On Tuesday, August 15, 2017, Shreenivas Naik <
[email protected]> wrote:

>
> Dhanyawad sir ji..aapne bahot hi achhe se 1965 ki ladai k baare main
> knowledge diya hai....
>
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> <http://www.bbc.com/hindi/india/2015/09/150920_1965_indo_pak_war_20_dograi_pm#>
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> <http://www.bbc.com/hindi/india/2015/09/150920_1965_indo_pak_war_20_dograi_pm#>
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> Image captionडोगरई की लड़ाई में भाग लेने वाले सैनिक प्रधानमंत्री लाल
> बहादुर शास्त्री के साथ. शास्त्री के ठीक पीछे हैं कर्नल हेड.
>
> 6 सितंबर, 1965 को सुबह 9 बजे 3 जाट ने इच्छोगिल नहर की तरफ़ बढ़ना शुरू किया.
>
> नहर के किनारे हुई लड़ाई में पाकिस्तानी वायु सेना ने बटालियन के भारी
> हथियारों को बहुत नुक़सान पहुंचाया. इसके बावजूद 11 बजे तक उन्होंने नहर के
> पश्चिमी किनारे पर पहले बाटानगर पर कब्ज़ा किया और फिर डोगरई पर.
>
> *सुनिए: डोगरई के हीरो कर्नल हेड
> <http://www.bbc.com/hindi/india/2015/09/150920_1965_episode_20>*
>
> लेकिन भारतीय सेना के उच्च अधिकारियों को उनके इस कारनामे की जानकारी नहीं
> मिल पाई. डिवीजन मुख्यालय को कुछ ग़लत सूचनाएं मिलने के बाद उनसे कहा गया कि
> वो डोगरई से 9 किलोमीटर पीछे हट कर संतपुरा में पोज़ीशन ले लें.
>
> वहाँ उन्होंने अपने ट्रेन्चेज़ खोदे और पाकिस्तानी सैनिकों के भारी दबाव के
> बावजूद वहीं डटे रहे.
> डोगरई पर दोबारा हमलाImage captionडोगरई पर कब्ज़ा होने के बाद का दृश्य.
>
> 21 सितंबर की रात को 3 जाट ने डोगरई पर फिर हमला कर दोबारा उस पर कब्ज़ा
> किया, लेकिन इस लड़ाई में दोनों तरफ़ से बहुत से सैनिक मारे गए.
>
> इस लड़ाई दुनिया की बेहतरीन लड़ाइयों में शुमार किया जाता है और इसे कई सैनिक
> स्कूलों के पाठ्यक्रम में पढ़ाया जाता है. इस पर हरियाणा में लोकगीत भी बन गए
> हैं-
>
> कहे सुने की बात न बोलूँ, आँखों देखी भाई
>
> तीन जाट की कथा सुनाऊँ, सुन ले मेरे भाई
>
> इक्कीस सितंबर रात घनेरी, हमला जाटों ने मारी
>
> दुश्मन में मच गई खलबली, कांप उठी डोगरई
> गोलों के बीच चहलकदमीImage captionरेहान फ़ज़ल के साथ जनरल वर्मा बीबीसी
> स्टूडियो में.
>
> मेजर जनरल बी आर वर्मा याद करते हैं, "21 और 22 की रात को हम सब अपनी ट्रेंच
> में बैठे हुए थे. सीओ लेप्टिनेंट कर्नल हेड ने ट्रेंच की दीवार से अपना पैर
> टिकाया हुआ था. जैसे ही पाकिस्तानियों ने गोलाबारी शुरू की उन्होंने अपना
> हेलमेट लगाया और ट्रेंच के बाहर आकर आ रहे गोलों के बीच चहलक़दमी करने लगे."
>
> ये उनको लोगों को बताने का एक तरीका था कि उन्हें किसी से डरने की ज़रूरत
> नहीं है. वो कहा करते थे कि तो गोली मेरी लिए बनी है वही मुझे मार पाएगी. बाकी
> गोलियों से मुझे डरने की ज़रूरत नहीं है.’
>
> 1965 की लड़ाई पर किताब लिखने वाली रचना बिष्ट रावत बताती हैं, "21 सितंबर की
> रात जब उन्होंने अपने सैनिकों को संबोधित किया तो उनसे दो मांगें की. एक भी
> आदमी पीछे नहीं हटेगा. और दूसरा ज़िदा या मुर्दा डोगरई में मिलना है. उन्होंने
> कहा अगर तुम भाग भी जाओगे, जब भी मैं लड़ाई के मैदान में अकेला लड़ता रहूँगा.
> तुम जब अपने गाँव जाओगे तो गाँव वाले अपने सीओ का साथ छोड़ने के लिए तुम पर
> थूकेंगे."
> सीओ साहब मर गए तो क्या करोगे?
>
> इसके बाद जब सारे सैनिकों ने खाना खा लिया तो वो अपने सहयोगी मेजर शेखावत के
> साथ हर ट्रेंच में गए और सिपाहियों से कहा, "अगर हम आज मर जाते हैं तो ये बहुत
> अच्छी मौत होगी. बटालियन आपके परिवारों की देखभाल करेगी. इसलिए आपको चिंता
> करने की ज़रूरत नहीं है."
> Image captionइच्छोगिल नहर के किनाारे सेनाध्यक्ष जनरल चौधरी के साथ कर्नल
> हेड.
>
> कर्नल शेखावत याद करते हैं, "हेड की बात सुन कर लोगों में जोश भर गया.
> उन्होंने एक सिपाही से पूछा भी कि कल कहाँ मिलना है तो उसने जवाब दिया डोगरई
> में. हेड ने तब तक जाटों की थोड़ी बहुत भाषा सीख ली थी. अपनी मुस्कान दबाते
> हुए वो बोले, ससुरे अगर सीओ साहब ज़ख्मी हो गया तो क्या करोगे. सिपाही ने जवाब
> दिया, सीओ साहब को उठा कर डोगरई ले जाएंगे, क्यों कि सीओ साहब के ऑर्डर साफ़
> हैं... ज़िदा या मुर्दा डोगरई में मिलना है."
> हमला शुरू हो चुका हैImage captionकर्नल डेसमंड हेड
>
> 54 इंफ़ैंट्री ब्रिगेड ने दो चरणों में हमले की योजना बनाई थी. पहले 13 पंजाब
> को 13 मील के पत्थर पर पाकिस्तानी रक्षण को भेदना था और फिर 3 जाट को हमला कर
> डोगरई पर कब्ज़ा करना था.
>
> लेकिन हेड ने ब्रिगेड कमांडर से पहले ही कह दिया था कि 13 पंजाब का हमला सफल
> हो या न हो, 3 जाट दूसरे चरण को पूरी करेगी. 13 पंजाब का हमला असफल हो गया और
> ब्रिगेड कमांडर ने वायरलेस पर हेड से उस रात हमला रोक देने के लिए कहा.
>
> हेड ने कमाँडर की सलाह मानने से इंकार कर दिया. उन्होंने कहा, हम हमला
> करेंगे, बल्कि वास्तव में हमला शुरू हो चुका है.
> 27 ही जीवित बचे
>
> ठीक 1 बज कर चालीस मिनट पर हमले की शुरुआत हुई. डोगरई के बाहरी इलाके में
> सीमेंट के बने पिल बॉक्स से पाकिस्तानियों ने मशीन गन से ज़बरदस्त हमला किया.
>
> सूबेदार पाले राम ने चिल्ला कर कहा, "सब जवान दाहिने तरफ़ से मेरे साथ चार्ज
> करेंगे." कैप्टेन कपिल सिंह थापा की प्लाटून ने भी लगभग साथ साथ चार्ज किया.
>
> जो गोली खा कर गिरे उन्हें वहीं पड़े रहने दिया गया. पाले राम के सीने और पेट
> में छह गोलियाँ लगीं लेकिन उन्होंने तब भी अपने जवानों को कमांड देना जारी रखा.
>
> हमला कर रहे 108 जवानों में से सिर्फ़ 27 जीवित बच पाए. बाद में कर्नल हेड ने
> अपनी किताब द बैटिल ऑफ़ डोगरई मे लिखा, "ये एक अविश्वसनीय हमला था. इसका
> हिस्सा होना और इसको इतने नज़दीक से देख पाना मेरे लिए बहुत सम्मान की बात थी."
> आसाराम त्यागी की बहादुरी
>
> कैप्टेन बीआर वर्मा अपने सीओ से 18 गज़ पीछे चल रहे थे कि अचानक उनकी दाहिनी
> जाँग में कई गोलियाँ आकर लगीं और वो ज़मीन पर गिर पड़े.
>
> कंपनी कमांडर मेजर आसाराम त्यागी को भी दो गोलियाँ लगीं, लेकिन उन्होंने
> लड़ना जारी रखा. उन्होंने एक पाकिस्तानी मेजर पर गोली चलाई और फिर उस पर संगीन
> से हमला किया.
> Image captionरचना बिष्ट रेहान फ़ज़ल के साथ.
>
> रचना बिष्ट बताती हैं कि इस बीच बिल्कुल प्वॉएंट ब्लैंक रेंज से उनको दो
> गोलियाँ और लगीं और एक पाकिस्तानी सैनिक ने उनके पेट में संगीन भोंक दी.
>
> वो अपना लगभग खुल चुका पेट पकड़ कर जैसे ही गिरे हवलदार राम सिंह ने एक बड़ा
> पत्थर उठा कर उन्हें संगीन भोंकने वाले पाकिस्तानी सिपाही के सिर पर दे मारा.
>
> मेजर वर्मा बताते हैं, "त्यागी कभी बेहोश हो रहे थे तो कभी उन्हें होश आ रहा
> था. मैं भी घायल था. मुझे उस झोंपड़ी में ले जाया गया जहाँ सभी घायल सैनिक
> पड़े हुए थे. जब घायल लोगों को वहाँ से हटाने का समय आया तो त्यागी ने मुझसे
> कराहते हुए कहा, आप सीनियर हैं, पहले आप जाइए. मैंने उन्हें चुप रहने के लिए
> कहा और सबसे पहले उनको ही भेजा. उनका बहुत ख़ून निकल चुका था."
>
> मेजर शेख़ावत बताते हैं, "त्यागी बहुत पीड़ा में थे. उन्होंने मुझसे कहा सर,
> मैं बचूंगा नहीं. आप एक गोली मार दीजिए. आपके हाथ से मर जाना चाहता हूँ. हम
> सभी चाहते थे कि त्यागी ज़िंदा रहें."
>
> तमाम प्रयासों के बावजूद 25 सिंतंबर को त्यागी इस दुनिया से चल बसे
> पाकिस्तानी कमांडिंग ऑफ़ीसर पकड़े गए
>
> सुबह के तीन बजते बजते डोगरई पर भारतीय सैनिकों का कब्ज़ा हो गया. सवा छह बजे
> भारतीय टैंक भी वहाँ पहुंच गए और उन्होंने इच्छोगिल नहर के दूसरे किनारे पर
> गोलाबारी शुरू कर दी जहाँ से भारतीय सैनिकों पर भयानक फ़ायर आ रहा था.
>
> 3 जाट के सैनिकों ने झोंपड़ी में छिपे हुए पाकिस्तानी सैनिकों को पकड़ना शुरू
> किया. पकड़े जाने वालों में थे लेफ़्टिनेंट कर्नल जे एफ़ गोलवाला जो कि 16
> पंजाब (पठान) के कमांडिंग ऑफ़ीसर थे.
>
> इच्छोगिल नहर पर लांस नायक ओमप्रकाश ने भारत का झंडा फहराया. वहाँ मौजूद
> लोगों के लिए यह बहुत गर्व का क्षण था.
> Image captionकर्नल हेड को महावीर चक्र से सम्मानित करते हुए राष्ट्रपति
> राधाकृष्णन.
>
> उन लोगों की याद कर उनकी आखों में आँसू छलक आए जिन्होंने डोगरई पर कब्ज़े के
> लिए अपने प्राण न्योछावर किए थे.
>
> इस लड़ाई के ले लेफ़्टिनेंट कर्नल डी एफ़ हेड, मेजर आसाराम त्यागी और कैप्टेन
> के एस थापा को महावीर चक्र दिया गया.
> हुसैन ने चित्र बनाया
>
> कर्नल हेड 2013 तक जीवित रहे. रचना बिष्ट की उनसे मुलाकात तब हुई थी जब उनका
> दिल्ली के सैनिक अस्पताल में त्वचा के कैंसर का इलाज चल रहा था.
> Image captionकर्नल हेड का यह चित्र एमएफ़ हुसैन ने डोगरई के मोर्चे पर
> बनाया था.
>
> रचना याद करती हैं, "वो अक्सर जॉन ग्रीशम की नॉवेल पढ़ते रहते थे. वो जानवरों
> के प्रेमी थे और वो 45 कुत्तों की खुद देखभाल किया करते थे. कोटद्वार के पास
> उनके गाँव वाले याद करते हैं कि वो अक्सर अपने घर के पास बहने वाली नहर में
> अपने कुत्तों के कपड़े धोते नज़र आते थे. उन्होंने अपने जीवन के अंतिम क्षणों
> तक मोबाइल या कंप्यूटर का इस्तेमाल नहीं किया."
>
> वे आगे बताती हैं, "वो शायद अकेले सैनिक अफ़सर थे जिनका चित्र मशहूर चित्रकार
> एम एफ़ हुसैन ने युद्ध स्थल पर ही बनाया था. वो चित्र अभी भी बरेली के
> रेजिमेंटल सेंटर म्यूज़ियम में रखा हुआ है."
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