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Seema Mustafa,
Editor,
The Citizen.
the citizen.in

> On 07-Jun-2018, at 16:49, ram puniyani <[email protected]> wrote:
> 
> क्या कहें प्रणब दा संघ के स्वयंसेवकों से?
> 
>                                  -राम पुनियानी
> 
> संवाद, प्रजातांत्रिक प्रक्रिया का अनिवार्य और अपरिहार्य हिस्सा है। परंतु तब 
> हम क्या करें जब ऐसे लोग, जो प्रजातांत्रिक रास्ते से प्रजातंत्र को समाप्त करने 
> की इच्छा रखते हों, उन लोगों के साथ संवाद करना चाहें, जो भारत के धर्मनिरपेक्ष, 
> प्रजातांत्रिक संविधान में आस्था रखते हैं। पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी 
> द्वारा आरएसएस के एक कार्यक्रम में मुख्य अतिथि बतौर हिस्सा लेने के लिए राजी हो 
> जाने पर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कुछ लोगों का कहना है कि 
> आरएसएस और उसके जैसे संगठनों से संवाद करने में कोई बुराई नहीं है। आखिर क्या हम 
> इस तथ्य को झुठला सकते हैं कि संघ आज देश में एक बड़ी शक्ति है। दूसरी ओर, अन्य 
> लोगों का कहना है कि संघ को प्रजातांत्रिक व्यवस्था का अंग नहीं माना जा सकता 
> क्योंकि वह भारतीय राष्ट्रवाद में यकीन नहीं रखता और हिन्दू राष्ट्र की स्थापना 
> करना चाहता है।
> 
> आरएसएस के मुखपत्र ‘आर्गनाईजर‘ ने 14 अगस्त 1947 को लिखा, ‘‘अब हमें अपने आपको 
> राष्ट्रवाद की झूठी अवधारणाओं से प्रभावित होने से बचाना होगा। आज जो विभ्रम की 
> स्थिति हमारे देश में बनी हुई है उसे दूर करने और वर्तमान और भविष्य में हमारी 
> समस्याओं से निपटने का एकमात्र तरीका यह है कि हम इस तथ्य को स्वीकारें कि 
> हिन्दुस्तान में केवल हिन्दू ही एक राष्ट्र हैं और राष्ट्र का ढांचा इसी मजबूत 
> और सुरक्षित नींव पर खड़ा किया जाना चाहिए। राष्ट्र का आधार होना चाहिए हिन्दू 
> परंपराएं, हिन्दू संस्कृति, हिन्दू विचार और हिन्दू आकांक्षाएं”। इसी तरह, 
> नरेन्द्र मोदी ने सन् 2014 के लोकसभा चुनाव के प्रचार के दौरान कहा था कि चूंकि 
> वे राष्ट्रवादी हैं और एक हिन्दू परिवार में जन्में थे इसलिए वे हिन्दू 
> राष्ट्रवादी हैं।
> 
> प्रणब मुखर्जी जीवनपर्यन्त एक सच्चे कांग्रेसी रहे हैं। वे भारतीय संविधान और 
> धर्मनिरपेक्षता के मजबूत पक्षधर हैं। फिर, उन्हें एक ऐसे संगठन का निमंत्रण 
> क्यों स्वीकार करना चाहिए, जिसका गठन ही हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के लिए हुआ 
> है। इस मुद्दे के दो पहलू हैं। जो लोग मुखर्जी द्वारा संघ का निमंत्रण स्वीकार 
> करने का विरोध कर रहे हैं उनके इस तर्क में दम है कि इससे आरएसएस और उसके 
> विघटनकारी एजेंडे को स्वीकार्यता मिलेगी। दूसरी ओर, यह तर्क भी दिया जा सकता है 
> कि यह एक अवसर है, जिसका इस्तेमाल कर प्रणब मुखर्जी, आरएसएस के विघटनकारी एजेंडे 
> के बारे में अपने विचार देश के सामने रख सकते हैं और संघ के कार्यकर्ताओं को यह 
> चेतावनी दे सकते हैं कि उनके लिए यही बेहतर होगा कि वे हिन्दू राष्ट्रवाद का 
> दामन छोड़ें और भारतीय राष्ट्रवाद की राह पर चलें।
> 
> क्या मुखर्जी आरएसएस को आईना दिखला पाएंगे? क्या वे उसे बता पाएंगे कि गांधी, 
> पटेल और नेहरू, आरएसएस की विचारधारा और उसके राष्ट्रवाद के बारे में क्या सोचते 
> थे? राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या के बाद पटेल ने लिखा “उनके (आरएसएस)  
> नेताओं के भाषण साम्प्रदायिक जहर से भरे हुए थे। इसके नतीजे में देश में एक ऐसा 
> जहरीला वातावरण बना जिसके चलते गांधीजी की हत्या जैसी भयावह त्रासदी संभव हो 
> सकी। आरएसएस ने गांधीजी की मौत पर प्रसन्नता व्यक्त की और उसके कार्यकर्ताओं ने 
> मिठाई बांटी” (एमएस गोलवलकर और श्यामाप्रसाद मुखर्जी को पटेल द्वारा लिखे गए 
> पत्रों से)। गांधीजी की हत्या किसी एक व्यक्ति के पागलपन का नतीजा नहीं थी। वह 
> आरएसएस की हिन्दू राष्ट्रवाद की विचारधारा का परिणाम थी।
> 
> ऐसा दावा किया जाता है कि गांधीजी आरएसएस की एक शाखा में गए थे। तथ्य यह है कि 
> गांधीजी कभी भी आरएसएस से प्रभावित नहीं थे। उनके सचिव प्यारेलाल लिखते हैं कि 
> सन् 1946 में हुई हिंसा के बाद गांधीजी के काफिले के एक सदस्य ने वाघा में 
> आरएसएस के कार्यकर्ताओं द्वारा दिखाई गई कार्यकुशलता, अनुशासन, साहस और कड़ी 
> मेहनत की प्रशंसा की। वाघा, पंजाब में शरणार्थियों का एक बड़ा कैंप था। इस पर 
> गांधीजी ने कहा कि “न भूलो कि हिटलर के नेतृत्व में नाजियों और मुसोलिनी के 
> नेतृत्व में फासीवादियों ने भी इन्हीं सब गुणों का प्रदर्शन किया था।‘‘ गांधीजी, 
> आरएसएस को एकाधिकारवादी दृष्टिकोण वाला साम्प्रदायिक संगठन मानते थे।
> 
> इसके पहले भी गांधीजी ने आरएसएस के संबंध में लिखा था, जिससे उसके बारे में उनके 
> विचार स्पष्ट होते हैं। ‘हरिजन’ के 9 अगस्त 1942 के अंक में गांधी लिखते हैं, 
> ‘‘मैंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसकी गतिविधियों के बारे में सुना है और 
> मुझे यह भी पता है कि यह एक साम्प्रदायिक संगठन है‘‘। गांधीजी ने यह टिप्पणी एक 
> शिकायत के संदर्भ में की, जिसमें कहा गया था कि किसी स्थान पर ‘दूसरे समुदाय’ के 
> विरूद्ध नारे लगाए गए और भाषण दिए गए। गांधीजी यहां  आरएसएस की शाखा में 
> स्वयंसेवकों द्वारा लगाए गए कुछ नारों का जिक्र  कर रहे थे, जिनमें यह कहा गया 
> था कि यह देश केवल हिन्दुओं का है और अंग्रेजों के इस देश से जाने के बाद 
> हिन्दू, अन्य धर्मों के लोगों को अपना गुलाम बना लेंगे। साम्प्रदायिक संगठनों 
> द्वारा किए जा रहे उपद्रव पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए उन्होंने लिखा, “मैंने 
> आरएसएस के बारे में कई बातें सुनी हैं। मुझे बताया गया है कि संघ इस सारी शरारत 
> की जड़ में है” (गांधी, कलेक्टिड वर्क्स, खंड 98, पृष्ठ 320-322, प्रकाशन विभाग, 
> सूचना व प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली, 1958)।
> 
> क्या आरएसएस में कुछ बदलाव आया है? क्या उसके बारे में कही गई पुरानी बातों को 
> फिर से दुहराने का कोई अर्थ है? सच यह है कि घृणा की जिस विचारधारा ने गांधी की 
> हत्या की थी, वह अब भी उतनी ही मजबूत है। राममंदिर, गोहत्या आदि जैसे मुद्दों को 
> लेकर जो हिंसा हो रही है उसके लिए केवल तलवारें, लाठियां और चाकू थामे हाथ दोषी 
> नहीं हैं। इसके पीछे है विचारधारा - हिन्दू राष्ट्रवाद की विचारधारा। आजादी के 
> बाद से आरएसएस के आकार और उसके प्रभाव में आशातीत वृद्धि हुई है परंतु उसका 
> एजेंडा आज भी वही है। इतिहास के साम्प्रदायिक संस्करण का उपयोग कर वह अब भी 
> अल्पसंख्यकों के विरूद्ध विषवमन कर रहा है, फिर मुद्दा चाहे पद्मावत का हो या लव 
> जिहाद का। पास्टर स्टेन्स की हत्या और ईसाईयों के विरूद्ध हिंसा के लिए जितना 
> उसे करने वाले दोषी थे, उतना ही दोष इस दुष्प्रचार का भी था कि ईसाई मिशनरियां 
> जोर जबरदस्ती, धोखाधड़ी और लोभ-लालच के जरिए हिन्दुओं को ईसाई बना रही हैं।
> 
> क्या आरएसएस अपनी हिन्दू राष्ट्रवादी विचारधारा को त्याग सकता है? क्या वह 
> गोलवलकर या ‘वी, आर अवर नेशनहुड डिफाइंड’ या ‘बंच ऑफ़ थाट्स’ को नकार सकता है? 
> अगर मुखर्जी, आरएसएस को एक ऐसा संगठन बनाना चाहते हैं जो बहुवादी राष्ट्रवाद में 
> आस्था रखता हो, तो शायद उन्होंने एक असंभव काम अपने हाथों में ले लिया है। 
> आरएसएस के कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होने के लिए राजी होकर 
> मुखर्जी ने एक अत्यंत जोखिम भरा काम किया है। या तो वे आरएसएस के हिन्दू 
> राष्ट्रवाद को स्वीकार्यता देंगे या उन्हें यह चुनौती स्वीकार करनी होगी कि वे 
> संघ को उसकी विघटनकारी विचारधारा को त्यागने के लिए कहें और उसे उस राह पर चलने 
> के लिए प्रेरित करें जो गांधी और नेहरू ने दिखाई थी और जो हमें धर्मनिरपेक्ष, 
> प्रजातांत्रिक भारत की ओर ले जाएगी।  (अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश 
> हरदेनिया) 
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