Dhanyavad Sir

On 29 Nov 2016 9:20 p.m., "Shreenivas Naik" <
[email protected]> wrote:

> समास
>
> परिभाषा:
>
> ‘समास’ शब्द का शाब्दिक अर्थ होता है ‘छोटा-रूप’। अतः जब दो या दो से अधिक
> शब्द
>
> (पद) अपने बीच की विभक्तियों का लोप कर जो छोटा रूप बनाते
> हैं, उसे समास,
> सामासिक
>
> शब्द या समस्त पद कहते हैं। जैसे ‘रसोई के लिए घर’ शब्दों में से ‘के लिए’
> विभक्ति का लोप
>
> करने पर नया शब्द बना ‘रसोई घर’, जो एक सामासिक शब्द है।
>
> किसी समस्त पद या सामासिक शब्द को उसके विभिन्न पदों
> एवं विभक्ति सहित पृथक् करने
>
> की क्रिया को समास का विग्रह कहते हैं जैसे विद्यालय
> विद्या के लिए आलय, माता-पिता=माता
>
> और पिता।
>
> प्रकार:
>
> समास छः प्रकार के होते हैं-
>
> 1. अव्ययीभाव समास,
> 2. तत्पुरुष समास
> 3. द्वन्द्व समास
> 4.बहुब्रीहि समास
> 5. द्विगु समास
> 6. कर्म धारय समास
>
> 1.अव्ययीभाव समास:-
>
> अव्ययीभाव समास में प्रायः
>
> (i)पहला पद प्रधान होता है।
>
> (ii) पहला पद या पूरा पद अव्यय होता है।
> (वे शब्द जो लिंग, वचन, कारक,
> काल के
>
> अनुसार नहीं बदलते, उन्हें अव्यय कहते हैं)
>
> (iii)यदि एक शब्द की पुनरावृत्ति हो और
> दोनों शब्द मिलकर अव्यय की तरह प्रयुक्त
>
> हो, वहाँ भी अव्ययीभाव समास होता है।
>
> (iv) संस्कृत के उपसर्ग युक्त पद भी अव्ययीभव समास होते हैं-
>
> यथाशक्ति = शक्ति के अनुसार।
>
> यथाशीघ्र = जितना शीघ्र हो
>
> यथाक्रम = क्रम के अनुसार
>
> यथाविधि = विधि के अनुसार
>
> यथावसर = अवसर के अनुसार
>
> यथेच्छा = इच्छा के अनुसार
>
> प्रतिदिन = प्रत्येक दिन। दिन-दिन। हर दिन
>
> प्रत्येक = हर एक। एक-एक। प्रति एक
>
> प्रत्यक्ष = अक्षि के आगे
>
> घर-घर = प्रत्येक घर। हर घर। किसी भी घर को न छोड़कर
>
> हाथों-हाथ = एक हाथ से दूसरे हाथ तक। हाथ ही हाथ में
>
> रातों-रात = रात ही रात में
>
> बीचों-बीच = ठीक बीच में
>
> साफ-साफ = साफ के बाद साफ। बिल्कुल साफ
>
> आमरण = मरने तक। मरणपर्यन्त
>
> आसमुद्र = समुद्रपर्यन्त
>
> भरपेट = पेट भरकर
>
> अनुकूल = जैसा कूल है वैसा
>
> यावज्जीवन = जीवनपर्यन्त
>
> निर्विवाद = बिना विवाद के
>
> दर असल = असल में
>
> बाकायदा = कायदे के अनुसार
>
> 2.तत्पुरुष समास:-
>
> (i)तत्पुरुष समास में दूसरा पद (पर पद)
> प्रधान होता है अर्थात् विभक्ति का लिंग, वचन
>
> दूसरे पद के अनुसार होता है।
>
> (ii) इसका विग्रह करने पर कत्र्ता व सम्बोधन
> की विभक्तियों (ने, हे, ओ,
> अरे) के अतिरिक्त
>
> किसी भी कारक की विभक्ति प्रयुक्त होती है तथा विभक्तियों
> के अनुसार ही इसके उपभेद होते
>
> हैं।
>
> जैसे –
>
> (क) कर्म तत्पुरुष (को)
>
> कृष्णार्पण = कृष्ण को अर्पण
>
> नेत्र सुखद = नेत्रों को सुखद
>
> वन-गमन = वन को गमन
>
> जेब कतरा = जेब को कतरने वाला
>
> प्राप्तोदक = उदक को प्राप्त
>
> (ख) करण तत्पुरुष (से/के द्वारा)
>
> ईश्वर-प्रदत्त = ईश्वर से प्रदत्त
>
> हस्त-लिखित = हस्त (हाथ) से लिखित
>
> तुलसीकृत = तुलसी द्वारा रचित
>
> दयार्द्र = दया से आर्द्र
>
> रत्न जडि़त = रत्नों से जडि़त
>
> (ग) सम्प्रदान तत्पुरुष (के लिए)
>
> हवन-सामग्री = हवन के लिए सामग्री
>
> विद्यालय = विद्या के लिए आलय
>
> गुरु-दक्षिणा = गुरु के लिए दक्षिणा
>
> बलि-पशु = बलि के लिए पशु
>
> (घ) अपादान तत्पुरुष (से पृथक्)
>
> ऋण-मुक्त = ऋण से मुक्त
>
> पदच्युत = पद से च्युत
>
> मार्ग भ्रष्ट = मार्ग से भ्रष्ट
>
> धर्म-विमुख = धर्म से विमुख
>
> देश-निकाला = देश से निकाला
>
> (च) सम्बन्ध तत्पुरुष (का, के, की)
>
> मन्त्रि-परिषद् = मन्त्रियों की परिषद्
>
> प्रेम-सागर = प्रेम का सागर
>
> राजमाता = राजा की माता
>
> अमचूर =आम का चूर्ण
>
> रामचरित = राम का चरित
>
> (छ) अधिकरण तत्पुरुष (में, पे, पर)
>
> वनवास = वन में वास
>
> जीवदया = जीवों पर दया
>
> ध्यान-मग्न = ध्यान में मग्न
>
> घुड़सवार = घोड़े पर सवार
>
> घृतान्न = घी में पक्का अन्न
>
> कवि पुंगव = कवियों में श्रेष्ठ
>
> 3. द्वन्द्व समास:-
>
> (i)द्वन्द्व समास में दोनों पद प्रधान होते हैं।
>
> (ii) दोनों पद प्रायः एक दूसरे के विलोम होते हैं, सदैव नहीं।
>
> (iii)इसका विग्रह करने पर ‘और’, अथवा ‘या’ का प्रयोग होता है।
>
> माता-पिता = माता और पिता
>
> दाल-रोटी = दाल और रोटी
>
> पाप-पुण्य = पाप या पुण्य/पाप और पुण्य
>
> अन्न-जल = अन्न और जल
>
> जलवायु = जल और वायु
>
> फल-फूल = फल और फूल
>
> भला-बुरा = भला या बुरा
>
> रुपया-पैसा = रुपया और पैसा
>
> अपना-पराया = अपना या पराया
>
> नील-लोहित = नीला और लोहित (लाल)
>
> धर्माधर्म = धर्म या अधर्म
>
> सुरासुर = सुर या असुर/सुर और असुर
>
> शीतोष्ण = शीत या उष्ण
>
> यशापयश = यश या अपयश
>
> शीतातप = शीत या आतप
>
> शस्त्रास्त्र = शस्त्र और अस्त्र
>
> कृष्णार्जुन = कृष्ण और अर्जुन
>
> 4. बहुब्रीहि समास:-
>
> (i)बहुब्रीहि समास में कोई भी पद प्रधान नहीं होता।
>
> (ii) इसमें प्रयुक्त पदों के सामान्य अर्थ की अपेक्षा अन्य अर्थ
> की प्रधानता रहती है।
>
> (iii)इसका विग्रह करने पर ‘वाला, है, जो, जिसका, जिसकी, जिसके, वह आदि
>
> आते हैं।
>
> गजानन = गज का आनन है जिसका वह (गणेश)
>
> त्रिनेत्र = तीन नेत्र हैं जिसके वह (शिव)
>
> चतुर्भुज = चार भुजाएँ हैं जिसकी वह (विष्णु)
>
> षडानन = षट् (छः) आनन हैं जिसके वह (कार्तिकेय)
>
> दशानन = दश आनन हैं जिसके वह (रावण)
>
> घनश्याम = घन जैसा श्याम है जो वह (कृष्ण)
>
> पीताम्बर = पीत अम्बर हैं जिसके वह (विष्णु)
>
> चन्द्रचूड़ = चन्द्र चूड़ पर है जिसके वह
>
> गिरिधर = गिरि को धारण करने वाला है जो वह
>
> मुरारि = मुर का अरि है जो वह
>
> आशुतोष = आशु (शीघ्र) प्रसन्न होता है जो वह
>
> नीललोहित = नीला है लहू जिसका वह
>
> वज्रपाणि = वज्र है पाणि में जिसके वह
>
> सुग्रीव = सुन्दर है ग्रीवा जिसकी वह
>
> मधुसूदन = मधु को मारने वाला है जो वह
>
> आजानुबाहु = जानुओं (घुटनों) तक बाहुएँ हैं जिसकी वह
>
> नीलकण्ठ = नीला कण्ठ है जिसका वह
>
> महादेव = देवताओं में महान् है जो वह
>
> मयूरवाहन = मयूर है वाहन जिसका वह
>
> कमलनयन = कमल के समान नयन हैं जिसके वह
>
> कनकटा = कटे हुए कान है जिसके वह
>
> जलज = जल में जन्मने वाला है जो वह (कमल)
>
> वाल्मीकि = वल्मीक से उत्पन्न है जो वह
>
> दिगम्बर = दिशाएँ ही हैं जिसका अम्बर ऐसा वह
>
> कुशाग्रबुद्धि = कुश के अग्रभाग के समान बुद्धि है जिसकी
> वह
>
> मन्द बुद्धि = मन्द है बुद्धि जिसकी वह
>
> जितेन्द्रिय = जीत ली हैं इन्द्रियाँ जिसने वह
>
> चन्द्रमुखी = चन्द्रमा के समान मुखवाली है जो वह
>
> अष्टाध्यायी = अष्ट अध्यायों की पुस्तक है जो वह
>
> 5. द्विगु समास :-
>
> (i)द्विगु समास में प्रायः पूर्वपद संख्यावाचक होता है तो कभी-कभी
> परपद भी संख्यावाचक
>
> देखा जा सकता है।
>
> (ii) द्विगु समास में प्रयुक्त संख्या किसी समूह का बोध कराती है
> अन्य अर्थ का नहीं, जैसा
>
> कि बहुब्रीहि समास में देखा है।
>
> (iii)इसका विग्रह करने पर ‘समूह’ या ‘समाहार’ शब्द प्रयुक्त होता है।
>
> दोराहा = दो राहों का समाहार
>
> पक्षद्वय = दो पक्षों का समूह
>
> सम्पादक द्वय = दो सम्पादकों का समूह
>
> त्रिभुज = तीन भुजाओं का समाहार
>
> त्रिलोक या त्रिलोकी = तीन लोकों का समाहार
>
> त्रिरत्न = तीन रत्नों का समूह
>
> संकलन-त्रय = तीन का समाहार
>
> भुवन-त्रय = तीन भुवनों का समाहार
>
> चैमासा/चतुर्मास = चार मासों का समाहार
>
> चतुर्भुज = चार भुजाओं का समाहार (रेखीय आकृति)
>
> चतुर्वर्ण = चार वर्णों का समाहार
>
> पंचामृत = पाँच अमृतों का समाहार
>
> पं चपात्र = पाँच पात्रों का समाहार
>
> पंचवटी = पाँच वटों का समाहार
>
> षड्भुज = षट् (छः) भुजाओं का समाहार
>
> सप्ताह = सप्त अहों (सात दिनों) का समाहार
>
> सतसई = सात सौ का समाहार
>
> सप्तशती = सप्त शतकों का समाहार
>
> सप्तर्षि = सात ऋषियों का समूह
>
> अष्ट-सिद्धि = आठ सिद्धियों का समाहार
>
> नवरत्न = नौ रत्नों का समूह
>
> नवरात्र = नौ रात्रियों का समाहार
>
> दशक = दश का समाहार
>
> शतक = सौ का समाहार
>
> शताब्दी = शत (सौ) अब्दों (वर्षों) का समाहार
>
> 6. कर्मधारय समास :-
>
> (i)कर्मधारय समास में एक पद विशेषण होता है तो दूसरा पद विशेष्य।
>
> (ii) इसमें कहीं कहीं उपमेय उपमान का सम्बन्ध होता है तथा विग्रह
> करने पर ‘रूपी’
>
> शब्द प्रयुक्त होता है –
>
> पुरुषोत्तम = पुरुष जो उत्तम
>
> नीलकमल = नीला जो कमल
>
> महापुरुष = महान् है जो पुरुष
>
> घन-श्याम = घन जैसा श्याम
>
> पीताम्बर = पीत है जो अम्बर
>
> महर्षि = महान् है जो ऋषि
>
> नराधम = अधम है जो नर
>
> अधमरा = आधा है जो मरा
>
> रक्ताम्बर = रक्त के रंग का (लाल) जो अम्बर
>
> कुमति = कुत्सित जो मति
>
> कुपुत्र = कुत्सित जो पुत्र
>
> दुष्कर्म = दूषित है जो कर्म
>
> चरम-सीमा = चरम है जो सीमा
>
> लाल-मिर्च = लाल है जो मिर्च
>
> कृष्ण-पक्ष = कृष्ण (काला) है जो पक्ष
>
> मन्द-बुद्धि = मन्द जो बुद्धि
>
> शुभागमन = शुभ है जो आगमन
>
> नीलोत्पल = नीला है जो उत्पल
>
> मृग नयन = मृग के समान नयन
>
> चन्द्र मुख = चन्द्र जैसा मुख
>
> राजर्षि = जो राजा भी है और ऋषि भी
>
> नरसिंह = जो नर भी है और सिंह भी
>
> मुख-चन्द्र = मुख रूपी चन्द्रमा
>
> वचनामृत = वचनरूपी अमृत
>
> भव-सागर = भव रूपी सागर
>
> चरण-कमल = चरण रूपी कमल
>
> क्रोधाग्नि = क्रोध रूपी अग्नि
>
> चरणारविन्द = चरण रूपी अरविन्द
>
> विद्या-धन = विद्यारूपी धन
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> in/KOER/en/index.php/Kalpavriksha (It has Hindi interface also)
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> 3. For doubts on Ubuntu and other public software, visit
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> 4. If a teacher wants to join STF, visit http://karnatakaeducation.org.
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