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Unit test questions paper8/9/10 standerd

On Aug 11, 2017 9:35 AM, "Shreenivas Naik" <
[email protected]> wrote:

> *भारत के संगीत वाद्य*
>
> भारत विश्‍व में, सबसे ज्‍यादा प्राचीन और विकसित संगीत तंत्रों में से एक का
> उतराधिकारी है । हमें इस परम्‍परा की निरंतरता का ज्ञान संगीत के ग्रंथों और
> प्राचीन काल से लेकर आज तक की मूर्तिकला और चित्रकला में संगीत वाद्यों के
> अनेक दृष्‍टांत उदाहरणों से मिलता है ।
>
> हमें संगीत-सम्‍बंधी गतिविधि का प्राचीनतम प्रमाण मध्‍यप्रदेश के अनके भागों
> और भीमबटेका की गुफाओं में बने भित्तिचित्रों से प्राप्‍त होता है, जहां लगभग
> 10,000 वर्ष पूर्व मानव निवास करता था । इसके काफी समय बाद, हड़प्‍पा सभ्‍यता
> की खुदाई से भी नृत्‍य तथा संगीत गतिविधियों के प्रमाण मिले हैं ।
>
> संगीत वाद्य, संगीत का वास्‍तविक चित्र प्रस्‍तुत करते हैं । इनका अध्‍ययन
> संगीत के उदभव की जानकारी देने में सहायक होता है और वाद्य जिस जनसमूह से
> सम्‍बंधित होते हैं, उसकी संस्‍कृति के कई पहलुओं का भी वर्णन करते हैं ।
> उदाहरण के लिए गज बनाने के लिए बाल, ढोल बनाने के लिए प्रयोग की जाने वाली
> लकड़ी या चिकनी मिट्टी या फिर वाद्यों में प्रयुक्‍त की जाने वाली जानवरों की
> खाल यह सभी हमें उस प्रदेश विशेष की वनस्‍पति तथा पशु-वर्ग की विषय में बताते
> हैं ।
>
> दूसरी से छठी शताब्‍दी ईसवी सन् के संगम साहित्‍य में वाद्य के लिए तमिल
> शब्‍द ‘कारूवी’ का प्रयोग मिलता है । इसका शाब्दिक अर्थ औजार है, जिसे संगीत
> में वाद्य के अर्थ में लिया गया है ।
>
> बहुत प्राचीन वाद्य मनुष्‍य के शरीर के विस्‍तार के रूप में देखे जा सकते हैं
> और जहां तक कि हमें आज छड़ी ओर लोलक मिलते हैं । सूखे फल के बीजों के झुनझुने,
> औरांव के कनियानी ढांडा या सूखे सरस फल या कमर पर बंधी हुई सीपियों को ध्‍वनि
> उत्‍पन्‍न करने के लिए आज भी प्रयोग में लाया जाता है ।
>
> हाथ का हस्‍तवीणा के रूप में उल्‍लेख किया गया है, जहां हाथों व उंगलियों को
> वैदिक गान की स्‍वरलिपि पद्धति को प्रदशर्ति करने तथा ध्‍वनि का
> मुद्रा-हस्‍तमुद्रा के साथ समन्‍वय करने के लिए प्रयोग में लाया जाता है ।
>
> 200 ईसा पूर्व से 200 ईसवीं सन् के समय में भरतमुनि द्वारा संकलित
> नाटयशास्‍त्र में संगीत वाद्यों को ध्‍वनि की उत्‍पत्ति के आधार पर चार मुख्‍य
> वर्गों में विभाजित किया गया है :
>
> 1.  तत् वाद्य अथवा तार वाद्य                      - तार वाद्य
> 2.  सुषिर वाद्य अथवा वायु वाद्य                   - हवा के वाद्य
> 3.  अवनद्व वाद्य और चमड़े के वाद्य               - ताल वाद्य
> 4.  घन वाद्य या आघात वाद्य                       - ठोस वाद्य, जिन्‍हें
> समस्‍वर स्‍तर में
> करने की आवश्‍यकता नहीं होती ।
>
>
>  *तत् वाद्य – तारदार वाद्य*
>
> तत् वाद्य, वाद्यों का एक ऐसा वर्ग है, जिनमें तार अथवा तन्‍त्री के कम्‍पन
> से ध्‍वनि उत्‍पन्‍न होती है । यह कम्‍पन तार पर उंगली छेड़ने या फिर तार पर
> गज चलाने से उत्‍पन्‍न होती हैं । कम्पित होने वाले तार की लम्‍बाई तथा उसको
> कसे जाने की क्षमता स्‍वर की ऊंचाई (स्‍वरमान) निश्चित करती है और कुछ हद तक
> ध्‍वनि की अवधि भी सुनिश्चित करती है ।          तत् वाद्यों को मोटे पर दो
> भागों में विभाजित किया गया है- तत् वाद्य और वितत् वाद्य । आगे इन्‍हें
> सारिका (पर्दा) युक्‍त और सारिका विहीन (पर्दा‍हीन) वाद्यों के रूप में पुन:
> विभाजित किया जाता है ।
>
> हमारे देश में तत् वाद्यों का प्राचीनतम प्रमाण धनुष के आकार की बीन या वीणा
> है । इसमें रेशे या फिर पशु की अंतडि़यों से बनी भिन्‍न-भिन्‍न प्रकार की
> समानांतर तारें होती थीं । इसमें प्रत्‍येक स्‍वर के लिए एक तार होती थी,
> जिन्‍हें या तो उंगलियों से छेड़ कर या फिर कोना नामक मिज़राब से बजाया जाता
> था । संगीत के ग्रंथों में तत् (तारयुक्‍त वाद्यों) वाद्यों के लिए सामान्‍य
> रूप से ‘वीणा’ शब्‍द का प्रयोग किया जाता था और हमें एक-तंत्री, संत-तंत्री
> वीणा आदि वाद्यों की जानकारी मिलती है । चित्रा में सात तारें होती हैं और
> विपंची में नौ । चित्रा को उंगलियों द्वारा बजाया जाता था और विपंची का
> मिज़राब से ।
>
> प्राचीन समय की बहुत-सी-मूर्तियों और भित्तिचित्रों से इनका उल्‍लेख प्राप्‍त
> होता है । जैसे भारूत और सांची स्‍तूप, अमरावती के नक्‍काशीदार स्‍तम्‍भ आदि ।
> दूसरी शताब्‍दी ईसवीं सन् के प्राचीन तमिल ग्रंथों में याड़ का उल्‍लेख
> प्राप्‍त होता है । धार्मिक अवसरों और समारोहों में ऐसे वाद्यों को बजाना
> महत्‍वपूर्ण रहा है । जब पुजारी ओर प्रस्‍तुतकर्ता गाते थे तो उनकी पत्‍नी
> वाद्यों को बजाती थीं ।
>
> डेलसिमर प्रकार के वाद्य तारयुक्‍त वाद्यों का एक अन्‍य वर्ग है । इसमें एक
> लकड़ी के बक्‍से पर तार खींच कर रखे जाते  हैं । इसका सबसे अच्‍छा उदाहरण है-
> सौ तारों वाली वीणा अर्थात् सत-तंत्री वीणा । इस वर्ग का निकटतम सहयोगी वाद्य
> है- संतूर । यह आज भी कश्‍मीर तथा भारत के अन्‍य भागों में बजाया जाता है ।
>
> बाद में तारयुक्‍त वाद्यों के वर्ग में डांड़ युक्‍त वाद्यों के भी एक वर्ग
> का विकास हुआ । यह राग-संगीत से जुड़े, प्रचलित वाद्यों के लिए उपयुक्‍त था ।
> चाहे वह पर्दे वाले वाद्य हों अथवा पर्दा विहीन वाद्य हों, उंगली से तार छेड़
> कर बजाए जाने वाले वाद्य हों, अथवा गज से बजाए जाने वाले- सभी इसी वर्ग में
> आते हैं । इन वाद्यों का सबसे बड़ा महत्‍व है- स्‍वर की उत्‍पत्ति की समृद्धता
> और स्‍वर की नरंतरता को बताए रखना । डांड युक्‍त वाद्यों में सभी आवश्‍यक
> स्‍वर एक ही तार पर, तार की लम्‍बाई को उंगली द्वारा या धातु अथवा लकड़ी के
> किसी टुकड़े से दबा कर, परिवर्तित करके उत्‍पन्‍न किए जा सकते हैं । स्‍वरों
> के स्‍वरमान में परिवर्तन के लिए कंपायमान तार की लम्‍बाई का बढ़ना या घटना
> महत्‍वपूर्ण होता है ।
>
> गज वाले तार वाद्य आमतौर पर गायन के साथ संगत के लिए प्रयुक्‍त किए जाते हैं
> तथा गीतानुगा के रूप में इनका उल्‍लेख किया जाता है । इन्‍हें दो मुख्‍य
> वर्गों में बांटा जा सकता है । पहले वर्ग में सारंगी के समान डांड़ को सीधे
> ऊपर की ओर रखा जाता है और दूसरे वर्ग में तुम्‍बे की कंधे की ओर रखा जाता है
> तथा ‘डंडी’ या डांड़ को वादक की बांह के पार रखा जाता है । ठीक उसी प्रकार
> जैसे- रावण हस्‍तवीणा, बनाम तथा वायलिन में ।
>
>
> *कमैचा*
>
> कमैचा पश्चित राजस्‍थान के मगनियार समुदाय द्वारा गज की सहायता से बजायी जाने
> वाली वीणा है । यह संपूर्ण वाद्य लकड़ी के एक ही टुकड़े से बना होता है,
> गोलाकार लकड़ी का हिस्‍सा गर्दन तथा डांड का रूप लेता है; अनुनादक (तुंबस)
> चमड़े से मढ़ा होता है और ऊपरी भाग लकड़ी से ढका होता है । इसमें चार मुख्‍य
> तार होते हैं और कई सहायक तार होते हैं, जो पतले ब्रिज (घुड़च) से होकर गुजरते
> हैं ।
>
> कमैचा वाद्य उप महाद्वीप को पश्चिम एशिया और अफ्रीका से जोड़ता है और इसे कुछ
> विद्वान रावन हत्‍ता अथवा रावण हस्‍त वीणा के अपवाद स्‍वरूप प्राचीनतम वाद्य
> के रूप में स्‍वीकार करते है ।
>
> लम्‍बवत् गजयुक्‍त वाद्यों के प्रकार सामान्‍यत: देश के उत्‍तरी भागों में
> पाए जाते हैं । इनमें आगे फिर से दो प्रकार होते हैं- सारिका (पर्दा) युक्‍त
> और सारिकाविहीन (पर्दाविहीन) ।
>
>
> *(क)    तारदार वाद्य के विविध हिस्‍से*
>
> अनुनादक (तुम्‍बा)-अधिकतर तारदार वाद्यों का तुम्‍बा या तो लकड़ी काबना होता
> है या फिर विशेष रूप से उगाए गए कहू का ।
>
> इस तुम्‍बे के ऊपर एक लकड़ी की पट्ट होती है, जिसे तबली कहते हैं ।
>
> अनुनादक (तुम्‍बा), उंगली रखने की पट्टिका-डांड से जुड़ा होता है, जिसके ऊपरी
> अंतिम सिरे पर खूंटियां लगी होती हैं । इनको वाद्य में उपयुक्‍त स्‍वर मिलाने
> के लिए प्रयोग में लाया जाता है ।
>
> तबली के ऊपर हाथीदांत से बना ब्रिज (घुड़च) होता है । मुख्‍य तार इस ब्रिज या
> घुड़च के ऊपर से होकर जाते  हैं । कुछ वाद्यों में इन मुख्‍य तारों के नीचे
> कुछ अन्‍य तार होते हैं, जिन्‍हें तरब कहा जाता है । जब इन तारों को छेड़ा
> जाता है तो यह गूंज पैदा करते हैं ।
>
>
>
> कुछ वाद्यों में डांड पर धातु के पर्दे जुड़े होते हैं, जो स्‍थाई रूप से लगे
> होते हैं या फिर ऊपर-नीचे सरकाए जा सकते हैं । कुछ तार वाद्यों को उंगलियों से
> छेड़ कर या फिर कोना नामक छोटी मिज़राब की सहायता से बजाया जाता है । जबकि
> अन्‍य तार वाद्यों को गज की सहायता से बजाया जाता है । (देखें आरेख ए)
>
> *(ख)   स्‍वरों के स्‍थान*
>
> प्रस्‍तुत रेखाचित्र-स्‍वरों के स्‍थान तथा 36 इंच की तार पर सा रे म ग प ध
> नि सा स्‍वरों को दिखाता है । चित्र में प्रत्‍येक स्‍वर की आंदोलन संख्‍या भी
> दिखाई गई है । (देखें आरेख बी)
>
>
>
>
> *सुषिर वाद्य*
>
> सुषिर वाद्यों में एक खोखली नलिका में हवा भर कर (अर्थात फूंक मार कर) ध्‍वनि
> उत्‍पन्‍न की जाती है । हवा के मार्ग को नियंत्रित करके स्‍वर की ऊंचाई
> सुनिश्चित की जाती है और वाद्य में बने छेदों को उंगलियों की सहायता से खोलकर
> और बाद करके क्रमश: राग को बजाया जाता है । इस सभी वाद्यों में सबसे सर
> (साधारण) वाद्य है-बांसुरी । आम तौर पर बांसुरियां बांस अथवा लकड़ी से बनी
> होती हैं और भारतीय संगीतकार संगीतात्‍मक तथा स्‍वर-सम्‍बंधी विशेषताओं के
> कारण लकड़ी तथा बांस की बांसुरी को पसंद करते हैं । हालांकि यहां लाल चंदन की
> लकड़ी, काली लकड़ी, बेंत, हाथी दांत, पीतल, कांसे, चांदी और सोने की बनी
> बांसुरियों के भी उल्‍लेख प्राप्‍त होते हैं ।
>
>
>
> बांस से बनी बांसुरियों का व्‍यास साधारणत: करीब 1.9 से.मी. होता है पर चौड़े
> व्‍यास वाली बांसुरियां भी आमतौर पर उपयोग में लाई जाती हैं । 13वीं शताब्‍दी
> में शारंगदेव द्वारा लिखित संगीत सम्‍बंधी ग्रंथ ‘संगीत रत्‍नाकर’ में हमें 18
> प्रकार की बांसुरियों का उल्‍लेख मिलता है । बांसुरी के यह विविध प्रकार फूंक
> मारने वाले छेद और पहली उंगली रखने वाले छेद के बची की दूरी पर आधारित हैं
> (आरेख देखें)
>
> सिन्‍धु सभ्‍यता की खुदाई में मुत्तिका शिल्‍प (मिट्टी) की बनी पक्षी के आकार
> की सीटियां और मुहरें प्राप्‍त हुई हैं, जो हवा और ताल वाद्यों को प्रदर्शित
> करती हैं । बांस, लकड़ी तथा पशु की खाल आदि से बनाए गए संगीत वाद्य कितने भी
> समय तक रखे रहें, वे नष्‍ट हो जाते हैं । यही कारण है कि लकड़ी या बांस की बनी
> बांसुरियां समय के आघात को नहीं सह पाईं । इसी कारणवश हमें पिछली सभ्‍यताओं की
> किसी खुदाई में ये वाद्य प्राप्‍त नहीं होते ।
>
> यहां वेदों में ‘वेनू’ नामक वाद्य का उल्‍लेख प्राप्‍त होता है, जिसे राजाओं
> का गुणगान तथा मंत्रोच्‍चारण में संगत करने के लिए बजाया जाता था । वेदों में
> ‘नांदी’ नामक बांसुरी के एक प्रकार का भी उल्‍लेख प्राप्‍त होता है । बांसुरी
> के विविध नाम हैं, जैसे उत्‍तर भारत में वेणु, वामसी, बांसुरी, मुरली आदि और
> दक्षिण भारत में पिल्‍लनकरोवी और कोलालू ।
>
> ध्‍वनि की उत्‍पत्ति के आधार पर मोटे तौर पर सुषिर अथवा वायु वाद्यों को दो
> वर्गों में बांटा जा सकता है-
>
> -  बांसुरियां और
> -  कम्पिका युक्‍त वाद्य
>
> *बांसुरी*
>
> इकहरी बांसुरी अथवा दोहरी बांसुरियां केवल एक खोखली नलिका के साथ, स्‍वर की
> ऊँचाई को नियंत्रित करने के लिए अंगुली रखने के छिद्रों सहित होती हैं । ऐसी
> बांसुरियां देश के बहुत से भागों में प्रचलित हैं । लम्‍बी, सपाट, बड़े व्‍यास
> वाली बांसुरियों को निचले (मंद्र) सप्‍तक के आलाप जैसे धीमी गति के
> स्‍वर-समूहों को बजाने के लिए प्रयुक्‍त किया जाता है । छोटी और कम लम्‍बाई
> वाली बांसुरियों को, जिन्‍हें कभी-कभी लम्‍बवत् (उर्ध्‍वाधर) पकड़ा जाता है,
> द्रुत गति के स्‍वर-समूह अर्थात् तान तथा ध्‍वनि के ऊंचे स्‍वरमान को बनाने के
> लिए उपयोग में लाया जाता है । दोहरी बांसुरियां अक्‍सर आदिवासी तथा ग्रामीण
> क्षेत्र के संगीतकारों द्वारा बजाई जाती हैं और ये मंच-प्रदर्शन में बहुत कम
> दिखाई देती   हैं । ये बांसुरियां चोंचदार बांसुरियों से मिलती-जुलती होती
> हैं, जिनके एक सिरे पर संकरा छिद्र होता है । हमें इस प्रकार के वाद्यों का
> उल्‍लेख प्रथम शताब्‍दी के सांची के स्‍तूप के शिल्‍प में प्राप्‍त होता है,
> जिसमें एक संगीतकार को दोहरी बांसुरी बजाते हुए दिखाया गया हे ।
>
>
> *कम्पिका वाद्य*
>
> कम्पिका या सरकंडा युक्‍त वाद्य जैसे शहनाई, नादस्‍वरम् आदि वाद्यों में
> वाद्य की खोखली नलिका के भीतर एक अथवा दो कम्पिका को डाला जाता है, जो हवा के
> भर जाने पर कम्पित होती हैं । इस प्रकार के वाद्यों में कम्पिकाओं को नलिका के
> भीतर डालने से पहले एक साथ, एक अंतराल में बांधा जाता है । नलिका शंकु के आकार
> की होती है । यह हवा भरने वाले सिरे की तरफ से संकरी होती है और धीरे-धीरे
> दूसरे सिरे पर खुली होती जाती है तथा एक धातु की घंटी का आकार ले लेती है,
> ताकि ध्‍वनि की प्रबलता को बढ़ाया जा सके । वाद्य के मुख से एक अतिरिक्‍त
> कम्पिकाओं का समूह और कम्पिकाओं को साफ करने तथा व्‍यवस्थित रखने के लिए
> हाथीदांत अथवा चांदी की एक सुई लटकाई जाती है ।
>
>
>
> *शहनाई*
>
> शहनाई एक कम्पिका युक्‍त बांध है । इसमें नलिका के ऊपर सात छिद्र होते हैं ।
> इन छिद्रों को अंगुलियों से बंद करने और खोलने पर राग बजाया जा सकता है । इस
> वाद्य को ‘मंगल वाद्य’ के नाम से जाना जाता है और अक्‍सर इसे उत्‍तर भारत में
> विवाह, मंदिर उत्‍सवों आदि के मंगलवार अवसर पर बजाया जाता है । ऐसा माना जाता
> है कि शहनाई भारत में पश्चिम एंशिया से आई । कुछ अन्‍य विद्वान भी हैं, जो यह
> मानते हैं कि यह वाद्य चीन से आया है । इस समय यह वाद्य कार्यक्रमों में बजाया
> जाने वाला प्रसिद्ध वाद्य है । वाद्य ही आवाज़ सुरीली होती है और यह राग संगीत
> को बजाने के लिए उपयुक्‍त है । इस शताब्‍दी के सन् पचास के दशक के पूर्व भाग
> में इस वाद्य को प्रसिद्ध बनाने का श्रेय उस्‍ताद बिस्मिल्‍लाह खान को जाता है
> । आज के जाने-माने शहनाई वादकों में पंडित अनंत लाल और पंडित दया शंकर का नाम
> प्रमुख है ।
>
> *अवनद्ध वाद्य*
>
> वाद्यों के वर्ग, अवनद्ध वाद्यों (ताल वाद्य) में पशु की खाल पर आघात करके
> ध्‍वनि को उत्‍पन्‍न किया जाता है, जो मिट्टी, धातु के बर्तन या फिर लकड़ी के
> ढोल या ढांचे के ऊपर खींच कर लगायी जाती है । हमें ऐसे वाद्यों के प्राचीनतम
> उल्‍लेख वेदों में मिलते हैं । वेदों में भूमि दुंदुभि का उल्‍लेख है । यह
> भूमि पर खुदा हुआ एक खोखला गढ़ा होता था, जिसे बैल या भैंस की खाल से खींच कर
> ढका जाता था । इस गढ़े के खाल ढके हिस्‍से पर आघात करने के लिए पशु की पूंछ को
> प्रयोग में लाया जाता था और इस प्रकार से ध्‍वनि की उत्‍पत्ति की जाती थी ।
>
> ढोलों को उनके आकार, ढांचे तथा बजाने के लिए उनको रखे जाने के ढंग व स्थिति
> के आधार पर विविध वर्गों में बांटा जा सकता है । ढोलों को मुख्‍यत: अर्ध्‍वक,
> अंकया, आलिंग्‍य और डमय (ढालों का परिवार) इन चार वर्गों में बांटा जाता है ।
> (आरेख देखें)
>
>
>
> *उर्ध्‍वक*
>
> उर्ध्‍वक ढालों को वादक के समक्ष लम्‍बवत् रखा जाता है और इन पर डंडियों या
> फिर उंगलियों से आघात करने पर ध्‍वनिं उत्‍पन्‍न होती है । इनमें मुख्‍य
> हैं-तबले की जोड़ी और चेंडा ।
>
>
> *तबला*
>
> तबले की जोड़ी दो लम्‍बवत् ऊर्ध्‍वक ढोलों का एक समूह है । इसके दायें
> हिस्‍से को तबला कहा जाता है और बांये हिस्‍से  को बांया अथवा ‘डग्‍गा’ कहते
> हैं । तबला लकड़ी का बना होता है । इस लकड़ी के ऊपरी हिस्‍से को पशु की खाल से
> ढका जाता है और चमड़े की पट्टियों की सहायता से जोड़ा जाता है । चर्म पट्टियों
> तथा लकड़ी के ढांचे के बीच आयताकार (चौकोर) लकड़ी के खाल के हिस्‍से के बीच
> में स्‍याही को मिश्रण लगाया जाता है । तबले को हथौड़ी से ऊपरी हिस्‍से के
> किनारों को ठोंक कर उपयुक्‍त स्‍वर को मिलाया जा सकता है । बांया हिस्‍सा
> मिट्टी अथवा धातु का बना होता है । इसका ऊपरी हिस्‍सा पशु की खाल से ढंका जाता
> है और उस पर भी स्‍याही का मिश्रण लगाया जाता है । कुछ संगीतकार इस हिस्‍से को
> सही स्‍वर में नहीं मिलाते ।
>
>
>
>
>
> तबले की जोड़ी को हिन्‍दुस्‍तानी संगीत के कंठ तथा वाद्य-संगीत और उत्‍तर
> भारत की कई नृत्‍य शैलियों के साथ संगत प्रदान करने के लिए प्रयुक्‍त किया
> जाता है । तबले पर हिन्‍दुस्‍तानी संगीत के कठिन ताल भी बहुत प्रवीणता के साथ
> बजाए जाते हैं । वर्तमान समय के कुछ प्रमुख तबला वादक हैं-उस्‍ताद अल्‍ला
> रक्‍खा खां और उनके सुपुत्र ज़ाकिर हुसैन, शफात अहमद और सामता प्रसाद ।
>
>
> *तबला*
>
> तबले की जोड़ी दो लम्‍बवत् ऊर्ध्‍वक ढोलों का एक समूह है । इसके दायें
> हिस्‍से को तबला कहा जाता है और बांये हिस्‍से  को बांया अथवा ‘डग्‍गा’ कहते
> हैं । तबला लकड़ी का बना होता है । इस लकड़ी के ऊपरी हिस्‍से को पशु की खाल से
> ढका जाता है और चमड़े की पट्टियों की सहायता से जोड़ा जाता है । चर्म पट्टियों
> तथा लकड़ी के ढांचे के बीच आयताकार (चौकोर) लकड़ी के खाल के हिस्‍से के बीच
> में स्‍याही को मिश्रण लगाया जाता है । तबले को हथौड़ी से ऊपरी हिस्‍से के
> किनारों को ठोंक कर उपयुक्‍त स्‍वर को मिलाया जा सकता है । बांया हिस्‍सा
> मिट्टी अथवा धातु का बना होता है । इसका ऊपरी हिस्‍सा पशु की खाल से ढंका जाता
> है और उस पर भी स्‍याही का मिश्रण लगाया जाता है । कुछ संगीतकार इस हिस्‍से को
> सही स्‍वर में नहीं मिलाते ।
>
> तबले की जोड़ी को हिन्‍दुस्‍तानी संगीत के कंठ तथा वाद्य-संगीत और उत्‍तर
> भारत की कई नृत्‍य शैलियों के साथ संगत प्रदान करने के लिए प्रयुक्‍त किया
> जाता है । तबले पर हिन्‍दुस्‍तानी संगीत के कठिन ताल भी बहुत प्रवीणता के साथ
> बजाए जाते हैं । वर्तमान समय के कुछ प्रमुख तबला वादक हैं-उस्‍ताद अल्‍ला
> रक्‍खा खां और उनके सुपुत्र ज़ाकिर हुसैन, शफात अहमद और सामता प्रसाद ।
>
>
>
> *आलिंग्‍य*
>
> तीसरा वर्ग आलिंग्‍य ढोल हैं । इन ढोलों में पशु की खाल को लकड़ी के एक गोल
> खांचे पर लगा दिया जाता है और गले या इसे एक हाथ से शरीर के निकट करके पकड़ा
> जाता है, जबकि दूसरे हाथ को ताल देने के लिए प्रयुक्‍त किया जाता  है । इस
> वर्ग में डफ, डफली आदि आते हैं, जो बहुत प्रचलित वाद्य है ।
>
> *डमरू*
>
> डमरू ढोलों का एक अन्‍य प्रमुख वर्ग है । इस वर्ग में हिमाचल प्रदेश के छोटे
> ‘हुडुका’ से लेकर दक्षिणी प्रदेश का विशाल वाद्य ‘तिमिल’ तक आते हैं । पहले
> वाद्य को हाथ से आघात देकर बजाया जाता है, जबकि दूसरे को कंधे से लटका कर
> डंडियों और उंगलियों से बजाया जाता है । इस प्रकार के वाद्यों को रेतघड़ी वर्ग
> के ढोलों के नाम से भी जाना जाता है क्‍योंकि इनका आकार रेतघड़ी से
> मिलता-जुलता प्रतीत होता है ।
>
>
> *घन वाद्य*
>
> मनुष्‍य द्वारा अविष्‍कृत सबसे प्राचीन वाद्यों को घन वाद्य कहा जाता है । एक
> बार जब यह वाद्य बन जाते हैं तो फिर इन्‍हें बजाने के समय कभी भी विशेष सुर
> में मिलाने की आवश्‍यकता नहीं होती । प्राचीन काल में यह वाद्य मानव शरीर के
> विस्‍तार जैसे डंडियों, तालों तथा छडि़यों आदि के रूप में सामने आए और ये
> दैनिक जीवन में प्रयोग में लाई जाने वाली वस्‍तुओं, जैसे पात्र (बर्तन),
> कड़ाही, झांझ, तालम् आदि के साथ बहुत गहरे जुड़े हुए थे । मूलत: यह वस्‍तुएं
> लय प्रदान करती है और लोक तथा आदिवासी अंचल के संगीत तथा नृत्‍य के साथ संगत
> प्रदान करने के लिए सर्वाधिक उपयुक्‍त  हैं ।
>
>
>
>
> *झांझ वादक, कोणार्क, उड़ीसा*
>
> उड़ीसा के कोर्णाक स्थित सूर्य मंदिर में हम एक 8 फीट ऊंचा शिल्‍प देख सकते
> हैं, जिसमें एक स्‍त्री को झांझ बजाते हुए प्रदर्शित किया गया है ।
>
> --
> 1. Webpage for this HindiSTF is : https://groups.google.com/d/
> forum/hindistf
> 2. For doubts on Ubuntu and other public software, visit
> http://karnatakaeducation.org.in/KOER/en/index.php/
> Frequently_Asked_Questions
> 3. If a teacher wants to join STF, visit http://karnatakaeducation.org.
> in/KOER/en/index.php/Become_a_STF_groups_member
>
> -----------
> 1.ವಿಷಯ ಶಿಕ್ಷಕರ ವೇದಿಕೆಗೆ ಶಿಕ್ಷಕರನ್ನು ಸೇರಿಸಲು ಈ ಅರ್ಜಿಯನ್ನು ತುಂಬಿರಿ.
> - https://docs.google.com/forms/d/1Iv5fotalJsERorsuN5v5yHGuKrmpF
> XStxBwQSYXNbzI/viewform
> 2. ಇಮೇಲ್ ಕಳುಹಿಸುವಾಗ ಗಮನಿಸಬೇಕಾದ ಕೆಲವು ಮಾರ್ಗಸೂಚಿಗಳನ್ನು ಇಲ್ಲಿ ನೋಡಿ.
> -http://karnatakaeducation.org.in/KOER/index.php/ವಿಷಯಶಿಕ್
> ಷಕರವೇದಿಕೆ_ಸದಸ್ಯರ_ಇಮೇಲ್_ಮಾರ್ಗಸೂಚಿ
> 3. ಐ.ಸಿ.ಟಿ ಸಾಕ್ಷರತೆ ಬಗೆಗೆ ಯಾವುದೇ ರೀತಿಯ ಪ್ರಶ್ನೆಗಳಿದ್ದಲ್ಲಿ ಈ ಪುಟಕ್ಕೆ ಭೇಟಿ
> ನೀಡಿ -
> http://karnatakaeducation.org.in/KOER/en/index.php/Portal:ICT_Literacy
> 4.ನೀವು ಸಾರ್ವಜನಿಕ ತಂತ್ರಾಂಶ ಬಳಸುತ್ತಿದ್ದೀರಾ ? ಸಾರ್ವಜನಿಕ ತಂತ್ರಾಂಶದ ಬಗ್ಗೆ
> ತಿಳಿಯಲು -http://karnatakaeducation.org.in/KOER/en/index.php/
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1. Webpage for this HindiSTF is : https://groups.google.com/d/forum/hindistf
2. For doubts on Ubuntu and other public software, visit 
http://karnatakaeducation.org.in/KOER/en/index.php/Frequently_Asked_Questions
3. If a teacher wants to join STF, visit 
http://karnatakaeducation.org.in/KOER/en/index.php/Become_a_STF_groups_member
 
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1.ವಿಷಯ ಶಿಕ್ಷಕರ ವೇದಿಕೆಗೆ  ಶಿಕ್ಷಕರನ್ನು ಸೇರಿಸಲು ಈ  ಅರ್ಜಿಯನ್ನು ತುಂಬಿರಿ.
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https://docs.google.com/forms/d/1Iv5fotalJsERorsuN5v5yHGuKrmpFXStxBwQSYXNbzI/viewform
2. ಇಮೇಲ್ ಕಳುಹಿಸುವಾಗ ಗಮನಿಸಬೇಕಾದ ಕೆಲವು ಮಾರ್ಗಸೂಚಿಗಳನ್ನು ಇಲ್ಲಿ ನೋಡಿ.
-http://karnatakaeducation.org.in/KOER/index.php/ವಿಷಯಶಿಕ್ಷಕರವೇದಿಕೆ_ಸದಸ್ಯರ_ಇಮೇಲ್_ಮಾರ್ಗಸೂಚಿ
3. ಐ.ಸಿ.ಟಿ ಸಾಕ್ಷರತೆ ಬಗೆಗೆ ಯಾವುದೇ ರೀತಿಯ ಪ್ರಶ್ನೆಗಳಿದ್ದಲ್ಲಿ ಈ ಪುಟಕ್ಕೆ ಭೇಟಿ ನೀಡಿ -
http://karnatakaeducation.org.in/KOER/en/index.php/Portal:ICT_Literacy
4.ನೀವು ಸಾರ್ವಜನಿಕ ತಂತ್ರಾಂಶ ಬಳಸುತ್ತಿದ್ದೀರಾ ? ಸಾರ್ವಜನಿಕ ತಂತ್ರಾಂಶದ ಬಗ್ಗೆ ತಿಳಿಯಲು 
-http://karnatakaeducation.org.in/KOER/en/index.php/Public_Software
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