27 मार्च, 2018

*मुस्लिम समुदाय में सुधार: समग्र दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत*



*-**राम पुनियानी*

हर्ष मंदर के लेख (द इंडियन एक्सप्रेस, मार्च 7, 2018) “सोनिया सेडली” और
रामचंद्र गुहा के उसके प्रतिउत्तर में इसी समाचारपत्र में प्रकशित आलेख “लिबरल्स
ओ” ने भारत में मुस्लिम समुदाय की स्थिति और उसमें सुधार की प्रक्रिया पर नए
सिरे से एक बहस शुरू कर दी है।  यद्यपि इस प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले कई
कारक हैं तथापि उन्हें मोटे तौर पर दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है
- एक, समुदाय के अन्दर और दूसरा, समुदाय के बाहर - और इन दोनों के सकारात्मक
और नकारात्मक दोनों प्रभाव परिलक्षित हो रहे हैं। इन दोनों के जटिल संयुक्त
प्रभाव से ही समय के साथ किसी भी समुदाय में परिवर्तन आते हैं। जहाँ मंदर का
फोकस मुस्लिम समुदाय पर पड़ने वाले बाहरी नकारात्मक प्रभावों पर है वहीं
रामचंद्र गुहा, समुदाय के भीतर के कारकों पर ध्यान केन्द्रित कर रहे हैं।

पिछले कुछ दशकों में मुस्लिम समुदाय में आंतरिक तौर पर जो कुछ हो रहा है, उसे
समझना इसलिए ज़रूरी है ताकि हम यह जान सकें कि हामिद दलवई और आरिफ मोहम्मद खान
जैसे सुधारक क्यों कुछ विशेष नहीं कर सके। समुदाय में सुधार की प्रक्रिया, मुख्यतः
उसमें व्याप्त असुरक्षा के भाव के कारण बाधित हो रही है। इस भाव के बढ़ने के दो
कारण हैं - पहला, राष्ट्रीय स्तर पर सांप्रदायिक हिंसा, जिसके कारण इस समुदाय
को जान-माल और रोज़गार का बहुत नुकसान हो रहा है। दूसरा, कई तरीकों से इस
समुदाय को आर्थिक दृष्टि से हाशिए पर धकेला जा रहा है। इन दोनों कारणों से यह
समुदाय दकियानूसी विचारों को गले लगा रहा है और रूढ़िवादी मौलानाओं का दबदबा
बढ़ता जा रहा है।

वैश्विक स्तर पर तेल के संसाधनों पर नियंत्रण की राजनीति के चलते, इस्लाम के
नाम पर आतंकवाद का उदय हुआ और उससे उभरा वैश्विक स्तर पर इस्लाम के प्रति भय
का भाव और मुसलमानों का दानवीकरण करने की प्रक्रिया। आज मुस्लिम पहचान को समाज
के लिए एक खतरे की तरह प्रस्तुत किया जा रहा है। इन दोनों के कारण हमारे देश
में भी कट्टरपंथी नेतृत्व का मुस्लिम समाज पर नियंत्रण और प्रभाव बढ़ा है। बहुत
पहले, सन् 1992-93 की मुंबई हिंसा के बाद, मैंने अचानक पाया कि मेरे
मार्गदर्शन में शोध कर रहे अध्येता, दिन में कई बार मस्जिद जाने लगे और मेरे
एक साथी शिक्षक ने अपने उपनाम, जो पहले उनके धर्म को इंगित नहीं करता था की
जगह ऐसे उपनाम का प्रयोग करना शुरू कर दिया जिससे यह साफ हो जाता था कि वे
मुसलमान हैं। आईआईटी मुंबई के परिसर में निवास करते हुए मैंने देखा कि गुजरात
के सन् 2002 के कत्लेआम के बाद केम्पस में मुस्लिम लड़कियां जो तब तक
सलवार-कमीज या पेंट और शर्ट पहनती थीं, अचानक बुर्का ओढ़ने लगीं।

मक्का मस्जिद, मालेगांव, समझौता एक्सप्रेस और अजमेर में हुए बम विस्फोटों के
बाद, पुलिस ने तुरत-फुरत बड़ी संख्या में मुसलमान युवकों को हिरासत में ले लिया
और अदालतों से बरी होने के पूर्व, उन्हें कई साल सीखचों के पीछे गुजारने पड़े।
इससे भी सुधार की प्रक्रिया बाधित हुई। शिक्षा प्राप्त करने के लिए मुस्लिम
समुदाय का एक बड़ा हिस्सा बहुत आतुर था परन्तु बाटला हाउस मुठभेड़ और आजमगढ़ और
भटकल जैसे स्थानों के दानवीकरण ने शिक्षा को उनकी प्राथमिकता नहीं बनने दिया।

इस परेशानहाल समुदाय में सुधार की प्रक्रिया कैसे सफल हो सकती है? जैसा कि
हर्ष मंदर ने लिखा है, इस समुदाय का संपूर्ण राजनैतिक हाशियाकरण हो चुका है।
सांप्रदायिक दंगों के चलते वे अपने मोहल्लों में सिमट गए हैं। सन 1992-93 की
हिंसा के बाद मुंबई के नज़दीक मुम्बरा अस्तित्व में आया तो 2002 के बाद, जुहापुरा।
किसी डरे-सहमे और अपने में सिमटे समुदाय में किस हद तक सुधर लाया जा सकता है? कई
विवेकशील और प्रबुद्ध मुसलमानों ने अपने समुदाय में शिक्षा को प्रोत्साहन देने
के सघन प्रयास किए। अपनी एक अमरीका यात्रा के दौरान मुझे कई ऐसे मुसलमानों से
मिलने का मौका मिला जो वहां अलग-अलग पेशों में थे। वे सब इस बारे में एकमत थे
कि भारतीय मुसलमानों में शिक्षा को प्रोत्साहन दिए जाने के ज़रुरत है और वे
इसके लिए भी तैयार थे कि वे भारत में इस समुदाय के लिए शिक्षण संस्थाओं की
स्थापना में आर्थिक सहयोग उपलब्ध करवाएं और युवा मुसलमान लड़कों व लड़कियों के
लिए वजीफों की व्यवस्था करें। इससे उन प्रयासों को मजबूती मिलेगी जो गुजरात
में जेएस बंदूकवाला और देश भर में मुसलमानों की कई संस्थाएं कर रहीं हैं।

आज देश में दक्षिणपंथ का जोर बढ़ रहा है और चुनाव जीतने के लिए नेताओं को अपने
हिन्दू होने का दंभ भरना आवश्यक हो गया है। इसके साथ ही, “जो लोग भारत में रह
रहे हैं, वे सब हिन्दू हैं” (मोहन भगवत) जैसे दावे, मुसलमानों को आतंकित कर
रहे हैं। इसी के चलते असगर अली इंजीनियर जैसे लोग, जिन्होंने इस्लाम का
मानवतावादी चेहरा दुनिया के सामने रखने का प्रयास किया और समुदाय में सुधार की
नींव रखी, उन्हें मुख्यधारा से बाहर कर दिया गया। मुस्लिम समुदाय आज एक दुविधा
में फंसा हुआ है। उसका केवल राजनैतिक हाशियाकरण ही नहीं हुआ है बल्कि उसे घृणा
का पात्र बना दिया गया है। इसके लिए इतिहास के साम्प्रदायिक संस्करण का उपयोग
किया गया और यह दिखाने का प्रयास किया गया कि हिन्दू, मुस्लिम राजाओं के हाथ
प्रताड़ित हुए थे।

जहां तक हामिद दलवई या आरिफ मोहम्मद खान जैसे लोगों का सवाल है, उनके प्रयासों
की सराहना करने में हम गुहा के साथ हैं परंतु हम सबको यह भी समझना होगा कि
मुस्लिम समुदाय को एक कोने में ढकेला जा रहा है। आज भी देश के विभाजन और
कश्मीर की समस्या के लिए उन्हें दोषी ठहराया जाता है। पिछले एक दषक में मेरे
कई मुस्लिम मित्र, जिन्हे मैं कभी उनके धर्म की दृष्टि से देखता ही नहीं था, भी
यह सवाल उठाने लगे हैं कि आज भारत में मुसलमान होने का क्या अर्थ है।
मुसलमानों की उदारवादी परंपरा, जिसमें खान अब्दुल गफ्फार खान से लेकर जाकिर
हुसैन, उस्ताद बिस्मिल्ला खान, साहिर लुधियानवी, कैफी आजमी और जावेद अख्तर
जैसे लोग शामिल हैं, आज भी जिंदा है परंतु समस्या यह है कि उनके समुदाय में
उनकी सीमित स्वीकार्यता है।

आज भी ’मुस्लिम्स फॉर सेक्युलर डेमोक्रेसी’ और ’माडरेट मुस्लिमस’ जैसे
संगठन, इस्लाम
के मुल्ला संस्करण के विरूद्ध आवाज उठा रहे हैं। जिस सवाल पर हमें विचार करना
चाहिए वह यह है कि सज्जनता, विवेक और तर्क की इन आवाजों को मुस्लिम समुदाय में
तव्वजो क्यों नहीं मिल रही है। क्या कारण है कि यह समुदाय अब भी रूढ़िवाद की
बेड़ियों में जकड़ा हुआ है। यह भी दिलचस्प है कि आज हिंदू राष्ट्रवादी विचारधारा
के प्रभाव में आकर और वर्तमान सत्ताधारियों की सोच के चलते, बहुसंख्यक समुदाय
भी आस्था और सच, मिथक और यथार्थ के बीच का भेद भुलाता जा रहा है। हम केवल
उम्मीद कर सकते हैं कि हामिद दलवई जैसे लोग जो सुधार के प्रति प्रतिबद्ध थे और
असगर अली इंजीनियर जैसे व्यक्तित्व जो इस्लाम का मानवतावादी चेहरा लोगों के
सामने ला रहीं थीं, की आवाज सुनी और समझी जाएगी। यह भी आवश्यक है कि हिन्दू
राष्ट्रवाद के बढ़ते कदमों को रोका जाए क्योंकि वही समाज में इस समुदाय के
प्रति घृणा उत्पन्न कर रहा है और इसे हाशिए पर ढकेल रहा है। *(अंग्रेजी से
हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया) (*

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