Super sir good information. अच्छी जानकारी दी सर।
On 05-Oct-2017 11:15 AM, "Shreenivas Naik" < [email protected]> wrote: > शिक्षा का माध्यम : अंग्रेजी या मातृभाषा ------------विश्वमोहन तिवारी . > > हमें यह मैकाले की नहीं, विश्वगुरु की शिक्षा चाहिए!.आओ मिलकर इसे बनायें- > तिलक > > जब विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी पश्चिम से आई हैं, और हमारी भाषाओं ने > विप्रौद्योगिकी के विकास में कार्य नहीं किया तब हम अपनी भाषा में विज्ञान > कैसे सीख सकते हैंॐ उसे तो अंग्रेजी के द्वारा ही सीखना पड़ेगा।इस पर थोड़ा > गहराई से विचार करें। > > शिक्षा के माध्यम के विषय में आम आदमी की क्या सोच है ? आम आदमी कहता है कि > शिक्षा का माध्यम वह हो जिसमें अच्छी शिक्षा मिले, जो जीवन में काम आएऌ और हम > देख ही रहे हैं कि अंग्रेजी माध्यम वाले कॉन्वैन्ट और पब्लिक स्कूलों में ही > अच्छी पढ़ाई हो रही है।बिना अंग्रेजी के कोई भी अच्छी नौकरी नहीं मिलती। इसलिये > एक तरफ, हम तो मजबूर हैं।फिर दूसरी तरफ, अंग्रेजी तो अंतर्राष्ट्रीय भाषा है, > कम्प्यूटर की भाषा है, विज्ञान और प्रौद्योगिकी की तो हिन्दी में पुस्तकें ही > नहीं हैं।और ऐसे में कुछ सिरफिरे आदर्शवादी लोग ही हैं जो जीवन मूल्यों की > दुहाई देते हुए मातृभाषा को अपनाने की बात करते हैं ॐ वह आगे कहता है कि आखिर > हमें स्वयं को जीवन मूल्य सिखाना ही पड़ते हैं, चाहे जिस भाषा में सीख लें।आखिर > भाषा विचारों के आदान प्रदान का माध्यम ही तो है ! पाश्चात्य सभ्यता आज विकास > के चरम शिखर पर है, क्यों न हम उनकी भाषा से उनके सफलता की कुंजी वाले जीवन > मूल्य ले लें!! > > प््रामुख बात तो यह कि जनतंत्र में जनता की यह मजबूरी कैसी ॐ क्या जनतंत्र > काम नहीं कर रहा है ? जब एक विदेशी भाषा में राजकाज हो तब जनता का राज्य तो हो > ही नहीं सकताÊ क्योंकि उसे तो पता ही नहीं कि संसद में या सरकारी दफ्तरों में > क्या हो रहा है।अतः भाषा संबन्धी सरकारी नीति को, सरकारी स्कूलों को सुधारना > अत्यावश्यक है, अपने अधिकारों के लिये आन्दोलन की आवश्यकता है।आन्दोलन करने के > लिये भ्रमों का निवारण भी जरूरी है, और अंग्रेजी माध्यम से होने वाले खतरे से > सावधान करना भी। शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य क्या हो? तैत्तिरीय उपनिषद तथा > अन्य शास्त्रों में शिक्षा का प्रथम उद्देश्य शिशु को मानव बनाना है, दूसरा, > उसे उत्तम नागरिक़ तथा तीसरे, परिवार का पालन पोषण करने योग्य और साथ ही सुख की > प्राप्ति कराना। हमारी संस्कृति में तो जीवन के चार पुरुषार्थ , धर्म, अर्थ, > काम, मोक्ष के आधार में यह उद्देश्य हैं।क्या प्रचलित शिक्षा के उद्देश्य यह > हैं? एक तरफ व्यवसाय या नौकरी ही शिक्षा का उद्देश्य रह गया है , और दूसरी तरफ > शिक्षा जैसे पुण्य कार्य का घोर व्यवसायी करण या बाजारीकरण हो रहा है। > > अंग्रेजी माध्यम में शिक्षा से हमें पाश्चात्य जीवन मूल्य और भोगवादी सभ्यता > ही मिलेगी क्योंकि भाषा अपने साथ अपनी संस्कृति लाती है।और हमारा दुर्भाग्य कि > अंग्रेजी भक्त यही चाहते हैं।भोगवादियों की सफलता आप उनके भोग के संसाधनों से > ही तो नाप रहे हैं सुख से तो नहीं! भोगवादी सभ्यता में परिवार तथा समाज > विखंडित हो रहा हैऌ नारी स्वयं बाजारू हो रही है। दूरदर्शन इत्यादि माध्यम इस > भोगवाद की अग्नि को भड़का रहे हैं।पाश्चात्य संस्कृति की गुलामी सुख नहीं, सुख > का भ्रम देती है।भारतीय संस्कृति सच्चा सुख दे सकती है क्योंकि उसमें > त्यागपूर्वक भोग का मंत्र है जो हम खो रहे हैं क्योंकि अपनी संस्कृति की वाहन > अपनी मातृभाषा को भूल रहे हैं। नैतिक मूल्य संस्कृति से आते हैं, इसलिये हम > भारतीय जीवन मूल्यों को भूल रहे हैं, और घोर अमानवीयता भुगत रहे हैं। ‘स्टॉक > होम सिन्ड्रोम’ के अनुसार गुलामियत की पराकाष्ठा वह है जब गुलाम स्वयं कहने > लगे कि वह गुलाम नहीं है, जो कुछ भी वह है अपनी स्वेच्छा से है। ब्राउन साहब > कहते हैं कि अंग्रेजी के बिना तो हम अंधकार युग में रहते।हमें अंग्रेजी > चाहिये।यह तो ठीक है कि यदि अंग्रेजी ने फारसी को न हटाया होता तब हम भी अन्य > मुस्लिम देशों की तरह आधुनिकता से वंचित रहतेÊ और साथ ही मानसिक तथा भौतिक रूप > से उनसे अधिक दरिद्र रहतेÊ क्योंकि हमारे पास तो आवश्यक मात्रा में तेल भी > नहीं है।अतएव 1947 तक तो अंग्रेजी ठीक ही थीÊ किन्तु उसके बाद हमें भारतीय > भाषाओं को ही अपनाना था क्योंकि हमारी समृद्ध भाषाओं में विज्ञान संप्रेषण > करने की भी आवश्यक शक्ति है।पहले तो कॉन्वैन्टी स्कूलों में ही भारतीय भाषाओं > काÊ प्रच्छन्न रूप से तिरस्कार होता ही था, अब तो पब्लिक स्कूलों में भी > मातृभाषाओं का तिरस्कार डंके की चोट पर होता है, भारतीय संस्कृति का तिरस्कार > होता है।यह कैसा भारतवर्ष हैॐॐ > > वैश्वीकरण के कारण अंग्रेजी का प्रभुत्व बढ़ा है और प्रवासियों का बड़ी संख्या > में विदेशों में निवास भी। इस के शिक्षा पर हो रहे परिणामों पर जो शोध कैनैडा > में हुए हैं वे उपयोगी हैं, यद्यपि उनकी समस्या हमारी समस्या से उलट > है।टौरॉन्टो शहर के किन्डरगार्टन में पढ़ रहे विद्याार्थियों में 58 त् बच्चे > ऐसे देशों से आए हैं जहां की आम भाषा अंग्रेजी नहीं है।वहां .अर्थात कैनैडा के > फाशिस्ट लोग प्रवासियों को देश से ही निकालना चाहते हैं।और कुछ उन्हें > मुख्यधारा में समाहित करने के लिये प्रवासी विद्याथियों को मात्र अंग्रेजी में > ही शिक्षा देते हैं। > > इस समस्या पर डा . कमिन्सÊ बेकर तथा स्कुटनाबकंगस ने अनुसंधान कियाऌ उन्होने > जो निष्कर्ष निकाले हैं, वे महत्वपूर्ण हैं : > > 1 . अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकारों के तहत बच्चों को मातृभाषा में शिक्षा न > देना मानवाधिकारों का हनन है। > > 2 . द्विभाषी बच्चों की मातृभाषा उनके समग्र विकास तथा शैक्षिक विकास के लिये > अत्यंत महत्वपूर्ण है। > > 3 . जब बच्चे दोनों भाषाओं में विकास करते रहते हैं, उन्हें भाषाओं तथा उनके > उपयोग की गहरी समझ हो जाती है। > > 4 . द्विभाषी बच्चों की विचार पद्धति अधिक नमनीय हो सकती है, तथा उनके भाषाओं > के उपयोग की समझ गहरी हो जाती है। > > 5 . जो बच्चे अपनी मातृभाषा में ठोस आधार लेकर आते हैं, वे शाला की भाषा में > बेहतर योग्यता प्राप्त करते हैं।बच्चों के माता पिता, दादा दादी, नाना नानी > आदि बच्चों से संवाद करते हैं, कहानियां सुनाते हैं, तब बच्चे अधिक > सफलतापूर्वक अन्य भाषा तथा शिक्षा ग्रहण करते हैं।क्योंकि जो भी बच्चों ने घर > में सीखा है वह ज्ञान, वे अवधारणाएं तथा कौशल अन्य भाषा में सरलतापूर्वक आ > जाते हैंैं। यदि बच्चों ने घर में घड़ी देखना सीख लिया है तब उन्होने समय > बतलाना और समझना भी सीख लिया है, अतएव उसे अन्य भाषा में वह अवधारणा सीखने में > बहुत कम समय लगेगा।इसी तरह बच्चे जो भीे शाला की भाषा में सीखते हैं वह > मातृभाषा मैं तैर जाता है, बशत्र्ते कि मातृभाषा का तिरस्कार न किया गया > हो।अर्थात मातृभाषा के उपयोग को शाला में रोकना बच्चे के विकास में सहायक नहीं > होता, वरन अवरुद्ध करता है।जब शाला में उन्हें मातृभाषा में भी प्रभावी शिक्षा > दी जाती है तब द्विभाषी बच्चे शाला में बेहतर शिक्षा प्राप्त करते हैं इसके > विलोम स्वरूप, जब शाला में बच्चों की मातृभाषा का तिरस्कार होता है तब उनका > विकास अवरुद्ध होता है, और उनकी व्यक्तिगत शिक्षा की तथा शिक्षण हेतु > अत्यावश्यक अवधारणाओं की आधारशिला कमजोर होती है। > > 6 . शाला में किसी भी बच्चे की मातृभाषा को ठुकराना, उस बच्चे को ठुकराना है > ॐ जब बच्चे को यह संदेश दिया जाता है कि वह अपनी भाषा और उसके साथ अपनी > संस्कृति शाला के बाहर छोड़कर आए तब वे अपनी अस्मिता का अपने संस्कारों का कुछ > हिस्सा भी बाहर छोड़ आते हैं।यह भी पर्याप्त नहीं है कि शिक्षक बच्चे की भाषा > को निष्क्रिय रूप से स्वीकारें, वरन उन्हें विभिन्न विधियों द्वारा उनकी भाषा > की पुष्टि ही करना चाहिये, तथा सामान्य तौर पर ऐसा शैक्षिक वातावरण तैय्यार > करना चाहिये कि पूर्ण बालक का भाषाई तथा सांस्कृतिक अनुभव स्वीकार्य है।शाला > के अधिकारियों तथा शिक्षकों को यह समझना आवश्यक है कि घर में प्राप्त बच्चे के > भाषाई तथा सांस्कृतिक अनुभव वे महत्वपूर्ण आधार हैं जिन पर भविष्य की शिक्षा > के स्तम्भ का निर्माण होना है। > > इसमें संदेह नहीं कि शिक्षा का पूरा लाभ लेने के लिये मातृभाषा में शिक्षा का > दिया जाना तथा मातृभाषा का सम्मान करना नितांत आवश्यक है।विदेश में हमारी भाषा > का सम्मान हो रहा है और हम इतने गुलाम कि अपने देश में अपनी मातृभषा का > तिरस्कार कर रहे हैं, और बच्चों का और देश का भविष्य खराब कर रहे हैं। > > ऐसा नहीं है कि हमें विदेशी भाषाएं नहीं सीखना चाहिये, अवश्य सीखना चाहिये। > हम अंग्रेजी को एक समुÙत उपयोगी विदेशी भाषा की तरह सीखें।भारत में जो शिक्षा > प्राथमिक स्तर से, और महानगरों में तो नर्सरी से, अंग्रेजी माध्यम में दी जा > रही है वह भारत के लिये धीमे जहर के समान है। नर्सरी या पहली कक्षा से ही > अंग्रेजी शुरु करने पर अंग्रेजी सीखने में न केवल अधिक कठिनाई होगीÊ वरन उस > भाषा का सीखना रटंत विद्या के समान होगा और वह ज्ञान उसके हृदय में प्रवेश > नहीं कर सकेगा।असली भाषा अर्थात हृदय तक पहुँचने वाली भाषा जीवन जीने वाली > भाषा से आती हैÊ जो उसकी मातृभाषा है या उसके क्षेत्र की भाषा है। क्योंकि > बच्चा मातृभाषा में सीखे ज्ञान तथा कौशल को अन्य भाषा में सरलता से ढाल लेता > है, अतएव अंग्रेजी की शिक्षा को मातृभाषा की शिक्षा से चार कदम पीछे रहना > चाहिये। शिक्षा का माध्यम मातृभाषा ही होना चाहिये। अंग्रेजी भाषा का शिक्षण > माध्यमिक स्तर से प्रारंभ करना चाहिये। कुछ विद्यार्थियों को शिक्षा अंग्रेजी > माध्यम में दी जा सकती है जोकि बारहवीं कक्षा के बाद ही प्रारंभ करना चाहिये > ताकि मातृभाषा की पर्याप्त निर्मिति तथा संस्कृति मस्तिष्क तथा हृदय में > समुचित रूप से बैठ जाए। > > भविष्य उसी का है जो विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी में सशक्त रहेगा, शेष देश > मात्र खुले बाजार होंगे ! विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी में सशक्त होने के लिये > उत्कृष्ट अनुसंधान तथा शोध आवश्यक हैं, जिसके लिये विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी > के ज्ञान पर अधिकार, तथा कल्पनाशीलता तथा सृजनशीलता आवश्यक हैं। कल्पना तथा > सृजन हृदय के वे संवेदनशील तथा अंतर्प्रज्ञा ह्यएम्ेतेिनल् ान्द न्तिुतेिन्हृ > गुण हैं जो बचपन के अनुभवों से मातृभाषा के साथ तथा गहरे ज्ञान अर्थात मात्र > याद किया हुआ नहीं वरन आत्मसात किये ज्ञान के साथ आते हैं, और जिस भाषा में > जीवन जिया जाता ह,ै उसी भाषा में वे प्रस्फुटित होते हैंऌ अतएव उसी भाषा में > आविष्कार आदि हो सकते हैं। इसलिये नौकरी के लिये अंग्रेजी में विज्ञान पढ़ने > वाले से विशेष आविष्कारों तथा खोजों की आशा नहीं की जा सकती, आखिर इज़राएल जो > कि हमारे देश का दसवां हिस्सा भी नहीं है, विज्ञान में हमसे दस गुने नोबेल > पुरस्कार ले जाता है।वह भी तब कि जब यहूदी भाषा 1948 के पहले किसी भी देश की > भाषा नहीं थी ! > > यदि हम चाहते हैं कि इस देश का और हमारे बच्चों का इस देश में, तथा में विश्व > में सम्मान बढ़े तब हमें, अपने बच्चों को विज्ञान की शिक्षा मातृभाषा में ही > देना है।यह भी एक भ्रम है कि भारतीय भाषाओं में विज्ञान की शिक्षा नहीं दी जा > सकती।इस समय हिन्दी में विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी के 5 लाख से अधिक शब्द बन > चुके हैं, और बनते जा रहे हैं।संस्कृत जैसी विश्व में समृद्धतम भाषा की > पुत्रियों को और तमिल को भी वैज्ञानिक शब्दाावली की कोई कठिनाई नहीं हो > सकती।बस राजनैतिक तथा ‘ब्यूरोक्रैटिक’ इच्छाशक्ति की आवश्यकता है। अब हिन्दी > में केन्द्रीय सेवाओं आदि की परीक्षाएं दी जा सकती हैं।यह भी एक भम है कि > अंग्रेजी गई तो देश विखंडित हो जाएगा।भारतीय संस्कृति इस देश को एकता प्रदान > करती है, सभी भारतीय भाषाओं में वही संस्कृति है।एक भारतीय भाषा के जानने वाले > को अन्य भारतीय भाषा सीखने में विदेशी भाषाओं को सीखने की अपेक्षा कहीं अधिक > सरलता होगी।भाषाओं के सीखने के सम्बन्ध में एक महत्वपूर्ण तथ्य की तरफ ध्यान > नहीं दिया जा रहा है। प्रत्येक व्यक्ति की योग्यताएं भिन्न क्षेत्रों में > भिन्न होती हैंÊ कोई गणित सरलता पूर्वक सीख लेता है तो कोई भाषाÊ और कोई > विज्ञानÊ तो कोई कलाÊ बस मातृभाषा का ज्ञान ही आवश्यक होता है।अंग्रेजी को > अेिनवार्य सा बना देने से वह बालक जो विदेशी भाषा सीखने में निपुण नहीं है > किन्तु गणित या विज्ञान या कला या अर्थशास्त्र या इतिहास आदि सीखने में निपुण > हो सकता हैÊ उसकी शिक्षा अंग्रेजी में कमजोर होने से अधूरी सी रह जाएगी ! > > वैसे भी यदि बच्चे में कल्पना शीलता तथा सृजन शक्ति है तब वह न केवल अच्छी > अंग्रेजी सीख लेगा वरन जीवन में अवश्य कुछ ऐसा भी करेगा जिससे हमें गर्व महसूस > होगाÊ और हमारे साथ हमारा समाज भी सुखी होगा! इस कथन की पुष्टि का सबसे अच्छा > उदाहरण तो सुभाष चंद्र बोस का है।उनके पिता ने उन्हें अंग्रेजी माध्यम की शाला > में भरती करवाया था।कुछ ही दिनों में सुभाष ने स्वयं ही अपना प्रवेश बांग्ला > भाषा के माध्यम वाली शाला में करवा लिया। यह बांग्ला भाषा में शिक्षित सुभाष न > केवल आई सी एस की परीक्षा में उत्तीर्ण हुआ वरन एक अनोखा क्रान्तिकारी भी बना। > और मानव तभी श्रेष्ठ बन सकता है जब वह अपनी संस्कृति तथा भाषा में जीवन जीता > है। मातृभाषा तथा भारतीय संस्कृति ही हमें सुखी मानव बना सकती है। > > On Oct 5, 2017 11:13 AM, "Shreenivas Naik" <shreenivasnaik.hindi.vogga@ > gmail.com> wrote: > >> मातृभाषा में शिक्षा >> >> लेखक - प्रभाकर चौबे । >> >> प्रतिवर्ष 21 फरवरी को अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाया जाता है। दुनिया >> के और देशों में मातृभाषा की क्या स्थिति है, मातृभाषा के संरक्षण, उसकी >> समृध्दि के लिए कहां क्या हो रहा है, यह तो दुनिया भर में घूमने वाले बेहतर >> बता सकते हैं। हमारे देश में मातृभाषा को किस तरह जबान से, चलन से, गायब कर >> अंग्रेजी को मातृभाषा बना दिया जाए, इसकी पूरजोर कोशिश की जा रही है। सरकारों >> से लेकर (हर पार्टी की सरकार) कार्पोरेट और कार्पोरेट-हित-साधक अखबार, उसके >> प्रवक्ता बनकर लिखने वाले सब इस जुगत में हैं कि मातृभाषा शब्द ही मानस से, >> बुध्दि से बाहर हो जाए। पूछेंगे तो रटा रटाया और हर काम की तरह यहां भी भ्रम >> में डालने वाला उत्तर मिल जाएगा कि मातृभाषा के विकास में हमारी सरकार भरपूर >> मदद कर रही है। लेकिन एकदम उल्टा हो रहा है। हम इस झूठ, फरेब पाखंडकाल में >> अपनी ही वस्तुएं नष्ट होते देख रहे हैं। सरकार की कथनी और करनी में इतनी चौड़ी >> खाई इससे पहले कभी नहीं रही। >> >> शिक्षा में इस बात को लेकर बहस होती है कि प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में ही >> दी जाए। तमाम बाल मनोवैज्ञानिकों, शिक्षाविदों, विद्वानों की गुहार को दरकिनार >> कर सरकारों ने कक्षा एक से अंग्रेजी पढ़ाना शुरु कर दिया। यह सिध्द हो चुका है >> कि मातृभाषा में शिक्षा बालक के उन्मुक्त विकास में ज्यादा कारगर होती है। >> अलग-अलग आर्थिक परिवेश के बालकों में विषय को ग्रहण करने की क्षमता समान नहीं >> होती। अंग्रेजी में पढ़ाए जाने पर और कठिनाई होती है। जिनका पूरा परिवेश ही >> अंग्रेजी भाषामय हो, ऐसे परिवार देश में कम ही है। मातृभाषा के माध्यम से जब >> पढाया जाता है तो बालकों के चेहरे उत्फुल्लित दिखाई देते हैं। एक तो अंग्रेजी >> सीखनी पड़ती है-वह पड़ी हुई नहीं मिल जाती। लेकिन सरकारों ने ठान लिया है कि >> बच्चों को अंग्रेजी के माध्यम से ही पढ़ाना है। भाषा सीखना अच्छी बात है और >> गुणकारी भी है। भाषा हमें एक नये संसार में प्रवेश कराती है। लेकिन मातृभाषा >> की उपेक्षा कर शिक्षा के माध्यम से उसे हटाकर जिस तरह के भाषा-संस्कार डाले जा >> रहे हैं, वह खतरनाक है। बालक न अंग्रेजी जान पा रहा है न मातृभाषा। एक खिचड़ी >> भाषा वह भी अधजली का संस्कार मिल रहा है। >> >> प्राय: हर पालक की शिकायत है कि उसका बच्चा छत्तीस नहीं समझता थर्टीसिक्स >> बोलो तब समझता है। उनयासी कहो तो पूछता है- यह क्या होता है। सेवन्टी नाइन कहो >> तब कहेगा तो ऐसा बोलो न। किसी भाषा का कोई शब्द जो पूरा अर्थ दे, अपनी भाषा >> में लेना गलत नहीं है। दुनिया की हरभाषा इसी तरह ग्रहण कर समृध्द होती चली है। >> हिन्दी में उर्दू, फारसी, संस्कृत सहित लोकभाषाओं के ढेरों शब्द हैं। अपनी इस >> लम्बी यात्रा में हिन्दी ने बाहर से खूब ग्रहण किया है। अंग्रेजी के भी ढेरों >> शब्द हैं। मोटर, रेलगाड़ी, रोड, टाईम शब्द हिन्दी के हो गए हैं। काफी समय हो >> गया। पिछली पीढ़ी पढ़ने के लिए अपना गांव छोड़ शहर में आई तो बाल बनवाने के >> लिए उसका परिचय हेयर कटिंग सेलून से हुआ और वह बाल बनवाने नहीं, कटिंग करवाने >> जाता। इन सबसे हिन्दी समृध्द हुई है। आज मोबाइल के साथ 'मिस कॉल' आया और >> गांव-गांव में रच बस गया। एक ठन मिस काल मार देबे- आम अभिव्यक्ति है। ई-मेल, >> इंटरनेट, कम्प्यूटर, लैपटॉप, फेसबुक आदि शब्द हिन्दी में चल निकले। इनका >> हिन्दी में अनुवाद करना हास्यास्प्रद होना है। यह भी विचार करना चाहिए कि किसी >> और भाषा से शब्द लेना एक बात है, लेकिन खिचड़ी वाक्य बनाना निरी मूर्खता है। >> दिक्कत यह है कि हमारे हिन्दी के कुछ समाचार पत्र ऐसी भाषा लिखने लगे हैं जो >> हास्य एपिसोड में तो काम आ सकती है, भाषा की गम्भीरता का मजाक बनाती है। ऐसे >> अखबारों ने कार्पोरेट होने का भ्रम पाल रखा है। >> >> आज ऐसे लोग पूरा भाषा-संस्कार भ्रष्ट कर रहे हैं। शब्द लेना ठीक, लेकिन >> हमारी भाषा के सर्वनाम, संज्ञा, क्रिया और तो और पूरा वाक्य विन्यास का >> सत्यानाश करने में तुल गए हैं। स्टुडेंट्स ने फेस्टीवल इन्जाय किया यह कैसी >> भाषा है। लिखित और बोलने के वाक्य में फर्क होता है। दरअसल न तो इन्हें >> मातृभाषा आती न अंग्रेजी। बहुत पहले जब अंग्रेज आए तो उनके नौकर जो भाषा बोलते >> उसे बटलर भाषा कहा जाता। अगर समाज में कोई ऐसी भाषा बोलता तो उसका मजाक उड़ाया >> जाता कि क्या बटलर भाषा बोल रहे हो। अगर हम हिन्दी की ही बात करें तो >> कार्पोरेट उसके व्यावसायिक उपयोगिता समझता है। हिन्दी बाजार की, धंधे की >> विज्ञापन की भाषा के रूप में कार्पोरेट को स्वीकार है। केन्द्र सरकार ने अपने >> कार्यालयों में हिन्दी में कामकाज को बढ़ावा देने का उपक्रम किया है। हर साल >> 14 सितम्बर को हिन्दी दिवस मनाया जाता है। लेकिन कार्पोरेट में हिन्दी का >> कामकाज के लिए कोई जगह नहीं है। हिन्दी उनके उत्पाद के व्यापार के लिए >> स्वीकार्य है। अंग्रेजी माध्यमों के विद्यालयों में जिस तरह अंग्रेजी की >> शिक्षा दी जा रही है वह केवल सेल्समैन पैदा करने के काम आ रही है। पुराने >> मेट्रिक पास अच्छी अंग्रेजी लिखा करते थे। ऊंची से ऊंची नौकरी पाने के लिए, >> ज्ञान अर्जित करने के लिए अंग्रेजी सीखना, अंग्रेजी में निष्णात होना बहुत >> अच्छी बात है, जरूरी भी है। लेकिन मातृभाषा की कीमत पर अंग्रेजी नहीं सीखी जा >> सकती ऐसा करने पर आधा तीतर आधा बटेर की स्थिति होगी। >> >> अंग्रेजी माध्यम के कुछ विद्यालयों में विद्यालय परिसर में हिन्दी या >> मातृभाषा में बात करते पाए जाने पर दंडित किया जाता है। कुछ विद्यालय तो एकदम >> आगे हैं, वे माता-पिता की शैक्षणिक योग्यता को बच्चों के प्रवेश का आधार बनाते >> हैं। बहरहाल एक बड़ा वर्ग मातृभाषा की उपयोगिता समझता है। जालंधर की एक खबर >> छपी है। वहां तमाम सरकारी स्कूलों और अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों ने सामूहिक >> रूप से 21 फरवरी को मातृभाषा दिवस मनाया। बच्चों ने, विद्यालय समितियों ने एक >> स्वर से पंजाबी बोलने पर जोर दिया। इनमें कुछ-कुछ ऐसे विद्यालय भी शामिल हुए >> जिनके विद्यालयों में पंजाबी बोलना प्रतिबंधित था। आज सबने मातृभाषा का महत्व >> समझा। लेकिन अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर और किसी राज्य में कोई कार्यक्रम >> हुआ ऐसा पढ़ने में नहीं आया। दरअसल शिक्षा का अधिकार का सवाल मातृभाषा में >> शिक्षा के साथ जुड़ा है। अपनी भाषा में शिक्षा प्राप्त करना बच्चे का अधिकार >> है, उस पर दूसरी भाषा लाद देना उसके स्वाभाविक विकास में बाधा डालना भी है। >> > -- > 1. Webpage for this HindiSTF is : https://groups.google.com/d/ > forum/hindistf > 2. For doubts on Ubuntu and other public software, visit > http://karnatakaeducation.org.in/KOER/en/index.php/ > Frequently_Asked_Questions > 3. If a teacher wants to join STF, visit http://karnatakaeducation.org. > in/KOER/en/index.php/Become_a_STF_groups_member > > ----------- > 1.ವಿಷಯ ಶಿಕ್ಷಕರ ವೇದಿಕೆಗೆ ಶಿಕ್ಷಕರನ್ನು ಸೇರಿಸಲು ಈ ಅರ್ಜಿಯನ್ನು ತುಂಬಿರಿ. > - https://docs.google.com/forms/d/1Iv5fotalJsERorsuN5v5yHGuKrmpF > XStxBwQSYXNbzI/viewform > 2. ಇಮೇಲ್ ಕಳುಹಿಸುವಾಗ ಗಮನಿಸಬೇಕಾದ ಕೆಲವು ಮಾರ್ಗಸೂಚಿಗಳನ್ನು ಇಲ್ಲಿ ನೋಡಿ. > -http://karnatakaeducation.org.in/KOER/index.php/ವಿಷಯಶಿಕ್ > ಷಕರವೇದಿಕೆ_ಸದಸ್ಯರ_ಇಮೇಲ್_ಮಾರ್ಗಸೂಚಿ > 3. ಐ.ಸಿ.ಟಿ ಸಾಕ್ಷರತೆ ಬಗೆಗೆ ಯಾವುದೇ ರೀತಿಯ ಪ್ರಶ್ನೆಗಳಿದ್ದಲ್ಲಿ ಈ ಪುಟಕ್ಕೆ ಭೇಟಿ > ನೀಡಿ - > http://karnatakaeducation.org.in/KOER/en/index.php/Portal:ICT_Literacy > 4.ನೀವು ಸಾರ್ವಜನಿಕ ತಂತ್ರಾಂಶ ಬಳಸುತ್ತಿದ್ದೀರಾ ? ಸಾರ್ವಜನಿಕ ತಂತ್ರಾಂಶದ ಬಗ್ಗೆ > ತಿಳಿಯಲು -http://karnatakaeducation.org.in/KOER/en/index.php/ > Public_Software > ----------- > --- > You received this message because you are subscribed to the Google Groups > "HindiSTF" group. > To unsubscribe from this group and stop receiving emails from it, send an > email to [email protected]. > To post to this group, send email to [email protected]. > For more options, visit https://groups.google.com/d/optout. > -- 1. 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