On Nov 25, 2016 3:58 PM, "Shreenivas Naik" <
[email protected]> wrote:

> *शेख सादी* (शेख मुसलिदुद्दीन सादी), 13वीं शताब्दी का सुप्रसिद्ध
> साहित्यकार। ईरान के दक्षिणी प्रांत में स्थित शीराज नगर में 1185 या 1186 में
> पैदा हुआ था। उसकी प्रारंभिक शिक्षा शीराज़ में ही हुई। बाद में उच्च शिक्षा
> के लिए उसने बगदाद
> <https://hi.m.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AC%E0%A4%97%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%A6>
>  के
> निज़ामिया कालेज में प्रवेश किया। अध्ययन समाप्त होने पर उसने इसलामी दुनिया
> के कई भागों की लंबी यात्रा पर प्रस्थान किया - अरब, सीरिया, तुर्की, मिस्र,
> मोरक्को, मध्य एशिया और संभवत: भारत भी, जहाँ उसने सोमनाथ का प्रसिद्ध मंदिर
> देखने की चर्चा की है। सीरिया में धर्मयुद्ध में हिस्सा लेनेवाले यात्रियों ने
> उसे गिरफ्तार कर लिया, जहाँ से उसके एक पुराने साथी ने सोने के दस सिक्के
> (दीनार) मुक्तिधन के रूप में देकर उसका उद्धार किया। उसी ने 100 दीनार दहेज
> में देकर अपनी लड़की का विवाह भी सादी से कर दिया। यह लड़की बड़ी उद्दंड और
> दुष्ट स्वभाव की थी। वह अपने पिता द्वारा धन देकर छुड़ाए जाने की चर्चा कर
> सादी को खिजाया करती थी। ऐसे ही एक अवसर पर सादी ने उसके व्यंग्य का उत्तर
> देते हुए जवाब दिया 'हाँ, तुम्हारे पिता ने दस दीनार देकर जरूर मुझे आजाद
> कराया था लेकिन फिर सौ दीनार के बदले उसने मुझे पुन: दासता के बंधन में बाँध
> दिया।'
>
> कई वर्षों की लंबी यात्रा के बाद सादी शीराज़ लौट आया और अपनी प्रसिद्ध
> पुस्तकों - 'बोस्ताँ' तथा 'गुलिस्ताँ' - के लेखन का आरंभ किया। इनमें उसके
> साहसिक जीवन की अनेक मनोरंजक घटनाओं का और विभिन्न देशों में प्राप्त अनोखे
> तथा मूल्यवान्‌ अनुभवों का वर्णन है। वह शताधिक वर्षों तक जीवित रहा और सन्‌
> 1292 के लगभग उसका देहांत हुआ।
>
> गुलिस्ताँ
> <https://hi.m.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%97%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%81>
>  का
> प्रणयन सन्‌ 1258 में पूरा हुआ। यह मुख्य रूप से गद्य में लिखी हुई
> उपदेशप्रधान रचना है जिसमें बीच बीच में सुंदर पद्य और दिलचस्प कथाएँ दी गई
> हैं। यह आठ अध्यायों में विभक्त है जिनमें अलग अलग विषय वर्णित हैं; उदाहरण के
> लिए एक में प्रेम और यौवन का विवेचन है। 'गुलिस्ताँ' ने प्रकाशन के बाद से
> अद्वितीय लोकप्रियता प्राप्त की। वह कई भाषाओं में अनूदित हो चुकी है - लैटिन,
> फ्रेंच, अंग्रेजी, तुर्की, हिंदुस्तानी आदि। अनेक परवर्ती लेखकों ने उसका
> प्रतिरूप प्रस्तुत करने का प्रयास किया, किंतु उसकी श्रेष्ठता तक पहुँचने में
> वे असफल रहे। ऐसी प्रतिरूप रचनाओं में से दो के नाम हैं - बहारिस्ताँ तथा
> निगारिस्ताँ।
>
> बोस्ताँ
> <https://hi.m.wikipedia.org/w/index.php?title=%E0%A4%AC%E0%A5%8B%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%81&action=edit&redlink=1>
>  की
> रचना एक वर्ष पहले (1257 में) हो चुकी थी। सादी ने उसे अपने शाही संरक्षक
> अतालीक को समर्पित किया था। गुलिस्ताँ की तरह इसमें भी शिक्षा और उपदेश की
> प्रधानता है। इसके दस अनुभाग है। प्रत्येक में मनोरंजक कथाएँ हैं जिनमें किसी
> न किसी व्यावहारिक बात या शिक्षा पर बल दिया गया है। एक और पुस्तक पंदनामा (या
> करीमा) भी उनकी लिखी बताई जाती है किंतु इसकी सत्यता में संदेह है। सादी
> उत्कृष्ट गीतिकार भी थे और हाफिज के आविर्भाव के पहले तक वे गीतिकाव्य के
> महान्‌ रचयिता माने जाते थे। अपनी कविताओं के कई संग्रह वे छोड़ गए हैं।
>
> फारस के अन्य बहुत से कवियों की तरह सादी सूफी नहीं थे। वे व्यावहारिक
> व्यक्ति थे जिनमें प्रचुर मात्रा में सांसारिक बुद्धि एवं विलक्षण परिहासशीलता
> विद्यमान थी। उनकी ख्याति उनकी काव्यशैली एवं गद्य की उत्कृष्टता पर ही
> अवलंबित नहीं है वरन्‌ इस बात पर भी आश्रित है कि उनकी रचनाओं में अपने युग की
> विद्वत्ता और ज्ञान की तथा मध्यकालीन पूर्वी समाज की सर्वोत्कृष्ट सांस्कृतिक
> परंपरा की छाप मौजूद है।
>

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