कहावत

जब कोई नीतिपूर्ण बात या जीवन की सत्यता को व्यक्त करने वाली बात आम प्रयोग
में प्रचलित हो जाती है, तब वह कहावत कहलाती है। कहावत को लोकोक्ति भी कहते
हैं। लोकोक्ति का शाब्दिक अर्थ है-
लोक+ उक्ति = संसार का कथन या दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं लोक प्रचलित
उक्ति
लोक-साहित्य में कहावतों का विशेष महत्त्व है। कहावतों से सम्बंधित अनेकों
कहानियाँ भी प्रचलित हैं, जिनका उद्देश्य कभी नहीं बदलता।

 सत्यमेव जयते (कहावत)

  इस संसार में राजा हरिश्चन्द्र का नाम कौन नहीं जानता। वे बहुत ही उदार हृदय
और दयालु थे। वे अपने जीवन से अधिक सच्चाई और ईमानदारी को महत्त्व देते थे।
इसलिए सभी देवता और ऋषि- मुनि भी महाराज हरिश्चन्द्र का आदर और सम्मान करते थे।
         एक बार सभी देवता ऋषि-मुनियों ने विचार किया कि महाराज हरिश्चन्द्र
वास्तव में सच्चाई और ईमानदारी का पर्याय हैं। जहाँ सच्चाई और ईमानदारी की बात
आती है, वहाँ राजा हरिश्चन्द्र का नाम सबसे पहले लिया जाता है।
        ऋषियों की बात सुनकर विश्वामित्र ने कहा― ‛मैं आपकी इस बात से पूरी
तरह सहमत हूँ कि महाराज हरिश्चन्द्र सत्यवादी और ईमानदार हैं। उनके पास
धन-दौलत, सत्ता, सुंदर-सा सुखी परिवार है। लेकिन विपत्ति आने पर
अच्छे-से-अच्छा इंसान भी बेईमान हो जाता है। आप इस बात को पूरे विश्वास के साथ
कैसे कह सकते हैं कि महाराज हरिश्चन्द्र विपत्ति के समय में भी सच्चाई और
ईमानदारी का साथ नहीं छोड़ेंगे।’
        सभी ऋषियों ने मिलकर विश्वामित्र से राजा हरिश्चन्द्र की सच्चाई परखने
के लिए कहा। विश्वामित्र ने ऋषियों की बात मानकर हरिश्चन्द्र की सच्चाई की
परीक्षा लेने का निश्चय किया। विश्वामित्र ने भिक्षुओं का वेश बनाकर महाराज
हरिश्चन्द्र से उनका राज्य, धन-संपत्ति, जमीन-जायदाद सब कुछ माँग लिया।
सत्यवादी हरिश्चन्द्र ने बिना सोचे ही सभी वस्तुएँ ख़ुशी से दे दीं।
हरिश्चन्द्र के पास धन-दौलत, घर, सुख के साधन कुछ भी नहीं बचा। हरिश्चन्द्र ने
अपने कर्ज को चुकाने के लिए अपनी पत्नी और बच्चों को भी बेच दिया। पत्नी और
बच्चे को बेचने के बाद भी कुछ कर्ज शेष रह गया तो हरिश्चन्द्र ने स्वयं को एक
श्मशान के मालिक के हाथों बेच दिया।
      एक दिन ऋषि विश्वामित्र हरिश्चन्द्र के पास आकर बोले―‛यदि तुम एक असत्य
वाक्य वाक्य कह दो तो मैं तुम्हारा सब कुछ वापस दे सकता हूँ।’
        हरिश्चन्द्र ने विनम्रतापूर्वक कहा―‛महर्षि, सत्यमेव जयते अर्थात्
सत्य की ही जय होती है।’
          एक दिन हरिश्चन्द्र के पुत्र की साँप के काटने से मृत्यु हो गई। जिस
समय हरिश्चन्द्र श्मशान में काम कर रहे थे तभी उनकी पत्नी अपने मृत पुत्र को
गोद में लेकर रोती हुई वहाँ पर आ गई। उस समय हरिश्चन्द्र की पत्नी के पास अपने
पुत्र के अन्तिम संस्कार की लकड़ियों के लिए पैसे नहीं थे। हरिश्चन्द्र अपने
पुत्र को मरा हुआ देखकर जोर-जोर से रोने लगे। उन्होंने सच्चाई और ईमानदारी का
पालन करते हुए अपने पुत्र का अंतिम संस्कार करने से मना कर दिया।
        तभी हरिश्चन्द्र के सामने विश्वामित्र ने आकर कहा―‛राजन, तुम अपने
पुत्र का अंतिम संस्कार करो। तुम्हारे मालिक को इस विषय में कुछ भी पता नहीं
चलेगा।’
      राजा हरिश्चन्द्र ने रोते हुए कहा―‛अपने मालिक के भरोसे को मैं कभी भी
तोड़ नहीं सकता। उनका मुझ पर पूरा विश्वास है।’
      हरिश्चन्द्र की बातें सुनकर विश्वामित्र ने प्रसन्न होकर उनका राज्य,
धन-दौलत, जमीन-जायदाद सब कुछ लौटा दिया और उनके पुत्र को अपनी दिव्य शक्तियों
द्वारा जीवित कर दिया। विश्वामित्र ने हरिश्चन्द्र की प्रशंसा करते हुए कहा कि
राजन तुमने सिद्ध कर दिया कि सत्यमेव जयते अर्थात् सत्य की जय होती है।

शिक्षा:-
इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें अपनी सच्चाई और ईमानदारी पर अटल
रहना चाहिए। इसी से हमारी विजय होती है।


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RAJKUMAR

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