*‘ईश्वर के देश’ को ध्रुवीकृत करने की हिन्दुत्ववादी कोशिश*

*-राम पुनियानी*

कुछ समय पूर्व, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने केरल में दो सप्ताह की जन सुरक्षा
यात्रा निकाली। उद्देश्य था राज्य में आरएसएस कार्यकर्ताओं की हत्याओं के
प्रति देश का ध्यान आकर्षित करना। कई शीर्ष भाजपा नेताओं, जिनमें 12 केन्द्रीय
मंत्री और पांच मुख्यमंत्री शामिल थे, ने इस यात्रा में भागीदारी की। इनमें से
सबसे प्रमुख थे उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ। अमित शाह का आरोप
है कि केरल में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम), राजनीतिक हिंसा कर
रही है जिसमें आरएसएस के कार्यकर्ता मारे जा रहे हैं। उनका कहना है कि यह
जिहादी-लाल आतंकवाद है। केरल के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने केरल सरकार को
प्रशासन चलाने और जनता को चिकित्सकीय सुविधाएं उपलब्ध करवाने के संबंध में कुछ
सलाहें भी दे डालीं। यह आदित्यनाथ की बेशर्मी ही कही जा सकती है। हाल में उनके
ही क्षेत्र गोरखपुर में आक्सीजन की सप्लाई बाधित हो जाने के कारण एक अस्पताल
में बड़ी संख्या में बच्चों की मृत्यु हो गई थी। जहां तक आमजनों को मूलभूत
सुविधाएं उपलब्ध करवाने का प्रश्न है, केरल, देश के सबसे बेहतर राज्यों में से
एक है। उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री द्वारा ऐसे राज्य को बिन मांगी सलाह देना
हास्यास्पद ही कहा जा सकता है।

इस पूरे मामले में भाजपा जो बातें कह रही है वह उसकी राजनीति करने के तरीके की
द्योतक है। आंकड़ें बताते हैं कि पिछले 17 वर्षों में केरल में जो राजनीतिक
हत्याएं हुईं, उनमें मारे जाने वालों में से 85 सीपीएम के थे, 65 आरएसएस के और
11-11 मुस्लिम लीग और कांग्रेस के। केरल के कन्नूर इलाके में सीपीएम और आरएसएस
के बीच गहरी राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता है, जिसके चलते दोनो ही पक्ष एक दूसरे
के खिलाफ हिंसा करते रहे हैं। शाह ऐसा बताने का प्रयास कर रहे हैं मानो हिंसा
में केवल आरएसएस के कार्यकर्ता मारे जा रहे हैं जबकि वे अच्छी तरह से जानते
हैं कि मरने वालों में सीपीएम कार्यकर्ताओ की भी खासी संख्या है।

संघ परिवार ने देश भर में पहचान से जुड़े मुद्दों पर जो जुनून भड़काया है उसके
कारण जमकर खून-खराबा होता आ रहा है। पुराने मुद्दों को हम छोड़ भी दें तो भी,
केवल राममंदिर और पवित्र गाय के मुद्दों पर भड़की हिंसा में सैंकड़ों लोगो की
मौत हो चुकी है। संघ परिवार बड़ी धूर्तता से इस हिंसा के लिए पीड़ितों को ही
दोषी ठहरा रहा है। वह केवल चुनिंदा तथ्यों को प्रस्तुत करता है और भावनाएं
भड़का कर अपना उल्लू सीधा करता है।

मध्यप्रदेश में उसने कमाल मौला मस्जिद (भोजशाला) के मुद्दे पर शोर मचाया तो
कर्नाटक में बाबा बुधनगिरी की मज़ार को दत्तापीठ बताकर वहां साम्प्रदायिक तनाव
उत्पन्न किया। भावनात्मक मुद्दे उठाकर लोगों को भड़काने की कला में संघ परिवार
माहिर है। क्या उसका यह खेल केरल में सफल हो सकेगा?

केरल एक ऐसा राज्य है जहां तीनों प्रमुख धार्मिक समुदायों के सदस्यों की बड़ी
आबादी है। वहां हिन्दुओं, मुसलमानों और ईसाईयों तीनों की खासी जनसंख्या है।
भारत में ईसाई सबसे पहले केरल के मलाबार तट पर पहुंचे। सेंट थॉमस 52 ईस्वी में
केरल आए और उसके बाद से केरल में चर्चों का निर्माण शुरू हुआ। इसी तरह, वहां
सातवीं सदी से अरब देशों से व्यापारी आते रहे हैं। देश की पहली मस्ज़िद, जिसका
नाम चेरामन जुम्मा था, केरल में बनी थी। अमित शाह एक ऐसे राज्य के लोगों को
धार्मिक आधार पर विभाजित करने का प्रयास कर रहे हैं, जिसका सांप्रदायिक
सौहार्द का लंबा इतिहास है।

केरल समाज सुधार में भी देश के अन्य हिस्सों से आगे रहा है। समाज सुधारक
नारायण गुरू ने जाति-मुक्त समाज के निर्माण और सभी जातियों के लोगों को एक
समान दर्जा देने का अभियान चलाया था। उन्होंने वहां ऐसे मंदिर बनवाए जिनमें
सभी जातियों के लोगों को प्रवेश करने की इजाजत थी। नारायण गुरू ने ही पहली
धार्मिक संसद का आयोजन किया ताकि धार्मिक विभेदों से ऊपर उठकर मानवता को मज़बूत
किया जा सके। केरल की नम्बूदरीपाद के मुख्यमंत्रित्व वाली कम्युनिस्ट सरकार ने
वहां भू-सुधार किए, जिससे भूमिहीन कृषकों को बहुत लाभ हुआ। इन्हीं सब कारणों
से केरल आज सामाजिक विकास सूचकांकों के मामले में देश में प्रथम स्थान पर है।

भाजपा-आरएसएस लंबे समय से राज्य का सांप्रदायिकीकरण करने का प्रयास कर रहे
हैं। वे लव जिहाद के मुद्दे को ज़ोर शोर से उठाते रहे हैं। केरल में पुलिस
द्वारा की गई कई जांचों में यह सामने आया है कि लव जिहाद जैसी कोई चीज़ नहीं है
और हिन्दू व ईसाई महिलाओं को प्रेमजाल में फंसाकर उन्हें इस्लाम कुबूल करवाने
का कोई संगठित प्रयास नहीं हो रहा है। हां, अंतरधार्मिक विवाह होते हैं परंतु
उनके पीछे कोई षड़यंत्र नहीं होता। अमित शाह और उनकी टीम इस सांप्रदायिक सद्भाव
को छिन्नभिन्न कर देना चाहती है। वे चाहते हैं कि उन निर्दोष लड़कियों और लड़कों
को प्रताड़ित किया जाए जो अपने जीवनसाथी का चुनाव स्वयं करते हैं या करना चाहते
हैं।

अमित शाह न केवल विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच शत्रुता को बढ़ावा दे रहे हैं
वरन वे हिन्दू धर्म के ब्राह्मणवादी संस्करण का प्रचार-प्रसार भी कर रहे हैं।
केरल के सबसे बड़े त्यौहार ओणम के अवसर पर उन्होंने वहां ऐसे पोस्टर लगवाए
जिसमें ओणम को वामन जयंती बताते हुए केरलवासियों को बधाई दी गई थी। किंवदंती
यह है कि राजा महाबली को भगवान विष्णु के अवतार वामन ने धोखे से मारा था। ऐसा
कहा जाता है कि ओणम के दिन राजा महाबली अपनी प्रजा से मिलने आते हैं। यह भी
माना जाता है कि महाबली एक नीची जाति के व्यक्ति थे और वे सभी जातियों के
लोगों को समान दृष्टि से देखते थे।

भाजपा, देश के सभी क्षेत्रों में सम्प्रदायवाद और ब्राह्मणवाद को बढ़ावा दे रही
है। परंतु इस बात की बहुत कम संभावना है कि केरल जैसे राज्य में, जहां के लोग
अत्यंत जागरूक हैं, जहां सामाजिक और नागरिक सेवाओं की पर्याप्त उपलब्धता है और
जहां के लोग आपस में मिलजुल कर रहते आए हैं, वहां शाह की यह चाल कामयाब हो
सकेगी। वे केरल में हो रही हिंसा को लाल-जिहादी हिंसा बताकर एक तीर से दो
निशाने लगाना चाहते हैं। केरल में खासी मुस्लिम आबादी है और जिहादी शब्द के
उपयोग का उद्देश्य उसका दानवीकरण करना है। ऐसा लगता है कि केरल में भाजपा की
यह चाल कामयाब नहीं होगी और उसे मुंह की खानी पड़ेगी। यद्यपि केरल में आरएसएस
की मौजूदगी लंबे समय से है तथापि संघ की राजनीतिक संतान भाजपा वहां अपनी जड़े
नहीं जमा सकी है। राज्य विधानसभा में भाजपा का केवल एक सदस्य है। आने वाले समय
में भाजपा वहां चुनावों में किस हद तक सफलता प्राप्त करती है यह इस बात पर
निर्भर करेगा कि मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी और अन्य वामपंथी पार्टियां
भाजपा की कुत्सित चालों का कैसे मुकाबला करती हैं।
यह प्रसन्नता की बात है कि वामपंथी पार्टियों ने वहां जनजागृता यात्रा शुरू की
है। कांग्रेस (यूडीएफ) भी यात्रा निकालने पर विचार कर रही है। अब समय आ गया है
कि गैर-भाजपा दल इस तथ्य को समझें कि अगर उन्हें साम्प्रदायिक सद्भाव बनाए
रखना है तो उन्हें इसके लिए परस्पर समन्वय से काम करना होगा। *(अंग्रेजी से
हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया) *

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