*समकालीन वैश्विक संकट के पीछे धर्म है या राजनीति**?*

*-**राम पुनियानी*

वैश्विक स्तर पर ‘इस्लामिक आतंकवाद’ शब्द बहुप्रचलित हो गया है और इस्लाम के
आंतरिक ‘संकट’ की कई तरह से विवेचना की जा रही है। कुछ लोगों की राय है कि
इस्लाम एक बहुत बड़े संकट के दौर से गुज़र रहा है और इस संकट से निपटने के लिए
ज़रूरी कदम नहीं उठाए जा रहे हैं। इतिहास गवाह है कि इसके पूर्व इस्लाम एक बहुत
बड़े संकट से उबर चुका है। वह था क्रूसेड्स। वह एक बाहरी संकट था। इस्लाम का
वर्तमान संकट उसका आंतरिक संकट है, जिसमें मुसलमान एक-दूसरे को ही मार रहे
हैं। यहां तक कि एक ही पंथ के मुसलमान भी अपने साथियों का खून बहा रहे हैं। यह
संकट पिछले कुछ दशकों में इस्लाम पर हावी हुआ है। कुछ लोगों का मानना है कि
मुसलमान, स्वयं इस्लाम के सबसे बड़े शत्रु हैं और इस्लाम अब अपने ही अनुयायियों
को निगल रहा है। कुछ लोगों ने मुस्लिम समाज की वर्तमान स्थिति के संदर्भ
में ‘अच्छा
मुसलमान, बुरा मुसलमान’ शब्द ईजाद कर लिया है। ऐसा कहा जा रहा है कि इस्लाम पर
अतिवादियों ने कब्ज़ा जमा लिया है। सुन्नी इस्लाम अतिवादी हो गया है और शिया
इस्लाम का खोमैनीकरण हो गया है। यह तर्क भी दिया जा रहा है कि इस्लाम में अंदर
से सुधार लाए जाने की ज़रूरत है।

यह तर्क मध्यमार्गी मुसलमानों की व्यथा को प्रदर्शित करता है, जो अलकायदा से
शुरू होकर आईएस और उसके कई अवतारों में फैल गया है। सच यह है कि यह विवेचना
उथली है। ज़रूरत इस बात पर विचार करने की है कि इस्लाम से आतंकवाद के जुड़ाव की
यह प्रक्रिया पिछले कुछ दशकों में ही क्यों शुरू हुई। यह मानना अनुचित होगा कि
केवल इस्लाम के मानने वाले ही हिंसा करते हैं। साध्वी प्रज्ञा और गोडसे जैसे
हिन्दू, असिन विराथू जैसे बौद्ध और एण्डर्स बर्लिन ब्रेविक जैसे ईसाई भी आतंकी
हमलों में शामिल रहे हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि ऊपर से देखने पर ऐसा लगता
है कि आतंकवाद से जुड़े अधिकांश व्यक्ति मुसलमान हैं परंतु हमें यह समझना होगा
कि कबजब राजनीति भी धर्म का भेस धर लेती है। और यह बात सभी धर्मों के बारे में
सही है।

वर्तमान समय की बात करने से पहले हमें धर्मों की नैतिकता और उनके आदर्शों और
धर्म के पहचान से जुड़े पहलुओं के बीच अंतर करना होगा। पहचान से जुड़े पहलुओं का
सामाजिक दृष्टि से वर्चस्वशाली समूह, समाज पर अपना दबदबा कायम करने के लिए
करते हैं। अधिकांश धर्मों के पुरोहित वर्ग ने सामाजिक दृष्टि से वर्चस्वशाली
समूहों के साथ मिलकर सामाजिक ऊँचनीच को धार्मिक पवित्रता का चोला पहनाया। चर्च
और मौलाना दोनों सामंती व्यवस्था के समर्थक रहे हैं और ब्राह्मणों ने जाति और
लिंग पर आधारित पदक्रम को समाज पर लादा। यह सब समाज के श्रेष्ठी वर्ग द्वारा
अपना राज कायम करने की कवायद का हिस्सा था।

हमें यह भी समझना होगा कि अलग-अलग समय पर विभिन्न राजाओं ने जिहाद, क्रूसेड्स
और धर्मयुद्ध जैसे शब्दों का इस्तेमाल अपने साम्राज्यों को विस्तार देने के
लिए किया। धर्म तो मात्र एक बहाना था, असल में वे सत्ता के भूखे थे। सभी
धर्मों के राजाओं के लक्ष्य एक से थे। उनका उद्देश्य अपने धर्म का प्रचार करना
नहीं वरन धर्म के नाम पर अपनी सत्ता को मज़बूती और अपने साम्राज्य को विस्तार
देना था। ऐसे में हम केवल जिहाद की बात कैसे कर सकते हैं? हम अन्य धर्मों के
शासकों द्वारा धर्म के दुरूपयोग को कैसे भुला सकते हैं?

जहां तक भारत का संबंध है, 19वीं सदी में भारतीय राष्ट्रवाद के उदय की
प्रतिक्रिया स्वरूप अस्त होते ज़मींदारों और सामंतों के वर्ग ने अपनी उच्च
सामाजिक स्थिति को बनाए रखने और जातिगत व लैंगिक पदक्रम को संरक्षित रखने के
लिए धर्म की भाषा बोलनी शुरू कर दी। उदित होते राष्ट्रीय आंदोलन का विरोध करने
के लिए इस्लाम के नाम पर राजनीति करने के लिए मुस्लिम लीग जैसी संस्थाएं बनीं
तो हिन्दू धर्म के नाम पर सत्ता का खेल खेलने के लिए हिन्दू महासभा और आरएसएस
का गठन हुआ। एक ओर थे मौलाना अबुल कलाम आज़ाद और गांधी जैसे लोग, जो भारतीय
राष्ट्रवाद के पैरोकार थे तो दूसरी ओर थे जिन्ना, सावरकर, गोलवलकर और गोडसे
जैसे व्यक्ति जो धार्मिक राष्ट्रवाद के हामी थे। गोडसे ने अपने समय के महानतम
हिन्दू की हत्या की और उसके अनुसार ऐसा उसने ‘हिन्दू समाज’ की खातिर किया।
बौद्ध धर्म के भेस में ऐसा ही राष्ट्रवाद म्यांमार और श्रीलंका में भी फलफूल
रहा है।

पिछले कुछ दशकों में अमरीका, अपने साम्राज्यवादी लक्ष्यों को पूरा करने के लिए
इस्लाम का खलनायकीकरण करता आ रहा है। अमरीका का असली उद्देश्य कच्चे तेल के
कुंओं पर कब्ज़ा करना है। अपनी इसी लिप्सा के चलते अमरीका ने इस्लाम के अतिवादी
संस्करण को प्रोत्साहन दिया। यह सर्वज्ञात है कि अमरीका ने पाकिस्तान के
मदरसों में युवकों को इस्लाम के कट्टरवादी सऊदी संस्करण में प्रशिक्षित किया
और उन्हें करोड़ों डॉलर और सैंकड़ों टन हथियार मुहैय्या करवाए। अमरीका तब इन
युवकों के ज़रिए अफगानिस्तान से सोवियत संघ को बाहर करना चाहता था। बाद में ये
लोग अमरीका के लिए ही भस्मासुर साबित हुए। इसके पहले अमरीका ने ईरान की
प्रजातांत्रिक ढंग से निर्वाचित मोसाडिक सरकार को अपदस्थ किया था। इसके नतीजे
में अंततः अयातुल्ला खोमैनी सत्ता में आए और इस्लामिक कट्टरता का बोलबाला बढ़ा।
खोमैनी के सत्तासीन होने के बाद पश्चिमी मीडिया ने यह कहा था कि अब इस्लाम, दुनिया
के लिए एक ‘नया खतरा’ बन गया है और 9/11 के आतंकी हमले के बाद, इसी
मीडिया ने ‘इस्लामिक
आंतकवाद’ शब्द गढ़ा।

ऐसा बताया जा रहा है मानो आतंकवाद के कैंसर का कारण इस्लाम है। परंतु गहराई से
देखने पर हमें यह समझ आएगा कि हर धर्म में कई धाराएं होती हैं। कुछ प्रेम का
प्रचार करती हैं तो कुछ नफरत फैलाती हैं। कबीर और निज़ामुद्दीन औलिया जैसे लोग
गरीबों के साथ खड़े हुए और उन्होंने सत्ताधारी पुरोहित वर्ग का विरोध किया।
पुरोहित वर्ग, धार्मिक पहचान का इस्तेमाल अपनी सत्ता को बनाए रखने के लिए करता
आया है। गांधी भी हिन्दू थे और गोडसे भी। किसी धर्म की कौनसी धारा मज़बूत होती
है और कौनसी कमज़ोर, यह अक्सर तत्कालीन राजनैतिक शक्तियों और परिस्थितियों पर
निर्भर करता है।
यह सचमुच चिंता की बात है कि इस्लाम कई तरह की आंतरिक समस्याओं से जूझ रहा है
परंतु यदि इस्लाम के अतिवादी पंथ शक्तिशाली बन गए हैं तो इसका कारण धर्म है या
राजनीति। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि गांधी के लिए हिन्दू धर्म समावेशी था तो
गोडसे जैसों के लिए वह अन्यों से घृणा करना सिखाने वाला था। अतः, ज़रूरत इस बात
की है कि हम धर्म का लबादा ओढ़े उस राजनीति को पहचानें, जो अतिवाद को बढ़ावा दे
रही है और इस्लाम के मानवीय चेहरे को सामने नहीं आने दे रही है। हमारे समय में
भी मौलाना वहीदउद्दीन और असगर अली इंजीनियर जैसी शख्सियतें हुईं जिन्होंने
इस्लाम के मानवीय चेहरे को सामने रखा। परंतु सत्ता के समीकरणों के चलते, वे
हाशिए पर पटक दिए गए और आईएस जैसी संस्थाएं केन्द्र में आ गईं। अब समय आ गया
है कि हम यह समझें कि जो शक्तियां अतिवाद को प्रोत्साहन दे रही हैं वे दरअसल
तेल के संसाधनों पर कब्ज़ा करने के अपने लक्ष्य की प्राप्ति में संलग्न हैं।
धर्म का आतंकवाद से कोई लेनादेना नहीं है। *(मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण
अमरीश हरदेनिया) *

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