*क्या मैं अंदर आ सकती हूं **, **भगवन्*

*आराधनास्थलों में प्रवेश के लिए महिलाओं का संघर्ष*

*-**राम पुनियानी*



यह अजीब संयोग है कि इन दिनों मुसलमान और हिन्दू समुदायों की महिलाओं को एक ही
मुद्दे पर संघर्ष करना पड़ रहा है-आराधनास्थलों में प्रवेश के मुद्दे पर। जहां
‘भूमाता बिग्रेड‘ की महिलाएं, शनि शिगनापुर (अहमदनगर, महाराष्ट्र) मंदिर में
प्रवेश का अधिकार पाने के लिए संर्घषरत हैं वहीं मुंबई में हाजी अली की दरगाह
तक फिर से पहुंच पाने के लिए महिलाएं कानूनी लड़ाई लड़ रही हैं। सबरीमला मंदिर
में महिलाओं के प्रवेश का मसला तो गरमाया हुआ है ही। अनुकरणनीय साहस प्रदर्शित
करते हुए हाल में बड़ी संख्या में महिलाएं कई बसों में शनि शिगनापुर मंदिर
पहुंची परंतु उन्हें मंदिर में प्रवेश नहीं करने दिया गया। पुलिस ने उन्हें
रोकने के लिए बल प्रयोग किया।

शनि शिगनापुर में पुरूषों को तो चबूतरे पर चढ़ने का अधिकार है परंतु महिलाओं
के लिए इसकी मनाही है क्योंकि ऐसा कहा जाता है कि चबूतरे पर चढ़ने वाली
महिलाओं को शनि महाराज की बुरी नजर लग जाएगी। इस तरह यह दावा किया जाता है कि
महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध के पीछे आध्यात्मिक कारण हैं। दक्षिणपंथी दैनिक
'सनातन प्रभात' ने लिखा कि हिन्दू परंपराओं की रक्षा के लिए महिलाओं के आंदोलन
को रोका जाना चाहिए। आरएसएस के मुखपत्र 'आर्गनाईजर' ने मंदिर के गर्भगृह में
महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध को उचित ठहराया। भूमाता ब्रिग्रेड की तृप्ति
देसाई के नेतृत्व में चल रहे आंदोलन पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए
आध्यात्मिक गुरू श्री  श्री रविशंकर ने महिलाओं के संगठनों और मंदिर के
ट्रस्टियों के बीच मध्यस्थता करने की पहल की। आरएसएस के मुखपत्र ‘आर्गनाईजर‘ की
यह राय है कि वर्तमान में लागू किसी भी नियम को बदलने के पूर्व, संबंधित
धर्मस्थलों की परंपरा और प्रतिष्ठा का संरक्षण सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

सबरीमला के बारे में तर्क यह है कि मंदिर के अधिष्ठाता देव ब्रम्हचारी हैं और
प्रजनन योग्य आयु समूह की महिलाओं से उनका ध्यान बंटेगा। हम सबको याद है कि
कुछ वर्षों पहले एक महिला आईएएस अधिकारी, जो अपनी आधिकारिक हैसियत से मंदिर की
वार्षिक तीर्थयात्रा के लिए इंतजामात का निरीक्षण करने पहुंची थी, को भी मंदिर
में नहीं घुसने दिया गया था। मुंबई की हाजी अली दरगाह के मामले में भारतीय
मुस्लिम महिला आंदोलन नामक संगठन ने हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर कर यह मांग
की है कि वहां महिलाओं के प्रवेश के अधिकार को बहाल किया जाए। दरगाह में
महिलाओं का प्रवेश सन् 2012 में प्रतिबंधित कर दिया गया था। महिला समूहों ने
संविधान के विभिन्न प्रावधानों को उद्धत किया है जो लिंग के आधार पर किसी भी
प्रकार के भेदभाव का निषेध करते हैं। दरगाह के ट्रस्टियों का यह कहना है कि यह
प्रतिबंध महिलाओं की सुरक्षा की दृष्टि से लगाया गया है। यह तर्क निहायत
बेहूदा है। उसी तरह, सबरीमला के बारे में पहले यह तर्क दिया जाता था कि मंदिर
तक पहुंचने का रास्ता दुर्गम है और महिलाओं के लिए उसे तय करना मुश्किल होगा।
बाद में देवस्वम् बोर्ड त्रावणकोर ने यह स्पष्टीकरण दिया कि महिलाओं का प्रवेश
इसलिए प्रतिबंधित है क्योंकि भगवान अय्यपा ब्रम्हचारी हैं। मंदिर के संचालकों
का कहना था कि प्रजनन योग्य आयु की महिलाओं की उपस्थिति से ब्रम्हचारी भगवान
का मन भटकेगा।

मस्जिदों में प्रवेश के मामले में महिलाओं की स्थिति अलग-अलग देशों में
अलग-अलग है। इस संदर्भ में दक्षिण एशिया के देश सबसे खराब और तुर्की आदि सबसे
बेहतर हैं। हिन्दू मंदिरों में भी एक से नियम नहीं हैं। आराधनास्थलों में
महिलाओं के प्रवेश को प्रतिबंधित या सीमित करने के लिए कई बहाने किए जाते हैं।
कई देशों में कानूनी तौर पर महिलाओं और पुरूषों को समान दर्जा प्राप्त है
परंतु परंपरा के नाम पर इन आराधनास्थलों के संचालकगण महिलाओं को पूर्ण पहुंच
देने से बचते आए हैं। आराधनास्थलों में पितृसत्तात्मकता का बोलबाला है।

चर्चों के मामले में स्थिति कुछ अलग है। वहां महिलाओं के प्रवेश पर किसी
प्रकार का कोई प्रतिबंध नहीं है परंतु महिलाओं को पादरियों के पदक्रम में उच्च
स्थान नहीं दिया जाता। उसी तरह, हिन्दू मंदिरों और मुस्लिम मस्जिदों में
महिलाएं पंडित व मौलवी नहीं होतीं। अगर एकाध जगह ऐसा है भी तो वह अपवादस्वरूप
ही है।

हमारा संविधान महिलाओं और पुरूषों की समानता की गारंटी देता है। परंतु हमारे
कानून शायद आराधनास्थलों पर लागू नहीं होते, जिनके कर्ताधर्ता अक्सर दकियानूसी
होते हैं। सामान्यतः, भारत में आराधनास्थलों के संचालकमंडलों में महिलाओं को
कोई जगह नहीं मिलती। हिन्दुओं के मामले में जाति एक अन्य कारक है। इसमें कोई
संदेह नहीं कि व्यावहारिक तौर पर मुसलमानों और ईसाईयों में भी जातियां हैं
परंतु इन धर्मों के आराधनास्थलों के दरवाजे सभी के लिए खुले हैं। इसके
विपरीत, बाबा
साहेब आम्बेडकर को दलितों को मंदिरों में प्रवेश दिलवाने के लिए कालाराम मंदिर
आंदोलन चलाना पड़ा था और अंततः वे इतने निराश हो गए कि उन्होंने हिन्दू धर्म
ही त्याग दिया। उनका कहना था कि हिन्दू धर्म, ब्राम्हणवादी धर्मशास्त्र पर
आधारित है व मूलतः पदानुक्रमित है। सच तो यह है कि अधिकांश धर्मों के सांगठनिक
ढांचे में पदानुक्रम आम है।

अगर हम संपूर्ण दक्षिण एशिया की बात करें तो मस्जिदों, दरगाहों और मंदिरों में
महिलाओं के मामले में कई कठोर नियम हैं। इन्हें परंपरा के नाम पर थोपा जाता
है। यद्यपि विभिन्न धर्मों में इस मामले में कुछ अंतर हैं परंतु जहां तक
महिलाओं के साथ व्यवहार का प्रश्न है, सभी धर्म उनके साथ भेदभाव करते हैं। इस
भेदभाव की गहनता इस बात पर निर्भर करती है कि संबंधित राष्ट्र या क्षेत्र
कितना धर्मनिरपेक्ष है। यहां धर्मनिरपेक्षता से अर्थ है जमींदारों और पुरोहित
वर्ग के चंगुल से मुक्ति। यद्यपि यह सभी के बारे में सही नहीं है परंतु समाज
का एक बड़ा वर्ग महिलाओं को पुरूषों से कमतर और पुरूषों की संपत्ति मानता है।
इस दृष्टि से महिलाओं द्वारा आराधनास्थलों में प्रवेश का अधिकार हासिल करने के
लिए चलाए जा रहे आंदोलन स्वागतयोग्य हैं।
लैंगिक समानता की ओर महिलाओं की यात्रा को हमेशा दकियानूसी तत्वों के कड़े
विरोध का सामना करना पड़ा है। दकियानूसी तत्व, जाति और लिंग के सामंती पदक्रम
को बनाए रखना चाहते हैं। चाहे वह बीसवीं सदी की शुरूआत का अमरीका का ईसाई
कट्टरवाद हो या अफगानिस्तान, ईरान या पाकिस्तान का इस्लामिक कट्टरवाद या भारत
में हिन्दू साम्प्रदायिकता के बढ़ते कदम  -  ये सभी महिलाओं को पराधीन रखना
चाहते हैं। हमें आशा है कि इन समस्याओं और रोड़ों के बावजूद, लैंगिक समानता की
ओर महिलाओं की यह यात्रा तब तक जारी रहेगी जब  तक कि उन्हें पुरूषों के समकक्ष
दर्जा और अधिकार हासिल न हो जाएं। *(मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश
हरदेनिया) *

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