Mulyabodh ka arth ya vyakhya uska mahtva agar kuch bhi iske bare me raha to
bhejiye sir pls

On 28-Aug-2017 10:07 PM, "Shreenivas Naik" <
[email protected]> wrote:

> अनुवाद
>
> किसी भाषा में कही या लिखी गयी बात का किसी दूसरी भाषा में सार्थक परिवर्तन
> अनुवाद (Translation) कहलाता है। अनुवाद का कार्य बहुत पुराने समय से होता आया
> है।
>
> संस्कृत में 'अनुवाद' शब्द का उपयोग शिष्य द्वारा गुरु की बात के दुहराए
> जाने, पुनः कथन, समर्थन के लिए प्रयुक्त कथन, आवृत्ति जैसे कई संदर्भों में
> किया गया है। संस्कृत के ’वद्‘ धातु से ’अनुवाद‘ शब्द का निर्माण हुआ है।
> ’वद्‘ का अर्थ है बोलना। ’वद्‘ धातु में 'अ' प्रत्यय जोड़ देने पर भाववाचक
> संज्ञा में इसका परिवर्तित रूप है 'वाद' जिसका अर्थ है- 'कहने की क्रिया' या
> 'कही हुई बात'। 'वाद' में 'अनु' उपसर्ग उपसर्ग जोड़कर 'अनुवाद' शब्द बना है,
> जिसका अर्थ है, प्राप्त कथन को पुनः कहना। इसका प्रयोग पहली बार मोनियर
> विलियम्स ने अँग्रेजी शब्द टांंसलेशन (translation) के पर्याय के रूप में
> किया। इसके बाद ही 'अनुवाद' शब्द का प्रयोग एक भाषा में किसी के द्वारा
> प्रस्तुत की गई सामग्री की दूसरी भाषा में पुनः प्रस्तुति के संदर्भ में किया
> गया।
>
> वास्तव में अनुवाद भाषा के इन्द्रधनुषी रूप की पहचान का समर्थतम मार्ग है।
> अनुवाद की अनिवार्यता को किसी भाषा की समृद्धि का शोर मचा कर टाला नहीं जा
> सकता और न अनुवाद की बहुकोणीय उपयोगिता से इन्कार किया जा सकता है।
> ज्त्।छैस्।ज्प्व्छ के पर्यायस्वरूप ’अनुवाद‘ शब्द का स्वीकृत अर्थ है, एक भाषा
> की विचार सामग्री को दूसरी भाषा में पहुँचना। अनुवाद के लिए हिंदी में 'उल्था'
> का प्रचलन भी है।अँग्रेजी में TRANSLATION के साथ ही TRANSCRIPTION का प्रचलन
> भी है, जिसे हिंदी में 'लिप्यन्तरण' कहा जाता है। अनुवाद और लिप्यंतरण का अंतर
> इस उदाहरण से स्पष्ट है-
>
> उसके सपने सच हुए।HIS DREAMS BECAME TRUE - TRANSLATIONUSKEY SAPNE SACH HUEY
> - TRANSCRIPTION
>
> इससे स्पष्ट है कि 'अनुवाद' में हिंदी वाक्य को अँग्रेजी में प्रस्तुत किया
> गया है जबकि लिप्यंतरण में नागरी लिपि में लिखी गयी बात को मात्र रोमन लिपि
> में रख दिया गया है।
>
> अनुवाद के लिए 'भाषांतर' और 'रूपांतर' का प्रयोग भी किया जाता रहा है। लेकिन
> अब इन दोनों ही शब्दों के नए अर्थ और उपयोग प्रचलित हैं। 'भाषांतर' और
> 'रूपांतर' का प्रयोग अँग्रेजी के INTERPRETATION शब्द के पर्याय-स्वरूप होता
> है, जिसका अर्थ है दो व्यक्तियों के बीच भाषिक संपर्क स्थापित करना। कन्नडभाषी
> व्यक्ति और असमियाभाषीव्यक्ति के बीच की भाषिक दूरी को भाषांतरण के द्वारा ही
> दूर किया जाता है। 'रूपांतर' शब्द इन दिनों प्रायः किसी एक विधा की रचना की
> अन्य विधा में प्रस्तुति के लिए प्रयुक्त है। जैस, प्रेमचन्द के उपन्यास
> 'गोदान' का रूपांतरण 'होरी' नाटक के रूप में किया गया है।
>
> किसी भाषा में अभिव्यक्त विचारों को दूसरी भाषा में यथावत् प्रस्तुत करना
> अनुवाद है। इस विशेष अर्थ में ही 'अनुवाद' शब्द का अभिप्राय सुनिश्चित है। जिस
> भाषा से अनुवाद किया जाता है, वह मूलभाषा या स्रोतभाषा है। उससे जिस नई भाषा
> में अनुवाद करना है, वह 'प्रस्तुत भाषा' या 'लक्ष्य भाषा' है। इस तरह, स्रोत
> भाषा में प्रस्तुत भाव या विचार को बिना किसी परिवर्तन के लक्ष्यभाषा में
> प्रस्तुत करना ही अनुवाद है।
>
> अनुवादक:-
>
> एक अच्छा अनुवादक वह है जो-
>
> स्रोत भाषा (जिससे अनुवाद करना है) के लिखित एवं वाचिक दोनों रूपों का अच्छा
> ज्ञाता हो।लक्ष्य भाषा ((जिसमें अनुवाद करना है) के लिखित रूप का अच्छा ज्ञाता
> हो,पाठ जिस विषय या टॉपिक का है, उसकी जानकारी रखता हो।
>
>
> अनुवाद : स्वरूप वैविध्य:-
>
> अनुवाद को कला और विज्ञान दोनों ही रूपों में स्वीकारने की मानसिकता इसी कारण
> पल्लवित हुई है कि संसारभर की भाषाओं के पारस्परिक अनुवाद की कोशिश अनुवाद की
> अनेक शैलियों और प्रविधियों की ओर इशारा करती हैं। अनुवाद की एक भंगिमा तो यही
> है कि किसी रचना का साहित्यिक-विधा के आधार पर अनुवाद उपस्थित किया जाए। यदि
> किसी नाटक का नाटक के रूप में ही अनुवाद किया जाए तो ऐसे अनुवादों में अनुवादक
> की अपनी सर्जनात्मक प्रतिभा का वैशिष्ट्य भी अपेक्षित होता है। अनुवाद का एक
> आधार अनुवाद के गद्यात्मक अथवा पद्यात्मक होने पर भी आश्रित है। ऐसा पाया जाता
> है कि अधिकांशतः गद्य का अनुवाद गद्य में अथवा पद्य में ही उपस्थित हो, लेकिन
> कभी-कभी यह क्रम बदला हुआ नजर आता है। कई गद्य कृतियों के पद्यानुवाद मिलते
> हैं, तो कई काव्यकृतियों के गद्यानुवाद भी उपलब्ध हैं। अनुवादों को विषय के
> आधार पर भी वर्गीकृत किया जाता है और कई स्तरों पर अनुवाद की प्रकृति के
> अनुरूप उसे मूल-केंद्रित और मूलमुक्त दो वर्गों में भी बाँटा गया है। अनुवाद
> के जिन सार्थक और प्रचलित प्रभेदों का उल्लेख अनुवाद विज्ञानियों ने किया है,
> उनमें शब्दानुवाद, भावानुवाद, छायानुवाद, सारानुवाद, व्याख्यानुवाद, आशुअनुवाद
> और रूपांतरण को सर्वाधिक स्वीकृति मिली है।
>
> शब्दानुवाद:-
>
> स्रोतभाषा के प्रत्येक शब्द का लक्ष्यभाषा के प्रत्येक शब्द में यथावत्
> अनुवादन को शब्दानुवाद कहते हैं। 'मक्षिका स्थाने मक्षिका' पर आधारित
> शब्दानुवाद वास्तव में अनुवाद की सबसे निकृष्ट कोटि का परिचायक होता है।
> प्रत्येक भाषा की प्रकृति अन्य भाषा से भिन्न होती है और हर भाषा में शब्द के
> अनेकानेक अर्थ विद्यमान रहते हैं। इसीलिए मूल भाषा की हर शब्दाभिव्यक्ति को
> यथावत् लक्ष्यभाषा में नहीं अनुवादित किया जा सकता। कई बार ऐसे शब्दानुवादों
> के कारण बड़ी हास्यास्पद स्थिति उत्पन्न हो जाती है। संस्कृत से हिंदी में
> किये गये अनुवाद को कई बार प्रकृति की साम्यता के कारण सह्य होते हैं, लेकिन
> यूरोपीय परिवार की भाषाओं से किये गए अनुवाद में अर्थ और पदक्रम के दोष
> सामान्यतः नजर आते हैं। वास्तव में यदि स्रोत और लक्ष्यभाषा में अर्थ, प्रयोग,
> वाक्य-विन्यास और शैली की समानता हो, तभी शब्दानुवाद सही होता है, अन्यथा
> यंत्रावत् किये गए शब्दानुवाद अबोधगम्य, हास्यास्पद एवं कृत्रिम हो जाते हैं।
>
> भावानुवाद:-
>
> ऐसे अनुवादकों में स्रोत-भाषा के शब्द, पदक्रम और वाक्य-विन्यास पर ध्यान न
> देकर अनुवाद मूलभाषा की विचार-सामग्री या भावधारा पर अपने आपको केंद्रित करता
> है। ऐसे अनुवादों में स्रोतभाषा की भाव-सामग्री को उपस्थित करना ही अनुवादक का
> लक्ष्य होता है। भावानुवाद की प्रक्रिया में कभी-कभी मूल रचना जैसा मौलिक वैभव
> आ जाता है, लेकिन कई बार पाठकों को यह शिकायत होती है कि अनुवादक ने मूलभाषा
> की भावधारा को समझे बिना, लक्ष्य-भाषा की प्रकृति के अनुरूप भाव सामग्री
> प्रस्तुत कर दी है। जब पाठक किसी रचना को रचनाकार के अभिव्यक्ति-कौशल की
> दष्ष्टि से पढ़ना चाहता है, तो भावानुवाद उसकी लक्ष्यसिद्धि में सहायक नहीं
> होता।
>
> छायानुवाद:-
>
> संस्कृत नाटकों में लगातार ऐसे प्रयोग मिलते हैं कि उनकी स्त्रा-पात्रा तथा
> सेवक, दासी आदि जिस प्राकृत भाषा का प्रयोग करते हैं , उसकी संस्कृत छाया भी
> नाटक में विद्यमान रहती है। ऐसे ही प्रयोगों से छायानुवाद का उद्भव हुआ है।
> अनुवाद की प्रविधि के अंतर्गत अनुवादक न शब्दानुवाद की तरह केवल मूल शब्दों का
> अनुसरण करता है और न सिर्फ भावों का ही परिपालन करता है, बल्कि मूलभाषा से
> पूरी तरह बंधा हुआ उसकी छाया में लक्ष्यभाषा में वर्ण्य-विषय की प्रस्तुति
> करता है।
>
> सारानुवाद:-
>
> इस अनुवाद में मूलभाषा की सामग्री का संक्षिप्त और अतिसंक्षिप्त अनुवाद
> लक्ष्यभाषा में किया जाता है। लंबे भाषणों और वाद-विवादों के अनुवाद प्रस्तुत
> करने में यह विधि सहायक होती है।
>
> व्याख्यानुवाद:-
>
> ऐसे अनुवादों में मूलभाषा की सामग्री का लक्ष्यभाषा में व्याख्या सहित अनुवाद
> उपस्थित किया जाता है। इसमें अनुवादक अपने अध्ययन और दष्ष्टिकोण के अनुरूप मूल
> भाषा की सामग्री की व्याख्या अपेक्षित प्रमाणों और उदाहरणों आदि के साथ करता
> है। लोकमान्य तिलक ने ’गीता‘ का अनुवाद इस शैली में किया है। संस्कृत के बहुत
> सारे भाष्यकारों और हिन्दी के टीकाकारों ने व्याख्यानुवाद की शैली का ही
> अनुगमन किया है। स्वभावतः व्याख्यानुवाद अथवा भाष्यानुवाद मूल से बहुत बड़ा हो
> जाता है और कई स्तरों पर तो एकदम मौलिक बन जाता है।
>
> आशु अनुवाद :-
>
> जहाँ अनुवाद दुभाषिये की भूमिका में काम करता है, वहाँ वह केवल आशुअनुवाद कर
> पाता है। दो दूरस्थ देशों के भिन्न भाषा-भाषी जब आपस में बातें करते हैं, तो
> उनके बीच दुभाषिया संवाद का माध्यम बनता है। ऐसे अवसरों पर वे अनुवाद शब्द और
> भाव की सीमाओं को तोड़कर अनुवादक की सत्वर अनुवाद क्षमता पर आधारित हो जाता
> है। उसके पास इतना समय नहीं होता है कि शब्द के सही भाषायी पर्याय के बारे में
> सोचे अथवा कोशों की सहायता ले सके। कई बार ऐसे दुभाषिये के आशुअनुवाद के कारण
> दो देशों में तनाव की स्थिति भी बन जाती है। आशुअनुवाद ही अब भाषांतरण के रूप
> में चर्चित है।
>
> रूपांतरण:-
>
> अनुवाद के इस प्रभेद में अनुवादक मूलभाषा से लक्ष्यभाषा में केवल शब्द और भाव
> का अनुवादन नहीं करता, अपितु अपनी प्रतिभा और सुविधा के अनुसार मूल रचना का
> पूरी तरह रूपांतरण कर डालता है। विलियम शेक्सपीयर के प्रसिद्ध नाटक 'मर्चेन्ट
> ऑफ वेनिस' का अनुवाद भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने 'दुर्लभ बन्धु' अर्थात् 'वंशपुर
> का महाजन' नाम से किया है जो रूपांतरण के अनुवाद का अन्यतम उदाहरण है। मूल
> नाटक के एंटोनियो, बैसोलियो, पोर्शिया, शाइलॉक जैसे नामों को भारतेंदु ने
> क्रमशः अनंत, बसंत, पुरश्री, शैलाक्ष जैसे रूपांतर प्रदान किये हैं। ऐसे
> रूपांतरण में अनुवाद की मौलिकता सबसे अधिक उभरकर सामने आती है।
>
> अनुवादक के इन प्रभेदों से ज्ञापित होता है कि संसार भर की भाषाओं में अनुवाद
> की कई शैलियाँ और प्रविधियाँ अपनाई गई हैं, लेकिन यदि अनुवादक सावधानीपूर्वक
> शब्द और भाव की आत्मा का स्पर्श करते हुए मूलभाषा की प्रकृति के अनुरूप
> लक्ष्यभाषा में अनुवाद उपस्थित करे तो यही आदर्श अनुवाद होगा। इसीलिए श्रेष्ठ
> अनुवादक को ऐसा कुशल चिकित्सक कहा जाता है, जो बोतल में रखी दवा को अपनी
> सिरिंज के द्वारा रोगी के शरीर में यथावत पहुँचा देता है।
>
> अनुवाद के सिद्धान्त:-
>
> अनुवाद प्रक्रिया:-
>
> 1. चयन 2. पठन 3. विश्लेषण 4. भाषांतरण 5. पुनिरीक्षण 6. मिलान 7. संशोधित
> भाषांतरण
>
>
> अनुवादक एवं इंटरप्रेटर:-
>
> अनुवाद एक लिखित विधा है, जिसे करने के लिए कई साधनों की जरूरत पड़ती है।
> शब्दकोश, संदर्भ ग्रंथ, विषय विशेषज्ञ या मार्गदर्शक की मदद से अनुवाद कार्य
> को पूरा किया जाता है। इसकी कोई समय सीमा नहीं होती। अपनी इच्छानुसार अनुवादक
> इसे कई बार शुद्धीकरण के बाद पूरा कर सकता है। इंटरप्रेटशन यानी भाषांतरण एक
> भाषा का दूसरी भाषा में मौखिक रूपांतरण है। इसे करने वाला इंटरप्रेटर कहलाता
> है। इंटरप्रेटर का काम तात्कालिक है। वह किसी भाषा को सुन कर, समझ कर दूसरी
> भाषा में तुरंत उसका मौखिक तौर पर रूपांतरण करता है। इसे मूल भाषा के साथ
> मौखिक तौर पर आधा मिनट पीछे रहते हुए किया जाता है। बहुत कुछ यांत्रिक ढंग का
> भी होता है।
>
> अनुवाद के प्रकार:-
>
> साहित्यिक अनुवाद ,तकनीकी अनुवाद, चिकित्सकीय अनुवाद
>
> अनुवाद की तकनीकें
>
> मशीनी अनुवाद :-
>
> कम्प्यूटर और साफ्टवेयर की क्षमताओं में अत्यधिक विकास के कारण आजकल अनेक
> भाषाओं का दूसरी भाषाओं में मशीनी अनुवाद सम्भव हो गया है। यद्यपि इन अनुवादों
> की गुणवता अभी भी संतोषप्रद नहीं कही जा सकती, तथापि अपने इस रूप में भी यह
> मशीनी अनुवाद कई अर्थों में और अनेक दृष्टियों से बहुत उपयोगी सिद्ध हो रहा
> है। जहाँ कोई चारा न हो, वहाँ मशीनी अनुवाद से कुछ न कुछ अर्थ तो समझ में आ ही
> जाता है।
>
> मशीनी अनुवाद की दिशा में आने वाले दिनों में काफी प्रगति होने वाली है।
> मशीनी अनुवाद के कारण दुनिया में एक नयी क्रान्ति आयेगी।
>
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> 1. Webpage for this HindiSTF is : https://groups.google.com/d/
> forum/hindistf
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> http://karnatakaeducation.org.in/KOER/en/index.php/
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> - https://docs.google.com/forms/d/1Iv5fotalJsERorsuN5v5yHGuKrmpF
> XStxBwQSYXNbzI/viewform
> 2. ಇಮೇಲ್ ಕಳುಹಿಸುವಾಗ ಗಮನಿಸಬೇಕಾದ ಕೆಲವು ಮಾರ್ಗಸೂಚಿಗಳನ್ನು ಇಲ್ಲಿ ನೋಡಿ.
> -http://karnatakaeducation.org.in/KOER/index.php/ವಿಷಯಶಿಕ್
> ಷಕರವೇದಿಕೆ_ಸದಸ್ಯರ_ಇಮೇಲ್_ಮಾರ್ಗಸೂಚಿ
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> http://karnatakaeducation.org.in/KOER/en/index.php/Portal:ICT_Literacy
> 4.ನೀವು ಸಾರ್ವಜನಿಕ ತಂತ್ರಾಂಶ ಬಳಸುತ್ತಿದ್ದೀರಾ ? ಸಾರ್ವಜನಿಕ ತಂತ್ರಾಂಶದ ಬಗ್ಗೆ
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> For more options, visit https://groups.google.com/d/optout.
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