*12** जनवरी, 2017*

*‘**चुनाव प्रक्रिया एक धर्मनिरपेक्ष गतिविधि है**’*

*-**राम पुनियानी*

पिछले कुछ दशकों में धर्मनिरपेक्षता शब्द को बदनाम करने और उसके अर्थ को
तोड़ने-मरोड़ने के कई प्रयास हुए हैं। भारत के संदर्भ में धर्मनिरपेक्षता का
अर्थ है सभी धर्मों का बराबर सम्मान और इस सिद्धांत का कड़ाई से अनुपालन कि
राज्य की नीतियां किसी धर्म से प्रभावित या निर्देशित नहीं होंगी। यही भारतीय
संविधान का मूल स्वर भी है। शासक राजनीतिक दलों द्वारा धर्मनिरपेक्षता के
सिद्धांतों की गलत विवेचना के कारण साम्प्रदायिक तत्वों को धर्मनिरपेक्षता पर
ही प्रश्नचिन्ह लगाने का बहाना मिल गया है।

इस पृष्ठभूमि में, उच्चतम न्यायालय की सात सदस्यीय पीठ का यह निर्णय
स्वागतयोग्य व राहत पहुंचाने वाला है कि ‘‘चुनाव प्रक्रिया एक धर्मनिरपेक्ष
गतिविधि है’’। इस निर्णय से उन सभी लोगों को प्रसन्नता हुई है जो बहुवाद में
निहित न्याय के मूल्यों के हामी हैं। उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि भारत एक
धर्मनिरपेक्ष राज्य है और किसी भी धर्मनिरपेक्ष राज्य में चुनावी प्रक्रिया के
दौरान धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों की अवहेलना और उनका उल्लंघन नहीं होना
चाहिए। न्यायालय ने यह भी कहा कि राजनैतिक उद्देश्यों के लिए धर्म का दुरूपयोग,
जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 123 के अधीन भ्रष्ट आचरण है। न्यायालय ने यह
भी कहा कि चुनावी प्रक्रिया की पवित्रता और शुद्धता के संरक्षण की ज़िम्मेदारी
केवल चुनाव लड़ रहे उम्मीदवार की नहीं है। उसके एजेंटों का आचरण और उसका चुनावी
घोषणापत्र भी धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों के अनुरूप होना चाहिए।

निर्णय में यह भी कहा गया है कि चुने हुए जनप्रतिनिधि की सोच और आचरण दोनों
धर्मनिरपेक्ष होने चाहिए और यह भी कि धार्मिक अल्पसंख्यकों के हित में
सकारात्मक कार्यवाही, धर्मनिरपेक्ष आचरण का हिस्सा है। यह निर्णय न्याय के उन
मूल्यों के अनुरूप भी है जो धर्मनिरपेक्ष प्रजातंत्र की नींव होते हैं। इस
निर्णय ने भारतीय संविधान के निर्माताओं द्वारा प्रतिपादित धर्मनिरपेक्षता के
मूल्यों को मानो नवजीवन दिया है।

इस निर्णय का कई राजनीतिक दलों ने स्वागत किया है और इनमें वे दल भी शामिल हैं
जो धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों पर प्रश्नचिन्ह लगाते आए हैं और जिन्होंने
धार्मिक पहचान का इस्तेमाल अपनी ताकत में वृद्धि के लिए किया है। इस निर्णय ने
हमें वह रास्ता दिखाया है, जिस पर बहुवादी भारत को चलना चाहिए-एक ऐसे भारत को
जिसमें सभी की गरिमा और अधिकारों की रक्षा हो सके। इसके साथ ही, इस निर्णय को
लागू करने में आने वाली चुनौतियों का आंकलन करना भी ज़रूरी है।

यह निर्णय उन हस्तक्षेपकर्ताओं के प्रयासों से आया है जो उच्चतम न्यायालय से
यह मांग कर रहे थे कि वह 1995 के अपने कुख्यात ‘हिन्दुत्व निर्णय’ पर
पुनर्विचार करे। इस निर्णय में यह कहा गया था कि हिन्दू धर्म व हिन्दुत्व इतना
विविधवर्णी है कि उसे परिभाषित करना मुश्किल है और इसलिए वह ‘‘जीवन जीने का एक
तरीका है’’। यह निर्णय हिन्दू धर्म की प्रकृति के कारण इसके संबंध में व्याप्त
भ्रांतियों से उपजा था। हिन्दू धर्म का कोई पैगंबर नहीं है और इसमें कई
धार्मिक परंपराएं शामिल हैं, जिनमें से कुछ परस्पर विरोधाभासी हैं। परंतु इसके
बावजूद भी हिन्दू, धर्मशास्त्र और समाजशास्त्र की दृष्टि से एक विशिष्ट धर्म है,
जिसकी अपनी पवित्र पुस्तकें, कर्मकांड और देवी-देवता हैं। अदालत ने 1995 के
अपने निर्णय के इस महत्वपूर्ण पक्ष पर कोई राय व्यक्त नहीं की है। दो दशक से
भी ज्यादा पुराने निर्णय के इस पक्ष पर पुनर्विचार आवश्यक है क्योंकि करोड़ों
हिन्दू अपने धर्म को एक धर्म के रूप में ही देखते हैं जीवन जीने के तरीके के
रूप में नहीं।

इस मुद्दे पर कोई राय व्यक्त न कर उच्चतम न्यायालय ने सांप्रदायिक ताकतों को
यह छूट दे दी है कि वे हिन्दू धर्म और हिन्दुत्व के नाम पर वोट मांगते रहें और
जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के प्रावधानों के तहत सज़ा पाने से बचे रहें। इस
विसंगति के कारण सांप्रदायिक ताकतें चुनावी लाभ के लिए धर्म का दुरूपयोग करती
रहेंगी और कानून उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा। इसके अतिरिक्त, ‘धार्मिक पहचान’ का
इस्तेमाल हिंसा भड़काने और समाज को धर्म के आधार पर ध्रुवीकृत करने के लिए किया
जाता रहा है। चाहे मुद्दा राम मंदिर का हो या गोमांस का, उसके सांप्रदायिक
स्वरूप को हम नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते। पिछले लगभग तीन दशकों से इस तरह के
मुद्दों का उपयोग राजनैतिक लाभ के लिए किया जाता रहा है। अदालत ने इस तरह के
मुद्दों, जिनका इस्तेमाल धर्म के नाम पर लोगों को एकजुट करने के लिए किया जाता
रहा है, के बारे में कुछ नहीं कहा है। धार्मिक पहचान का राजनैतिक उपयोग,
धर्मनिरपेक्ष
मूल्यों के खिलाफ है। हमारे देश को इस तरह के भावनात्मक मुद्दों को राजनीति से
बचना होगा। जब तक यह नहीं होगा तब तक कुछ राजनैतिक दल धर्म के नाम पर वोट
मांगते रहेंगे।

हम सबको याद है कि सन 2014 के आम चुनाव के पहले नरेन्द्र मोदी ने मुंबई में
अपनी एक सभा में कहा था कि मैं एक हिन्दू परिवार में जन्मा था और मैं
राष्ट्रवादी हूं इसलिए मैं हिन्दू राष्ट्रवादी हूं। उनके भाषण के इस हिस्से की
बड़ी-बड़ी होर्डिंग पूरे मुंबई शहर में लगाई गई थीं। क्या यह भ्रष्ट आचरण नहीं है?
क्या अकबरूद्दीन ओवैसी और संघ परिवार के योगी आदित्यनाथ, प्रवीण तोगड़िया, साध्वी
निरंजन ज्योति और अन्यों के घृणा फैलाने वाले भाषण राजनीतिक लाभ पाने के लिए
धर्म के दुरूपयोग की सीमा में नहीं आते? क्या इस तरह के भाषणों को भ्रष्ट आचरण
नहीं माना जाना चाहिए? धर्म के आधार पर वोट मांगने के लिए धार्मिक प्रतीकों का
इस्तेमाल भी आम है। इनमें इस्लामिक और हिन्दू दोनों प्रतीक शामिल हैं। कुछ
उम्मीदवार अपने पोस्टरों पर हिन्दू देवी-देवताओं के चित्र छपवाते हैं तो कुछ
अपनी तुलना किसी देवी या देवता से करते हैं। इसे हम क्या कहेंगे? कुछ समय पहले,
उत्तरप्रदेश भाजपा के अध्यक्ष के.पी. मौर्य को एक पोस्टर में भगवान कृष्ण के
रूप में दिखाया गया था जो मुलायम सिंह यादव परिवार के कौरवों से मुकाबला कर
रहे हैं। अगर राजनीति को धर्मनिरपेक्ष होना चाहिए तो हम इस तरह के आचरण को
कैसे नज़रअंदाज़ कर सकते हैं।

दूसरी ओर, समाज के हाशिए पर पड़े वर्गों से जुड़े मुद्दे भी महत्वपूर्ण हैं। कुछ
वंचित और निर्धन समुदायों की मांगें धर्म और राजनीति से जुड़ी हो सकती हैं।
भारत में हमेशा से अलग-अलग कारकों से कुछ समुदायों का शोषण और दमन होता आया
है। इनमें आदिवासी, दलित और धार्मिक अल्पसंख्यक शामिल हैं। इन वर्गों की
बदहाली को रेखांकित करने वाली कई तथ्यात्मक रपटें उपलब्ध हैं, जिनमें सच्चर
समिति की रपट शामिल है। इन वर्गों की मांगों को पूरा करने को ‘‘सकारात्मक
कार्यवाही’’ की श्रेणी में रखा जाना चाहिए, जो संविधान के धर्मनिरपेक्ष
प्रजातांत्रिक चरित्र के अनुरूप है। इस तरह की मांगों पर किसी भी स्थिति में
धर्म या जाति का लेबिल चस्पा नहीं किया जाना चाहिए।

उच्चतम न्यायालय ने हमें रास्ता दिखाया है परंतु जब तक समाज में धर्मनिरपेक्ष
मूल्यों की पुनर्स्थापना नहीं होती तब तक हम सही अर्थों में न्याय और शांति की
स्थापना नहीं कर पाएंगे। *(मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)*

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