क्योंकि शब्द और > ध्वनि को उनके मूर्त आधारों से पृथक् कर नाटककार श्रोताओं के ध्यान को > चरित्रों के आंतरिक द्वंद्वों पर केंद्रित कर सकता है। रेडियो रूपक मुश्किल से > ५० वर्ष पुराना रूप है। प्रारंभिक अवस्था में इसमें किसी कहानी को अनेक > व्यक्तियों के स्वरों में प्रस्तुत किया जाता था और रंगमंच का भ्रम उत्पन्न > करने के लिए पात्रों की आकृतियों, वेशभूषा, साज सज्जा, रुचियों इत्यादि के > विस्तृत वर्णन से यथार्थ वातावरण के निर्माण का प्रयत्न किया जाता था। अमरीका, > जर्मनी, इंग्लैंड आदि पश्चिमी देशों में रेडियो एकांकी के प्रयोगों ने उसके > रूप को विकसित किया और निखारा। रेडियो के लिए कई प्रसिद्ध अमरीकी और अंग्रेज > कवियों ने काव्यरूपक लिखे। उनमें मैक्लीश, स्टीफ़ेन विंसेंट बेने, कार्ल, > सैंडवर्ग, टाइरोम ग्थ्रुाी, लूई मैकनीस, सैकविल वेस्ट, पैट्रिक डिकिंसन, डीलन > टामस आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। इन प्रयोगों से प्रेरणा ग्रहण कर हिंदी और > अन्य भारतीय भाषाओं के एकांकीकारों ने भी रेडियो रूपक, गीतिनाट्य और काव्यरूपक > प्रस्तुत किए हैं। पर इनमें अभी अनेक त्रुटियाँ हैं। > > हिंदी एकांकी का इतिहास > > हिंदी साहित्य के इतिहासकार एकांकी का प्रारंभ भारतेंदुयुग से मानते हैं। > प्रसाद के "एक घूँट' (१९२९ ई.) से दूसरा चरण, भुवनेश्वरप्रसाद के "कारवाँ' > (१९३५ ई.) से तीसरा तथा डॉ॰ रामकुमार वर्मा के "रेशमी टाई' (१९४१ ई.) संकलन से > चौथे चरण की शुरूआत कही गई है। किंतु उक्त कालविभाजन में उन एकांकीकारों को > सम्मिलित नहीं किया गया है, जिन्होंने १९५५ ई. के आसपास लिखना प्रारंभ किया है > और आज भी लिख रहे हैं। अत: हिंदी एकांकी का अद्यतन इतिहास संक्षेप में इस > प्रकार है : > > (१) भारतेंदुकाल में दो प्रकार के एकांकी लिखे गए। प्रथम, अनूदित या छायांकित > एकांकी तथा द्वितीय, मौलिक एकांकी। पहली कोटि में भारतेंदु का बॅगला के > "भारतमाता' का अनुवाद "भारत जननी'; राधाचरण गोस्वामी द्वारा बँगला के "भारतेर > यवन' का अनुवाद "भारतवर्ष में यवन लोग', कांचनाचार्य कृत "धनंजय विजय' का > छायाविष्ट रूपक, अयोध्यसिहं उपाध्याय का "प्रद्युम्नविजय व्यायोग' आदि हैं। > दूसरी कोटि में भारतेंदुकृत "विषस्यविषमौषधम्', "प्रेमजोगिनी' (अपूर्ण), > गीतिरूपक "नीलदेवी' तथा "सतीप्रताप' (अपूर्ण); राधाचरण गोस्वामी कृत "तनमनधन > गोसाई के अरपन', "सती चंद्रावली', "अमरसिंह राठौर', एवं "श्रीदामा'; किशोरीलाल > गोस्वामी का "चौपट चपेट'; राधाकृष्णदास का "दु:खिनीबाला'; अंबिकादत्त व्यास > रचित "कलियुग और घी' तथा "मन की उमंग'; श्रीशरण का "बालविवाह'; बालकृष्ण भट्ट > के "कलिराज की सभा', "रेल का विकट खेल' तथा "बाल विवाह'; प्रतापनारायण मिश्र > का "कलिकौतुक'; देवकीनंदन त्रिपाठी कृत "जय नरसिंह की'; काशीनाथ खत्री के > "सिंधु देश की राजकुमरियाँ', गुन्नौर की रानी' एवं "लजबो का स्वप्न'; लाला > श्रीनिवासदास का "प्रह्लाद चरित'; बदरीनारायण प्रेमघन का "प्रयाग रामागमन'; > कृष्णशरण सिंह गोपकृत "माधुरी' आदि एकांकी आते हैं। > > ऐतिहासिक आख्यान तथा समाजसुधार के प्रसंग ही उपर्युक्त एकांकियों के विषय > हैं। इन्हें आधुनिक एकांकी का प्रांरभिक रूप कहा जा सकता है। कला का विकसित > रूप इनमें नहीं मिलता; शैलियाँ परस्पर कुछ भिन्न हैं पर परंपरा एक ही है। उक्त > एकांकी अभिनेय की अपेक्षा पाठय अधिक हैं। लेखकों का झुकाव जीवन की स्थूलता का > वर्णन करने की ओर है; वृत्तियों की सूक्ष्म विवृत्ति इनमें नहीं मिलती। > प्ररोचना, प्रस्तावना, सूत्रधार, नांदी, मंगलाचरण, एकाधिक दृश्ययोजना, > भरतवाक्य आदि के प्रयोग कहीं हैं, कहीं नहीं भी हैं। आकार सर्वत्र लंबे हैं, > अंक भी दृश्य और दृश्य भी गर्भाक जैसे हो गए हैं। संकलनत्रय के निर्वाह का > अभाव है, शिथिल संवादों का बाहुल्य एवं विकास तथा विन्यासहीन कथायोजना का > आधिक्य है। इनमें से कुछ प्रहसन के रूप में लिखे गए हैं, पर उनमें निर्मल > हास्य न होकर व्यंग्य की मात्रा ही अधिक है। एकांकी के लिए अपेक्षित प्रमुख > गुण कार्य (ऐक्शन) का इनमें अभाव है। > > (२) एकांकी के दूसरे युग में जयशंकर प्रसाद का "एक घूँट' लिखा गया जिसपर > संस्कृत का भी प्रभाव है और बँगला के माध्यम से आए पाश्चात्य एकांकी शिल्प का > भी। प्रसाद जी ने इसी बीच "कल्याणी परिणय' भी लिखा, पर वह अभी तक अप्रकाशित > है। साथ ही, इसे उनके "चद्रंगुप्त' नाटक का एक भाग भी कहा जा सकता है। > फ्रांसीसी नाटककार मोलियर के कुछ प्रहसनों का भी इस दौरान हिंदी में अनुवाद > हुआ। "एक घूँट' में एकांकी के कमोबेश लगभग सभी आधुनिक लक्षण मिल जाते हैं। > विवाह समस्या का विवेचन एवं समाधान भावुकतापूर्ण शैली में किया गया है। परंतु > "एक घूँट' एक ही रह गया; अन्य लेखकों को यह एकांकी लेखन की ओर प्रवृत्त न कर > सका। > > (३) एकांकी का तीसरा चरण भुवनेश्वप्रसाद के "कारवाँ' संग्रह से शुरू होता है > जिसमें छह एकांकी हैं। १९३८ ई में "हंस' का एकांकी अंक प्रकाशित हुआ। इसमें > तत्कालीन प्रतिनिधि एकांकी प्रस्तुत किए गए। इसी बीच सत्येंद्र का "कुनाल', > पृथ्वीनाथ शर्मा का "दुविधा', रामकुमार वर्मा का "पृथ्वीराज की आँखें'; > सूर्यशरण पारीक का "बैलावण या प्रतिज्ञापूर्ति' आदि प्रकाशित हुए। उदयशंकर > भट्ट, सेठ गोविंददास प्रभृति एकांकीकार भी इसी काल में एकांकी लेखन की ओर > प्रवृत्त हुए और उनके कई सशक्त एकांकी प्रकाश में आए। > > इस युग में प्रख्यात और उत्पाद्य दोनों प्रकार के कथानकों को लेकर एकांकी > लिखे गए। इनमें विवाहादि सामाजिक तथा साम्यावादादि राजनीतिक समस्याएँ प्रमुख > रूप से उभरी हैं। प्राचीन विचारधारा की वकालत जोरदार शब्दों में की गई है, > परंतु इसके साथ नवीन को अपनाने का आग्रह भी स्पष्ट दिखाई पड़ता है। पश्चिमी > विचार ओर शैली के प्रभाव को लेकर एकांकी ने अपने रूप रंग में पर्याप्त > परिवर्तन किया और इसकी तकनीक में यत्किंचित् स्थिरता आई। देखा जाए, तो यह काल > एकांकी विधा का परिमार्जन काल था। लेखकों ने इस समय का सदुपयोग कर अपने हाथ > साधे। सन् १९३५ ई. से रेडियो प्रसारणों के अंतर्गत एकांकियों को भी स्थान > दिया जाने लगा था, अत: रेडियो एकांकी अथवा ध्वनिनाटक भी काफी संख्या में लिखे > जाने लगे। > > (४) चतुर्थ चरण तक पहुँचते-पहुँचते एकांकी का स्वरूप, शिल्प आदि पूरी तरह > स्थिर हो जाते हैं, उनका प्रामाणिक रूप सामने आता है। इससे पहले तो वह अपना > सही रूप तलाशने में लगा था। डॉ॰ रामकुमार वर्मा के "रेशमी टाई' एकांकीसंग्रह > से इस युग का सूत्रपात हुआ, यह पहले ही बताया जा चुका है। इसके अतिरिक्त वर्मा > जी के "ऐक्ट्रेस', "रजनी की रात', "एक तोले अफीम की कीमत', "परीक्षा', "नहीं > का रहस्य', "कहाँ से कहाँ', "चारुमित्रा', "दस मिनट' आदि एकांकी प्रसिद्ध हैं। > पहाड़ी का "युग युग द्वारा शक्तिपूजा'; भुवनेश्वर के "शैतान', "स्ट्राइक', > "असर', "ताँबे के कीड़े'; भगवतीचरण वर्मा के "संदेह का अंत', "दो कलाकार', > "सबसे बड़ा आदमी'; उपेंद्रनाथ अश्क कृत "जोंक', "समझौता', "घड़ी', "छठा बेटा', > "लक्ष्मी का स्वागत', "विभा', "तौलिये', "आदिमार्ग'; उदयशंकर भट्ट के "दो > अतिथि', "वर निर्वाचन', "मुंशी अनोखेलाल', "असली नकली', "नेता', "सेठ भालचंद', > "मनुमानव', "आदिम युग'; सेठ गोविंददास रचित "विटेमन', "अधिकार लिप्सा', "वह > मरा क्यों', "हंगर स्ट्राइक', "कंगाल नहीं', "ईद और होली'; पांडेय बेचन शर्मा > उग्र के "राम करे सो होय', "मियाँ भाई', "अफजल वध'; वृंदावनलाल वर्मा कृत > "पीले हाथ', "सगुन' "जहाँदार शाह', "कश्मीर का काँटा', "मानव'; एस.पी. खत्री > के "चौराहा', "माँ', "मछुए की माँ', "ठाकुर का घर', "बंदर की खोपड़ी'; विष्णु > प्रभाकर के "माँ का हृदय', "संस्कार और भावना', "रक्तचंदन', "माँ बाप'; > जगदीशचंद्र माथुर के "भोर का तारा', "रीढ़ की हड्डी', मकड़ी का जाला', > "कलिंगविजय', "खंडहर'; लक्ष्मीनारायण मिश्र का "एक दिन'; सद्गुरुशरण अवस्थी के > "मुद्रिका', "कालीवध'; गणेशप्रसाद द्विवेदी के "सोहाग की बिंदी', "दूसरा उपाय > ही क्या है', "शर्मा जी', "सर्वस्व समर्पण' आदि प्रमुख एकांकी इसी काल की देन > हैं। > > इस युग के एकांकी स्वतंत्र एवं सचेष्ट भाव से लिखे गए हैं। अत: विषय की > अपेक्षा शिल्प उनमें विशेष है। बौद्धिक उत्सुकता, मानसिक विश्लेषण, > अंतर्द्वंद्व की अभिव्यक्ति, हास्य तथा चुटीले व्यंग्य, संवादों की कसावट, > मार्मिक स्थलों का चयन, यथार्थ प्रस्तुतीकरण के प्रति आग्रह, मनोवैज्ञानिक > कार्यव्यवहार, पद्य का लगभग अभाव, सामान्य नायक की स्वीकृति, रंगसंकेत आदि > उत्तरोत्तर बढ़ते गए हैं। युग की विभिन्न एवं विविध अभिरुचियों के अनुसार इस > समय के एकांकियों के विषय भी अनेक रहे हैं, जिनमें प्रेम, विवाह, घृणा, > क्रूरता, हत्या, पौराणिक आख्यान, लोकगाथात्मक एवं लोकविश्रुत वीरों तथा राजाओं > के कृत्य, सामाजिक कुरीतियाँ, वर्गसंघर्ष, देशभक्ति, हिंदु-मुसलमान-भ्रातृत्व, > सत्याग्रह, यौनाकर्षण आदि प्रमुख हैं। ध्वनि नाटक भी इस बीच अधिक संख्या में > लिखे गए हैं। > > (५) हिंदी एकांकी पाँचवाँ अथवा अंतिम चरण एकांकी की विविध विधाओं को लेकर > प्रारंभ होता है जिनमें मंच एवं ध्वनि एकांकी के अलावा "ओपेन एयर एकांकी', > "चित्र एकाकी' (टेलिविजन पर दिखाए जानेवाले) "गली एकांकी' आदिश्श्सम्मिलित किए > जा सकते हैं। डॉ॰ लक्ष्मीनारायण कृत "बसंत ऋतु का नाटक', "मम्मी ठकुराइन', > "राजरानी'; देवराज दिनेश के "समस्या सुलझ गई', "तुलसीदास', "रिश्वत के अनेक > ढंग'; जयनाथ नलिन रचित "भक्तों की दीनता'; सत्येंद्र शरत् कृत "नवजोती की नई > हिरोइन'; विनोद रस्तोगी का "बहू की विदा'; चिरंजीत के "चक्रव्यूह' "ढोल की > पोल', (ध्वनि नाटक), पाँच प्रहसन' (संकलन); रेवतीशरण शर्मा कृत "तलाक'; विमला > लूथरा का "अपना घर'; ज्ञानदेव अग्निहोत्री का "रोटीवाली गली'; कृष्णकिशोर > श्रीवास्तव के "सत्यकिरण', "मछली के आँसू', "आस्तीन के साँप'; इंदुशेखर का > "महल्ले की आबरू'; स्वामीनाथ कृत आई.ए.एस.'; राजेंद्रकुमार शर्मा के "पर्दा > उठने से पहले', "रेत की दीवार', "अटैची केस', अरुण रचित "रेलगाड़ी के डिब्बे', > "भोर की किरणें'; श्रीकृष्ण कृत "माँ जी', "तरकश के तीर'; मुक्ता शुक्ल के > "पर्दे और परछाइयाँ'; "भीतरी छाया', कुमार राजेंद्र कृत "आदमखोर' (ओपेन एयर > एकांकी); कंचनकुमार लिखित "सूअर बाड़े का जमादार' (गली एकांकी) आदि इस खेवे की > प्रमुख रचनाएँ हैं। > > इस काल में कुछ बेमानी (ऐब्सर्ड) एकांकी भी लिखे गए हैं जिनमें सत्यदेव दुबे > कृत "थोड़ी देर पहले और थोड़ी देर बाद'; धर्मचंद्र जैन का "चेहरों के चेहरे'; > मोहन राकेश का बीज नाटक "शायद' आदि उल्लेख्य हैं। डॉ॰ लक्ष्मीनारायण लाल, मोहन > राकेश, विष्णु प्रभाकर, गंगाधर शुक्ल, विनोद रस्तोगी, उपेंद्रनाथ अश्क, > कमलेश्वर तथा मनहर चौहान ने इधर बहुत से चित्रएकांकी भी प्रस्तुत किए हैं। > > पाँचवें चरण के एकांकियों में या तो पाश्चात्य रचनाप्रक्रिया को कठोरता के > साथ ग्रहण किया गया है अथवा उसमें प्रतिभा और बुद्धि से नए वस्तुविधान, नई > अभिव्यंजना द्वारा मौलिक रूप का निर्माण कर लिया गया है। गीतों का इनमें एकांत > अभाव है, प्रकाश का जमकर उपयोग किया गया है, जिसमें पर्दो की जरूरत बहुत कुछ > समाप्त हो गई है। संवाद अत्यंत कसे हुए तथा चुटीले हैं। जीवन के नए ढंग, उसकी > आशाओं, निराशाओं, छोटी छोटी समस्याओं तथा प्रति दिन की सामान्य घटनाओं को लेकर > ये एकांकी रचे गए हैं। चित्र एकांकियों ने "आउट-डोर-हीनता' को तोड़ा है। इसमें > अब पहाड़ी नदी की चंचलता, सड़कों पर भागती कारें, समुद्र में चलते यान, आकाश > में शत्रुविमानों से जूझते "नैट' आदि दिखाए जाते हैं। गली एकांकी ने मंच को > तोड़ा है तो बेमानी एकांकियों ने दर्शकों को ही मंचपर लाकर खड़ा कर दिया है। > > -- > 1. Webpage for this HindiSTF is : https://groups.google.com/d/ > forum/hindistf > Hindi KOER web portal is available on http://karnatakaeducation.org. > in/KOER/en/index.php/Portal:Hindi > > 2. For Ubuntu 14.04 installation, visit http://karnatakaeducation.org. > in/KOER/en/index.php/Kalpavriksha (It has Hindi interface also) > > 3. For doubts on Ubuntu and other public software, visit > http://karnatakaeducation.org.in/KOER/en/index.php/ > Frequently_Asked_Questions > > 4. If a teacher wants to join STF, visit http://karnatakaeducation.org. > in/KOER/en/index.php/Become_a_STF_groups_member > > 5. Are you using pirated software? Use Sarvajanika Tantramsha, see > http://karnatakaeducation.org.in/KOER/en/index.php/Why_public_software > सार्वजनिक संस्थानों के लिए सार्वजनिक सॉफ्टवेयर > --- > You received this message because you are subscribed to the Google Groups > "HindiSTF" group. > To unsubscribe from this group and stop receiving emails from it, send an > email to [email protected]. > To post to this group, send email to [email protected]. > Visit this group at https://groups.google.com/group/hindistf. > To view this discussion on the web, visit https://groups.google.com/d/ > msgid/hindistf/CAOWNnMGNVVm4M%2B7NiztxZGat8V2%2BOZZ9KG-- > TaiKUNDsYCfzvA%40mail.gmail.com > <https://groups.google.com/d/msgid/hindistf/CAOWNnMGNVVm4M%2B7NiztxZGat8V2%2BOZZ9KG--TaiKUNDsYCfzvA%40mail.gmail.com?utm_medium=email&utm_source=footer> > . > For more options, visit https://groups.google.com/d/optout. > -- 1. Webpage for this HindiSTF is : https://groups.google.com/d/forum/hindistf Hindi KOER web portal is available on http://karnatakaeducation.org.in/KOER/en/index.php/Portal:Hindi 2. For Ubuntu 14.04 installation, visit http://karnatakaeducation.org.in/KOER/en/index.php/Kalpavriksha (It has Hindi interface also) 3. For doubts on Ubuntu and other public software, visit http://karnatakaeducation.org.in/KOER/en/index.php/Frequently_Asked_Questions 4. If a teacher wants to join STF, visit http://karnatakaeducation.org.in/KOER/en/index.php/Become_a_STF_groups_member 5. Are you using pirated software? Use Sarvajanika Tantramsha, see http://karnatakaeducation.org.in/KOER/en/index.php/Why_public_software सार्वजनिक संस्थानों के लिए सार्वजनिक सॉफ्टवेयर --- You received this message because you are subscribed to the Google Groups "HindiSTF" group. To unsubscribe from this group and stop receiving emails from it, send an email to [email protected]. To post to this group, send an email to [email protected]. Visit this group at https://groups.google.com/group/hindistf. To view this discussion on the web, visit https://groups.google.com/d/msgid/hindistf/CAOqh_pEZLbJ19Dmt4NGsQJ3HQVBL1XS1_5i0-9S7DWPNzzDfyw%40mail.gmail.com. For more options, visit https://groups.google.com/d/optout.
