हिडिम्बा तथा घटोत्कच के चले जाने के पश्चात् पाण्डव अपनी माता कुन्ती के साथ
किसी सुरक्षित स्थान की खोज में आगे बढ़े। मार्ग में उनकी भेंट वेद व्यास से हो
गई। वेद व्यास ने उन्हें एकचक्रा नगरी में निवास करने की सलाह दी। वे एकचक्रा
नगरी में एक ब्राह्मण के घर में रहने लगे तथा भिक्षा माँग कर जीवन यापन करने
लगे।

एक दिन कुन्ती और भीम को छोड़ कर जब शेष पाण्डव भिक्षा माँगने के चले गये थे,
अकस्मात उस ब्राह्मण के घर के सदस्य विलाप करने लगे। कुन्ती के पूछने पर
ब्राह्मणी ने बताया, "बहन! एकचक्रा नगरी के बाहर बक नाम का एक दैत्य रहता है।
प्रतिदिन उस दैत्य के लिये भोजन ले कर नगर से एक व्यक्ति को भेजा जाता है और
बकासुर भोजन के साथ उस व्यक्ति को भी खा जाता है। आज हमारे घर से एक सदस्य
भेजने की बारी है।" ब्राह्मणी के वचनों को सुन कर कुन्ती ने कहा, "तुम चिन्ता
मत करो। तुम लोगो ने हमे निवास के लिये स्थान प्रदान करके बहुत कृपा की है। अब
तुम लोगों के कष्ट को दूर करना हमारा कर्तव्य है। मैं तुम्हारे घर के सदस्य के
बदले अपने पुत्र को बकासुर के पास भेज दूँगी।" इस पर ब्राह्मणी बोली, "जो मेरे
शरणागत हैं, उन्हें मैं विपदा में कैसे डाल सकती हूँ?" कुन्ती ने कहा, "बहन!
तुम तनिक भी चिन्ता मत करो। मेरा पुत्र इतना शक्तिशाली है कि ऐसे दैत्य उसका
कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते।"

कुन्ती ने भीम को बक दैत्य के पास रात्रि में चले जाने की आज्ञा दी। बकासुर के
भोजन से भरी गाड़ी के साथ भीम वहाँ जा पहुँचे जहाँ बकासुर रहता था और उसके
द्वार में जा कर उसको आवाज लगाने लगे। दैत्य के बाहर आने पर भीम ने उसके भोजन
को स्वयं खाना आरम्भ कर दिया। एक मनुष्य को अपना भोजन खते देख कर बकासुर के
क्रोध की सीमा न रही और वह भीमसेन पर टूट पड़ा। भीम ने उसकी परवाह न करते हुये
समस्त भोजन को खा डाला। फिर डकार लेते हुये बोले, "चलो, अब तुझ से निबटता हूँ।
तूने तो अनेक मनुष्यों का रक्त चूसा है, आज उसका फल तुझे मिलेगा।" इतना कह कर
भीम ने उसे उठा लिया और हवा में घुमा कर वेग के साथ भूमि पर पटक दिया। पृथ्वी
पर गिरते ही उसके प्राण पखेरू उड़ गये। भीम ने उसके मृत शरीर को एकचक्रा नगर के
प्रवेश द्वार पर ला कर लटका दिया।

प्रातःकाल जब एकचक्रएकचक्रा नगर के निवासियों ने बकासुर की लाश को द्वार पर
लटकते देखा तो उनकी प्रसन्नता की सीमा न रही।

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