Please send Hindi third language Unit test questions paper8/9/10 standerd On Aug 11, 2017 9:35 AM, "Shreenivas Naik" < [email protected]> wrote:
> *भारत के संगीत वाद्य* > > भारत विश्व में, सबसे ज्यादा प्राचीन और विकसित संगीत तंत्रों में से एक का > उतराधिकारी है । हमें इस परम्परा की निरंतरता का ज्ञान संगीत के ग्रंथों और > प्राचीन काल से लेकर आज तक की मूर्तिकला और चित्रकला में संगीत वाद्यों के > अनेक दृष्टांत उदाहरणों से मिलता है । > > हमें संगीत-सम्बंधी गतिविधि का प्राचीनतम प्रमाण मध्यप्रदेश के अनके भागों > और भीमबटेका की गुफाओं में बने भित्तिचित्रों से प्राप्त होता है, जहां लगभग > 10,000 वर्ष पूर्व मानव निवास करता था । इसके काफी समय बाद, हड़प्पा सभ्यता > की खुदाई से भी नृत्य तथा संगीत गतिविधियों के प्रमाण मिले हैं । > > संगीत वाद्य, संगीत का वास्तविक चित्र प्रस्तुत करते हैं । इनका अध्ययन > संगीत के उदभव की जानकारी देने में सहायक होता है और वाद्य जिस जनसमूह से > सम्बंधित होते हैं, उसकी संस्कृति के कई पहलुओं का भी वर्णन करते हैं । > उदाहरण के लिए गज बनाने के लिए बाल, ढोल बनाने के लिए प्रयोग की जाने वाली > लकड़ी या चिकनी मिट्टी या फिर वाद्यों में प्रयुक्त की जाने वाली जानवरों की > खाल यह सभी हमें उस प्रदेश विशेष की वनस्पति तथा पशु-वर्ग की विषय में बताते > हैं । > > दूसरी से छठी शताब्दी ईसवी सन् के संगम साहित्य में वाद्य के लिए तमिल > शब्द ‘कारूवी’ का प्रयोग मिलता है । इसका शाब्दिक अर्थ औजार है, जिसे संगीत > में वाद्य के अर्थ में लिया गया है । > > बहुत प्राचीन वाद्य मनुष्य के शरीर के विस्तार के रूप में देखे जा सकते हैं > और जहां तक कि हमें आज छड़ी ओर लोलक मिलते हैं । सूखे फल के बीजों के झुनझुने, > औरांव के कनियानी ढांडा या सूखे सरस फल या कमर पर बंधी हुई सीपियों को ध्वनि > उत्पन्न करने के लिए आज भी प्रयोग में लाया जाता है । > > हाथ का हस्तवीणा के रूप में उल्लेख किया गया है, जहां हाथों व उंगलियों को > वैदिक गान की स्वरलिपि पद्धति को प्रदशर्ति करने तथा ध्वनि का > मुद्रा-हस्तमुद्रा के साथ समन्वय करने के लिए प्रयोग में लाया जाता है । > > 200 ईसा पूर्व से 200 ईसवीं सन् के समय में भरतमुनि द्वारा संकलित > नाटयशास्त्र में संगीत वाद्यों को ध्वनि की उत्पत्ति के आधार पर चार मुख्य > वर्गों में विभाजित किया गया है : > > 1. तत् वाद्य अथवा तार वाद्य - तार वाद्य > 2. सुषिर वाद्य अथवा वायु वाद्य - हवा के वाद्य > 3. अवनद्व वाद्य और चमड़े के वाद्य - ताल वाद्य > 4. घन वाद्य या आघात वाद्य - ठोस वाद्य, जिन्हें > समस्वर स्तर में > करने की आवश्यकता नहीं होती । > > > *तत् वाद्य – तारदार वाद्य* > > तत् वाद्य, वाद्यों का एक ऐसा वर्ग है, जिनमें तार अथवा तन्त्री के कम्पन > से ध्वनि उत्पन्न होती है । यह कम्पन तार पर उंगली छेड़ने या फिर तार पर > गज चलाने से उत्पन्न होती हैं । कम्पित होने वाले तार की लम्बाई तथा उसको > कसे जाने की क्षमता स्वर की ऊंचाई (स्वरमान) निश्चित करती है और कुछ हद तक > ध्वनि की अवधि भी सुनिश्चित करती है । तत् वाद्यों को मोटे पर दो > भागों में विभाजित किया गया है- तत् वाद्य और वितत् वाद्य । आगे इन्हें > सारिका (पर्दा) युक्त और सारिका विहीन (पर्दाहीन) वाद्यों के रूप में पुन: > विभाजित किया जाता है । > > हमारे देश में तत् वाद्यों का प्राचीनतम प्रमाण धनुष के आकार की बीन या वीणा > है । इसमें रेशे या फिर पशु की अंतडि़यों से बनी भिन्न-भिन्न प्रकार की > समानांतर तारें होती थीं । इसमें प्रत्येक स्वर के लिए एक तार होती थी, > जिन्हें या तो उंगलियों से छेड़ कर या फिर कोना नामक मिज़राब से बजाया जाता > था । संगीत के ग्रंथों में तत् (तारयुक्त वाद्यों) वाद्यों के लिए सामान्य > रूप से ‘वीणा’ शब्द का प्रयोग किया जाता था और हमें एक-तंत्री, संत-तंत्री > वीणा आदि वाद्यों की जानकारी मिलती है । चित्रा में सात तारें होती हैं और > विपंची में नौ । चित्रा को उंगलियों द्वारा बजाया जाता था और विपंची का > मिज़राब से । > > प्राचीन समय की बहुत-सी-मूर्तियों और भित्तिचित्रों से इनका उल्लेख प्राप्त > होता है । जैसे भारूत और सांची स्तूप, अमरावती के नक्काशीदार स्तम्भ आदि । > दूसरी शताब्दी ईसवीं सन् के प्राचीन तमिल ग्रंथों में याड़ का उल्लेख > प्राप्त होता है । धार्मिक अवसरों और समारोहों में ऐसे वाद्यों को बजाना > महत्वपूर्ण रहा है । जब पुजारी ओर प्रस्तुतकर्ता गाते थे तो उनकी पत्नी > वाद्यों को बजाती थीं । > > डेलसिमर प्रकार के वाद्य तारयुक्त वाद्यों का एक अन्य वर्ग है । इसमें एक > लकड़ी के बक्से पर तार खींच कर रखे जाते हैं । इसका सबसे अच्छा उदाहरण है- > सौ तारों वाली वीणा अर्थात् सत-तंत्री वीणा । इस वर्ग का निकटतम सहयोगी वाद्य > है- संतूर । यह आज भी कश्मीर तथा भारत के अन्य भागों में बजाया जाता है । > > बाद में तारयुक्त वाद्यों के वर्ग में डांड़ युक्त वाद्यों के भी एक वर्ग > का विकास हुआ । यह राग-संगीत से जुड़े, प्रचलित वाद्यों के लिए उपयुक्त था । > चाहे वह पर्दे वाले वाद्य हों अथवा पर्दा विहीन वाद्य हों, उंगली से तार छेड़ > कर बजाए जाने वाले वाद्य हों, अथवा गज से बजाए जाने वाले- सभी इसी वर्ग में > आते हैं । इन वाद्यों का सबसे बड़ा महत्व है- स्वर की उत्पत्ति की समृद्धता > और स्वर की नरंतरता को बताए रखना । डांड युक्त वाद्यों में सभी आवश्यक > स्वर एक ही तार पर, तार की लम्बाई को उंगली द्वारा या धातु अथवा लकड़ी के > किसी टुकड़े से दबा कर, परिवर्तित करके उत्पन्न किए जा सकते हैं । स्वरों > के स्वरमान में परिवर्तन के लिए कंपायमान तार की लम्बाई का बढ़ना या घटना > महत्वपूर्ण होता है । > > गज वाले तार वाद्य आमतौर पर गायन के साथ संगत के लिए प्रयुक्त किए जाते हैं > तथा गीतानुगा के रूप में इनका उल्लेख किया जाता है । इन्हें दो मुख्य > वर्गों में बांटा जा सकता है । पहले वर्ग में सारंगी के समान डांड़ को सीधे > ऊपर की ओर रखा जाता है और दूसरे वर्ग में तुम्बे की कंधे की ओर रखा जाता है > तथा ‘डंडी’ या डांड़ को वादक की बांह के पार रखा जाता है । ठीक उसी प्रकार > जैसे- रावण हस्तवीणा, बनाम तथा वायलिन में । > > > *कमैचा* > > कमैचा पश्चित राजस्थान के मगनियार समुदाय द्वारा गज की सहायता से बजायी जाने > वाली वीणा है । यह संपूर्ण वाद्य लकड़ी के एक ही टुकड़े से बना होता है, > गोलाकार लकड़ी का हिस्सा गर्दन तथा डांड का रूप लेता है; अनुनादक (तुंबस) > चमड़े से मढ़ा होता है और ऊपरी भाग लकड़ी से ढका होता है । इसमें चार मुख्य > तार होते हैं और कई सहायक तार होते हैं, जो पतले ब्रिज (घुड़च) से होकर गुजरते > हैं । > > कमैचा वाद्य उप महाद्वीप को पश्चिम एशिया और अफ्रीका से जोड़ता है और इसे कुछ > विद्वान रावन हत्ता अथवा रावण हस्त वीणा के अपवाद स्वरूप प्राचीनतम वाद्य > के रूप में स्वीकार करते है । > > लम्बवत् गजयुक्त वाद्यों के प्रकार सामान्यत: देश के उत्तरी भागों में > पाए जाते हैं । इनमें आगे फिर से दो प्रकार होते हैं- सारिका (पर्दा) युक्त > और सारिकाविहीन (पर्दाविहीन) । > > > *(क) तारदार वाद्य के विविध हिस्से* > > अनुनादक (तुम्बा)-अधिकतर तारदार वाद्यों का तुम्बा या तो लकड़ी काबना होता > है या फिर विशेष रूप से उगाए गए कहू का । > > इस तुम्बे के ऊपर एक लकड़ी की पट्ट होती है, जिसे तबली कहते हैं । > > अनुनादक (तुम्बा), उंगली रखने की पट्टिका-डांड से जुड़ा होता है, जिसके ऊपरी > अंतिम सिरे पर खूंटियां लगी होती हैं । इनको वाद्य में उपयुक्त स्वर मिलाने > के लिए प्रयोग में लाया जाता है । > > तबली के ऊपर हाथीदांत से बना ब्रिज (घुड़च) होता है । मुख्य तार इस ब्रिज या > घुड़च के ऊपर से होकर जाते हैं । कुछ वाद्यों में इन मुख्य तारों के नीचे > कुछ अन्य तार होते हैं, जिन्हें तरब कहा जाता है । जब इन तारों को छेड़ा > जाता है तो यह गूंज पैदा करते हैं । > > > > कुछ वाद्यों में डांड पर धातु के पर्दे जुड़े होते हैं, जो स्थाई रूप से लगे > होते हैं या फिर ऊपर-नीचे सरकाए जा सकते हैं । कुछ तार वाद्यों को उंगलियों से > छेड़ कर या फिर कोना नामक छोटी मिज़राब की सहायता से बजाया जाता है । जबकि > अन्य तार वाद्यों को गज की सहायता से बजाया जाता है । (देखें आरेख ए) > > *(ख) स्वरों के स्थान* > > प्रस्तुत रेखाचित्र-स्वरों के स्थान तथा 36 इंच की तार पर सा रे म ग प ध > नि सा स्वरों को दिखाता है । चित्र में प्रत्येक स्वर की आंदोलन संख्या भी > दिखाई गई है । (देखें आरेख बी) > > > > > *सुषिर वाद्य* > > सुषिर वाद्यों में एक खोखली नलिका में हवा भर कर (अर्थात फूंक मार कर) ध्वनि > उत्पन्न की जाती है । हवा के मार्ग को नियंत्रित करके स्वर की ऊंचाई > सुनिश्चित की जाती है और वाद्य में बने छेदों को उंगलियों की सहायता से खोलकर > और बाद करके क्रमश: राग को बजाया जाता है । इस सभी वाद्यों में सबसे सर > (साधारण) वाद्य है-बांसुरी । आम तौर पर बांसुरियां बांस अथवा लकड़ी से बनी > होती हैं और भारतीय संगीतकार संगीतात्मक तथा स्वर-सम्बंधी विशेषताओं के > कारण लकड़ी तथा बांस की बांसुरी को पसंद करते हैं । हालांकि यहां लाल चंदन की > लकड़ी, काली लकड़ी, बेंत, हाथी दांत, पीतल, कांसे, चांदी और सोने की बनी > बांसुरियों के भी उल्लेख प्राप्त होते हैं । > > > > बांस से बनी बांसुरियों का व्यास साधारणत: करीब 1.9 से.मी. होता है पर चौड़े > व्यास वाली बांसुरियां भी आमतौर पर उपयोग में लाई जाती हैं । 13वीं शताब्दी > में शारंगदेव द्वारा लिखित संगीत सम्बंधी ग्रंथ ‘संगीत रत्नाकर’ में हमें 18 > प्रकार की बांसुरियों का उल्लेख मिलता है । बांसुरी के यह विविध प्रकार फूंक > मारने वाले छेद और पहली उंगली रखने वाले छेद के बची की दूरी पर आधारित हैं > (आरेख देखें) > > सिन्धु सभ्यता की खुदाई में मुत्तिका शिल्प (मिट्टी) की बनी पक्षी के आकार > की सीटियां और मुहरें प्राप्त हुई हैं, जो हवा और ताल वाद्यों को प्रदर्शित > करती हैं । बांस, लकड़ी तथा पशु की खाल आदि से बनाए गए संगीत वाद्य कितने भी > समय तक रखे रहें, वे नष्ट हो जाते हैं । यही कारण है कि लकड़ी या बांस की बनी > बांसुरियां समय के आघात को नहीं सह पाईं । इसी कारणवश हमें पिछली सभ्यताओं की > किसी खुदाई में ये वाद्य प्राप्त नहीं होते । > > यहां वेदों में ‘वेनू’ नामक वाद्य का उल्लेख प्राप्त होता है, जिसे राजाओं > का गुणगान तथा मंत्रोच्चारण में संगत करने के लिए बजाया जाता था । वेदों में > ‘नांदी’ नामक बांसुरी के एक प्रकार का भी उल्लेख प्राप्त होता है । बांसुरी > के विविध नाम हैं, जैसे उत्तर भारत में वेणु, वामसी, बांसुरी, मुरली आदि और > दक्षिण भारत में पिल्लनकरोवी और कोलालू । > > ध्वनि की उत्पत्ति के आधार पर मोटे तौर पर सुषिर अथवा वायु वाद्यों को दो > वर्गों में बांटा जा सकता है- > > - बांसुरियां और > - कम्पिका युक्त वाद्य > > *बांसुरी* > > इकहरी बांसुरी अथवा दोहरी बांसुरियां केवल एक खोखली नलिका के साथ, स्वर की > ऊँचाई को नियंत्रित करने के लिए अंगुली रखने के छिद्रों सहित होती हैं । ऐसी > बांसुरियां देश के बहुत से भागों में प्रचलित हैं । लम्बी, सपाट, बड़े व्यास > वाली बांसुरियों को निचले (मंद्र) सप्तक के आलाप जैसे धीमी गति के > स्वर-समूहों को बजाने के लिए प्रयुक्त किया जाता है । छोटी और कम लम्बाई > वाली बांसुरियों को, जिन्हें कभी-कभी लम्बवत् (उर्ध्वाधर) पकड़ा जाता है, > द्रुत गति के स्वर-समूह अर्थात् तान तथा ध्वनि के ऊंचे स्वरमान को बनाने के > लिए उपयोग में लाया जाता है । दोहरी बांसुरियां अक्सर आदिवासी तथा ग्रामीण > क्षेत्र के संगीतकारों द्वारा बजाई जाती हैं और ये मंच-प्रदर्शन में बहुत कम > दिखाई देती हैं । ये बांसुरियां चोंचदार बांसुरियों से मिलती-जुलती होती > हैं, जिनके एक सिरे पर संकरा छिद्र होता है । हमें इस प्रकार के वाद्यों का > उल्लेख प्रथम शताब्दी के सांची के स्तूप के शिल्प में प्राप्त होता है, > जिसमें एक संगीतकार को दोहरी बांसुरी बजाते हुए दिखाया गया हे । > > > *कम्पिका वाद्य* > > कम्पिका या सरकंडा युक्त वाद्य जैसे शहनाई, नादस्वरम् आदि वाद्यों में > वाद्य की खोखली नलिका के भीतर एक अथवा दो कम्पिका को डाला जाता है, जो हवा के > भर जाने पर कम्पित होती हैं । इस प्रकार के वाद्यों में कम्पिकाओं को नलिका के > भीतर डालने से पहले एक साथ, एक अंतराल में बांधा जाता है । नलिका शंकु के आकार > की होती है । यह हवा भरने वाले सिरे की तरफ से संकरी होती है और धीरे-धीरे > दूसरे सिरे पर खुली होती जाती है तथा एक धातु की घंटी का आकार ले लेती है, > ताकि ध्वनि की प्रबलता को बढ़ाया जा सके । वाद्य के मुख से एक अतिरिक्त > कम्पिकाओं का समूह और कम्पिकाओं को साफ करने तथा व्यवस्थित रखने के लिए > हाथीदांत अथवा चांदी की एक सुई लटकाई जाती है । > > > > *शहनाई* > > शहनाई एक कम्पिका युक्त बांध है । इसमें नलिका के ऊपर सात छिद्र होते हैं । > इन छिद्रों को अंगुलियों से बंद करने और खोलने पर राग बजाया जा सकता है । इस > वाद्य को ‘मंगल वाद्य’ के नाम से जाना जाता है और अक्सर इसे उत्तर भारत में > विवाह, मंदिर उत्सवों आदि के मंगलवार अवसर पर बजाया जाता है । ऐसा माना जाता > है कि शहनाई भारत में पश्चिम एंशिया से आई । कुछ अन्य विद्वान भी हैं, जो यह > मानते हैं कि यह वाद्य चीन से आया है । इस समय यह वाद्य कार्यक्रमों में बजाया > जाने वाला प्रसिद्ध वाद्य है । वाद्य ही आवाज़ सुरीली होती है और यह राग संगीत > को बजाने के लिए उपयुक्त है । इस शताब्दी के सन् पचास के दशक के पूर्व भाग > में इस वाद्य को प्रसिद्ध बनाने का श्रेय उस्ताद बिस्मिल्लाह खान को जाता है > । आज के जाने-माने शहनाई वादकों में पंडित अनंत लाल और पंडित दया शंकर का नाम > प्रमुख है । > > *अवनद्ध वाद्य* > > वाद्यों के वर्ग, अवनद्ध वाद्यों (ताल वाद्य) में पशु की खाल पर आघात करके > ध्वनि को उत्पन्न किया जाता है, जो मिट्टी, धातु के बर्तन या फिर लकड़ी के > ढोल या ढांचे के ऊपर खींच कर लगायी जाती है । हमें ऐसे वाद्यों के प्राचीनतम > उल्लेख वेदों में मिलते हैं । वेदों में भूमि दुंदुभि का उल्लेख है । यह > भूमि पर खुदा हुआ एक खोखला गढ़ा होता था, जिसे बैल या भैंस की खाल से खींच कर > ढका जाता था । इस गढ़े के खाल ढके हिस्से पर आघात करने के लिए पशु की पूंछ को > प्रयोग में लाया जाता था और इस प्रकार से ध्वनि की उत्पत्ति की जाती थी । > > ढोलों को उनके आकार, ढांचे तथा बजाने के लिए उनको रखे जाने के ढंग व स्थिति > के आधार पर विविध वर्गों में बांटा जा सकता है । ढोलों को मुख्यत: अर्ध्वक, > अंकया, आलिंग्य और डमय (ढालों का परिवार) इन चार वर्गों में बांटा जाता है । > (आरेख देखें) > > > > *उर्ध्वक* > > उर्ध्वक ढालों को वादक के समक्ष लम्बवत् रखा जाता है और इन पर डंडियों या > फिर उंगलियों से आघात करने पर ध्वनिं उत्पन्न होती है । इनमें मुख्य > हैं-तबले की जोड़ी और चेंडा । > > > *तबला* > > तबले की जोड़ी दो लम्बवत् ऊर्ध्वक ढोलों का एक समूह है । इसके दायें > हिस्से को तबला कहा जाता है और बांये हिस्से को बांया अथवा ‘डग्गा’ कहते > हैं । तबला लकड़ी का बना होता है । इस लकड़ी के ऊपरी हिस्से को पशु की खाल से > ढका जाता है और चमड़े की पट्टियों की सहायता से जोड़ा जाता है । चर्म पट्टियों > तथा लकड़ी के ढांचे के बीच आयताकार (चौकोर) लकड़ी के खाल के हिस्से के बीच > में स्याही को मिश्रण लगाया जाता है । तबले को हथौड़ी से ऊपरी हिस्से के > किनारों को ठोंक कर उपयुक्त स्वर को मिलाया जा सकता है । बांया हिस्सा > मिट्टी अथवा धातु का बना होता है । इसका ऊपरी हिस्सा पशु की खाल से ढंका जाता > है और उस पर भी स्याही का मिश्रण लगाया जाता है । कुछ संगीतकार इस हिस्से को > सही स्वर में नहीं मिलाते । > > > > > > तबले की जोड़ी को हिन्दुस्तानी संगीत के कंठ तथा वाद्य-संगीत और उत्तर > भारत की कई नृत्य शैलियों के साथ संगत प्रदान करने के लिए प्रयुक्त किया > जाता है । तबले पर हिन्दुस्तानी संगीत के कठिन ताल भी बहुत प्रवीणता के साथ > बजाए जाते हैं । वर्तमान समय के कुछ प्रमुख तबला वादक हैं-उस्ताद अल्ला > रक्खा खां और उनके सुपुत्र ज़ाकिर हुसैन, शफात अहमद और सामता प्रसाद । > > > *तबला* > > तबले की जोड़ी दो लम्बवत् ऊर्ध्वक ढोलों का एक समूह है । इसके दायें > हिस्से को तबला कहा जाता है और बांये हिस्से को बांया अथवा ‘डग्गा’ कहते > हैं । तबला लकड़ी का बना होता है । इस लकड़ी के ऊपरी हिस्से को पशु की खाल से > ढका जाता है और चमड़े की पट्टियों की सहायता से जोड़ा जाता है । चर्म पट्टियों > तथा लकड़ी के ढांचे के बीच आयताकार (चौकोर) लकड़ी के खाल के हिस्से के बीच > में स्याही को मिश्रण लगाया जाता है । तबले को हथौड़ी से ऊपरी हिस्से के > किनारों को ठोंक कर उपयुक्त स्वर को मिलाया जा सकता है । बांया हिस्सा > मिट्टी अथवा धातु का बना होता है । इसका ऊपरी हिस्सा पशु की खाल से ढंका जाता > है और उस पर भी स्याही का मिश्रण लगाया जाता है । कुछ संगीतकार इस हिस्से को > सही स्वर में नहीं मिलाते । > > तबले की जोड़ी को हिन्दुस्तानी संगीत के कंठ तथा वाद्य-संगीत और उत्तर > भारत की कई नृत्य शैलियों के साथ संगत प्रदान करने के लिए प्रयुक्त किया > जाता है । तबले पर हिन्दुस्तानी संगीत के कठिन ताल भी बहुत प्रवीणता के साथ > बजाए जाते हैं । वर्तमान समय के कुछ प्रमुख तबला वादक हैं-उस्ताद अल्ला > रक्खा खां और उनके सुपुत्र ज़ाकिर हुसैन, शफात अहमद और सामता प्रसाद । > > > > *आलिंग्य* > > तीसरा वर्ग आलिंग्य ढोल हैं । इन ढोलों में पशु की खाल को लकड़ी के एक गोल > खांचे पर लगा दिया जाता है और गले या इसे एक हाथ से शरीर के निकट करके पकड़ा > जाता है, जबकि दूसरे हाथ को ताल देने के लिए प्रयुक्त किया जाता है । इस > वर्ग में डफ, डफली आदि आते हैं, जो बहुत प्रचलित वाद्य है । > > *डमरू* > > डमरू ढोलों का एक अन्य प्रमुख वर्ग है । इस वर्ग में हिमाचल प्रदेश के छोटे > ‘हुडुका’ से लेकर दक्षिणी प्रदेश का विशाल वाद्य ‘तिमिल’ तक आते हैं । पहले > वाद्य को हाथ से आघात देकर बजाया जाता है, जबकि दूसरे को कंधे से लटका कर > डंडियों और उंगलियों से बजाया जाता है । इस प्रकार के वाद्यों को रेतघड़ी वर्ग > के ढोलों के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि इनका आकार रेतघड़ी से > मिलता-जुलता प्रतीत होता है । > > > *घन वाद्य* > > मनुष्य द्वारा अविष्कृत सबसे प्राचीन वाद्यों को घन वाद्य कहा जाता है । एक > बार जब यह वाद्य बन जाते हैं तो फिर इन्हें बजाने के समय कभी भी विशेष सुर > में मिलाने की आवश्यकता नहीं होती । प्राचीन काल में यह वाद्य मानव शरीर के > विस्तार जैसे डंडियों, तालों तथा छडि़यों आदि के रूप में सामने आए और ये > दैनिक जीवन में प्रयोग में लाई जाने वाली वस्तुओं, जैसे पात्र (बर्तन), > कड़ाही, झांझ, तालम् आदि के साथ बहुत गहरे जुड़े हुए थे । मूलत: यह वस्तुएं > लय प्रदान करती है और लोक तथा आदिवासी अंचल के संगीत तथा नृत्य के साथ संगत > प्रदान करने के लिए सर्वाधिक उपयुक्त हैं । > > > > > *झांझ वादक, कोणार्क, उड़ीसा* > > उड़ीसा के कोर्णाक स्थित सूर्य मंदिर में हम एक 8 फीट ऊंचा शिल्प देख सकते > हैं, जिसमें एक स्त्री को झांझ बजाते हुए प्रदर्शित किया गया है । > > -- > 1. Webpage for this HindiSTF is : https://groups.google.com/d/ > forum/hindistf > 2. For doubts on Ubuntu and other public software, visit > http://karnatakaeducation.org.in/KOER/en/index.php/ > Frequently_Asked_Questions > 3. If a teacher wants to join STF, visit http://karnatakaeducation.org. > in/KOER/en/index.php/Become_a_STF_groups_member > > ----------- > 1.ವಿಷಯ ಶಿಕ್ಷಕರ ವೇದಿಕೆಗೆ ಶಿಕ್ಷಕರನ್ನು ಸೇರಿಸಲು ಈ ಅರ್ಜಿಯನ್ನು ತುಂಬಿರಿ. > - https://docs.google.com/forms/d/1Iv5fotalJsERorsuN5v5yHGuKrmpF > XStxBwQSYXNbzI/viewform > 2. ಇಮೇಲ್ ಕಳುಹಿಸುವಾಗ ಗಮನಿಸಬೇಕಾದ ಕೆಲವು ಮಾರ್ಗಸೂಚಿಗಳನ್ನು ಇಲ್ಲಿ ನೋಡಿ. > -http://karnatakaeducation.org.in/KOER/index.php/ವಿಷಯಶಿಕ್ > ಷಕರವೇದಿಕೆ_ಸದಸ್ಯರ_ಇಮೇಲ್_ಮಾರ್ಗಸೂಚಿ > 3. ಐ.ಸಿ.ಟಿ ಸಾಕ್ಷರತೆ ಬಗೆಗೆ ಯಾವುದೇ ರೀತಿಯ ಪ್ರಶ್ನೆಗಳಿದ್ದಲ್ಲಿ ಈ ಪುಟಕ್ಕೆ ಭೇಟಿ > ನೀಡಿ - > http://karnatakaeducation.org.in/KOER/en/index.php/Portal:ICT_Literacy > 4.ನೀವು ಸಾರ್ವಜನಿಕ ತಂತ್ರಾಂಶ ಬಳಸುತ್ತಿದ್ದೀರಾ ? ಸಾರ್ವಜನಿಕ ತಂತ್ರಾಂಶದ ಬಗ್ಗೆ > ತಿಳಿಯಲು -http://karnatakaeducation.org.in/KOER/en/index.php/ > Public_Software > ----------- > --- > You received this message because you are subscribed to the Google Groups > "HindiSTF" group. > To unsubscribe from this group and stop receiving emails from it, send an > email to [email protected]. > To post to this group, send email to [email protected]. > For more options, visit https://groups.google.com/d/optout. > -- 1. Webpage for this HindiSTF is : https://groups.google.com/d/forum/hindistf 2. For doubts on Ubuntu and other public software, visit http://karnatakaeducation.org.in/KOER/en/index.php/Frequently_Asked_Questions 3. If a teacher wants to join STF, visit http://karnatakaeducation.org.in/KOER/en/index.php/Become_a_STF_groups_member ----------- 1.ವಿಷಯ ಶಿಕ್ಷಕರ ವೇದಿಕೆಗೆ ಶಿಕ್ಷಕರನ್ನು ಸೇರಿಸಲು ಈ ಅರ್ಜಿಯನ್ನು ತುಂಬಿರಿ. - https://docs.google.com/forms/d/1Iv5fotalJsERorsuN5v5yHGuKrmpFXStxBwQSYXNbzI/viewform 2. ಇಮೇಲ್ ಕಳುಹಿಸುವಾಗ ಗಮನಿಸಬೇಕಾದ ಕೆಲವು ಮಾರ್ಗಸೂಚಿಗಳನ್ನು ಇಲ್ಲಿ ನೋಡಿ. -http://karnatakaeducation.org.in/KOER/index.php/ವಿಷಯಶಿಕ್ಷಕರವೇದಿಕೆ_ಸದಸ್ಯರ_ಇಮೇಲ್_ಮಾರ್ಗಸೂಚಿ 3. ಐ.ಸಿ.ಟಿ ಸಾಕ್ಷರತೆ ಬಗೆಗೆ ಯಾವುದೇ ರೀತಿಯ ಪ್ರಶ್ನೆಗಳಿದ್ದಲ್ಲಿ ಈ ಪುಟಕ್ಕೆ ಭೇಟಿ ನೀಡಿ - http://karnatakaeducation.org.in/KOER/en/index.php/Portal:ICT_Literacy 4.ನೀವು ಸಾರ್ವಜನಿಕ ತಂತ್ರಾಂಶ ಬಳಸುತ್ತಿದ್ದೀರಾ ? ಸಾರ್ವಜನಿಕ ತಂತ್ರಾಂಶದ ಬಗ್ಗೆ ತಿಳಿಯಲು -http://karnatakaeducation.org.in/KOER/en/index.php/Public_Software ----------- --- You received this message because you are subscribed to the Google Groups "HindiSTF" group. To unsubscribe from this group and stop receiving emails from it, send an email to [email protected]. To post to this group, send an email to [email protected]. For more options, visit https://groups.google.com/d/optout.
