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 बड़ी गौरवशाली रही है भारतीय मिलिट्री बैंड की हिस्ट्री
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नई दिल्ली। हर साल गणतंत्र दिवस समारोह का समापन बीटिंग रिट्रीट से होता है।
बीटिंग रिट्रीट वो पल होता है जब सेना के तीनों अंगों के मिलिट्री बैंड एकसाथ
सेना के सर्वोच्च कमांडर भारत के राष्ट्रपति को सलामी देते हैं। 62वें गणतंत्र
दिवस समारोह आज हम जिस भारतीय मिलिट्री बैंड को जानते हैं उसकी कहानी 300 साल
के ब्रिटिश मिलिट्री बैंड के इतिहास से जुड़ी है। भारतीय मिलिट्री बैंड की
खासियत रही है इसकी हिंदुस्तानी धुनें यानी भारतीय युद्ध और संगीत की परंपराओं
में रची-बसी हिंदुस्तानी और विदेशी इंस्ट्रूमेंट्स पर बजाई गई धुनें। भारतीय
मिलिट्री बैंड मास्टरों ने पंजाब, राजस्थान, मारवाड़, गढ़वाल और कोंकण के
लोकगीतों से धुनें उठाईं। मसलन वीर गोरखा, कोंकण ब्रिटिश हुकूमत खत्म हुई तो
मिलिट्री बैंड का भारतीयकरण शुरू हुआ। कमांडर इन चीफ फील्ड मार्शल केएम
करियप्पा ने इस चुनौती को कबूला और 1950 में मध्य प्रदेश के पचमढ़ी इलाके में
मिलिट्री स्कूल ऑफ म्यूजिक की नींव डाली। इसे आज लंदन के नैलर हॉल में मौजूद
रॉयल मिलिट्री स्कूल ऑफ म्यूजिक की तर्ज पर नैलर हॉल ऑफ इंडिया कहा जाता है।
यही वो वक्त था जब मेजर रॉबर्ट्स ने भारतीय धुनों पर आधारित हिंदुस्तानी
मिलिट्री बैंड को आकार दिया।मिलिट्री म्यूजिक के कंपोजीशन में सबसे आगे थे-
हैरोल्ड जोसेफ, एलबी गुरंग, जनरल निर्मल चंद्र विज और मेजर नाजिर हुसैन जैसे
अफसर। इन्होंने अलग-अलग मौकों के लिए अलग-अलग धुनें रचीं, मसलन राष्ट्रीय
उत्सवों पर बजाई जाने वाली क्विक मार्च कैटेगरी की धुन- सारे जहां से अच्छा।
इसे जाने-माने उर्दू कवि अल्लामा इकबाल ने इसे लिखा था और प्रोफेसर ए लोबो ने
इसे संगीत से सजाया।यूं तो भारतीय मिलिट्री बैंड में चार बड़े बैंड शामिल हैं-
आर्मी, एयरफोर्स, नेवी और पैरामिलिट्री बैंड्स लेकिन आर्मी बैंड के दो हिस्से
देखने को मिलते हैं। मिलिट्री बैंड, जिसे अलग-अलग रेजीमेंटल सेंटर्स के जवान
पेश करते हैं और पाइप्स एंड ड्रम्स। एयरफोर्स और नेवी में जहां कमांड स्तर पर
बैंड हैं तो आर्मी में हर रेजीमेंटल स्तर पर। राजपूताना रेजीमेंटल सेंटर का
बैंड है जिसकी प्रस्तुति सिंहगढ़ है, जो राजपूताना शौर्य को समर्पित है।गणतंत्र
दिवस पर आर्मी की पेशकश अलग तरह की होती हैं। ऐसी कुछ अहम धुनें हैं- अमर
सेनानी, वीर सिपाही, वीर सियाचिन और कदम-कदम बढ़ाए जा। पाइप्स और ड्रम्स बैंड
चूंकि स्कॉटिश बैंड परंपरा का हिस्सा रहा है, इसलिए इनकी ज्यादातर धुनें पहले
स्कॉटिश थीं। अब ये शेरपा, केदारनाथ, सागर सम्राट और चांदनी जैसी भारतीय धुनें
भी बजाते हैं।मिलिट्री म्यूजिक में भारतीय सेना की अलग पहचान है। भारतीय
मिलिट्री बैंड ने कई विदेशी बैंडवादकों को भी ट्रेनिंग दी हैः जैसे श्रीलंका,
मालदीव, म्यांमार, नेपाल, भूटान, अफगानिस्तान, फिजी, घाना, केन्या और मॉरीशस।
यहां तक कि उनका नाम गिनीज बुक में भी दर्ज है जब सिर्फ एक कंडक्टर के साथ करीब
साढ़े चार हजार संगीतकारों ने अमेजिंग ग्रेस धुन बजाकर ये रिकॉर्ड बनाया
था।इंडियन एयरफोर्स के बैंड का इतिहास भी कम शानदार नहीं जिसकी खासियत देखने को
मिलती है साउंड बैरियर जैसी कंपोजीशन में। इसमें आपको एयरफोर्स के मूल तत्व हवा
और आकाश की बेजोड़ बनावट सुनाई पड़ेगी। अगर फ्यूजन देखना हो, तो आप एयरफोर्स
बैंड की राग पर आधारित धुन हंसध्वनि सुन सकते हैं। बांसुरी-तबला और मृदंग के
साथ वायलिन और क्लैरिनेट का सुंदर संगम ताज्जुब में डाल देता है।एयर बैटल,
ईवनिंग स्टार, एयर वॉरियर्स और टिको-टिको जैसी धुनों से सजे एयरफोर्स बैंड के
खाते में एक और कामयाबी भी है। 1971 की लड़ाई के बाद निकला पहला एलपी रिकॉर्ड,
जिसे परमवीर चक्र विजेता निर्मलजीत को समर्पित किया गया था। एयरफोर्स ने भारतीय
नेवी को भी एक धुन समर्पित की है लेकिन नेवी बैंड का इतिहास भी उतना ही
गौरवशाली रहा है। उनकी प्रमुख धुनों में एक है वैष्णवजन जैसे गीत पर आधारित
मिलिट्री धुन, जिसे खुद महात्मा गांधी ने लिखा था। इसके अलावा मार्च ऑफ द
मरीनर्स, नॉटिलस और पोसीडॉन जैसी नई धुनें।गणतंत्र की 61वीं बरसी पर इस बार
एयरफोर्स और नेवी के करीब सवा सौ बैंडवादकों की टोली ने क्विक मार्च और स्लो
मार्चिंग ट्यून्स पेश किया। यूं तो चेंजिंग ऑफ गार्ड्स, फेस्टिवल ऑफ
रिमेंबरेंस, ट्रूपिंग ऑफ द कलर जैसे कई मौके हैं जब भारतीय सेनाओं बैंड अलग-अलग
पेशकश देते हैं लेकिन राजधानी दिल्ली में रायसीना हिल्स पर होने वाला बीटिंग
रिट्रीट ऐसा मौका होता है जब मिलिट्री के तीनों अंगों के बैंड एकसाथ अपना हुनर
दिखाते हैं। इस साल 61वें गणतंत्र दिवस समारोह पर आर्मी, एयरफोर्स और नेवी के
कुल 35 बैंड्स ने अपना जौहर दिखाया। इनमें आर्मी की अलग-अलग रेजीमेंट्स के 12
मिलिट्री और 15 पाइप्स एंड ड्म्स बैंड, 72 बगलर्स और 12 ट्रंपेटर्स थे, तो
एयरफोर्स और नेवी के 4-4 बैंड्स।बीटिंग रिट्रीट के साथ एक और खासियत भी जुड़ी
है। जब भारत के राष्ट्रपति विजय चौक के लिए निकलते हैं, तब 200 साल पुरानी
परंपरा वाला एक बिगुल बजाया जाता है। इसका इस्तेमाल पहली बार जर्मन और अंग्रेज
फौजों ने किया था। साउंडिंग ऑफ रिट्रीट एक पुरानी परंपरा है। जब जंग के मैदान
से शाम को सैनिक अपने ठिकानों की तरफ लौटते थे तो उन्हें नगाड़ों या बिगुल के
जरिए कैंपों में वापस बुलाया जाता था। इसलिए बीटिंग रिट्रीट गणतंत्र दिवस
समारोह का समापन भी होता है और ये समापन होता है एक खास धुन पर. तो युद्ध और
संगीत का कोई मेल नहीं। दोनों एक दूसरे के उलट दो चीजें हैं लेकिन जो संगीत
इंसान की रूह को सुकून देता है, वही जंग के मैदान में ऐसे जज्बात बाहर खींच
लाता है, जो आदमी को जीवन-मृत्यु से ऊपर उठा देते हैं। जंगी संगीत की खासियत है
अपने वतन के लिए प्यार, हमलावर के लिए नफरत और गुस्सा। 13वीं सदी में पहली बार
ब्रिटिश सेना ने फ्रांस के साथ एक युद्ध में इस संगीत की खासियत को पहली बार
महसूस किया। पहली बार जंग के मैदान में ट्रंपेट बजाया गया, जवानों पर इसका असर
बेहद संक्रामक था।इसके बाद 17वीं सदी आई, इस सदी में लड़ाइयों के मैदान में
बिगुल और ट्रंपेट बजने लगे, जो हल्के थे। इनकी आवाज काफी तेज हुआ करती थी।
लड़ाई के मैदान में इनका एक खास इस्तेमाल था- संदेश देना। धीरे-धीरे मार्च,
एक्सटैंड, रन, अराइज जैसी फील्ड साउंड्स बजाई जाने लगीं। इनके साथ ही कैटल
ड्रम्स, बांसुरी, नफीरी और बसून्स जैसे इंस्ट्रूमेंट्स भी शामिल हो गए।
धीरे-धीरे इस जंगी संगीत ने मिलिट्री बैंड का रूप ले लिया।18वीं सदी तक फ्रैंच
हॉर्न भी बैंड में शामिल हो गए थे। 1763 में प्रशिया के फ्रैडरिक द ग्रेट ने
पहली बार मिलिट्री बैंड में वादकों और वाद्य यंत्रों की संख्या तय कर दी।
उन्होंने नफीरी, क्लैरिनेट, हॉर्न्स और बसून्स के जोड़े बनाए। इसके बाद
मिलिट्री म्यूजिक के इतिहास में बड़ा दिन आया 12 मई 1838। जब प्रशियन मिलिट्री
म्यूजिक के संयोजक कार्ल विप्रेश ने रशियन जार के सम्मान में 32 इन्फेंट्री और
कैवेलरी यूनिट्स के जवानों को मिलाकर एक हजार विंड इंस्ट्रूमेंट्स और 200
ड्रमर्स के साथ एक मास बैंड पेश किया।मगर मिलिट्री म्यूजिक की सबसे लंबी और
शानदार परंपरा रही है ब्रिटिश मिलिट्री बैंड की। 1783 में जर्मनी के ड्यूक ऑफ
यॉर्क मिलिट्री बैंड को इंग्लैंड लाए। जिन्होंने क्लैरिनेट, हॉर्न्स, बसून्स,
ट्रम्पेट्स, ट्रम्बोन्स, सर्पेंट्स और ड्रम्स मिलाकर 24 सदस्यों का एक बैंड
बनाया। ये वो पहला बैंड था जिसने ब्रिटिश कॉमनवैल्थ मुल्कों में मिलिट्री
म्यूजिक की परंपरा शुरू की। इसके बाद आर्मी में रेजीमेंटल सेंटर पर, तो
एयरफोर्स और नेवी में कमांड स्तर पर बैंडों का गठन होने लगा।लंदन में स्थापित
हुआ पहला मिलिट्री स्कूल। मिलिट्री म्यूजिक का स्तर सुधारने के लिए ब्रिटिश
आर्मी ने लंदन के नैलर हॉल में 1857 में मिलिट्री म्यूजिक स्कूल स्थापित किया।
1920 तक यहां इंस्ट्रूमेंट्स की तादाद और उनकी वैरायटी तय कर दी गई। इधर, दूसरे
विश्वयुद्ध के दौरान सेनाओं के साथ बैंड भी नजर आने लगे। बेशक न्यूक्लियर
वॉरफेयर के मौजूदा दौर तक मिलिट्री म्यूजिक 800 साल का हो चुका है लेकिन इसका
मकसद वही है, जंग के मैदान में फतह के लिए मौत को मात देने वाली धुन।सुंदरी,
अल्मोड़ा मार्च, केराला, चन्ना बिलौरी, पटनी टॉप और हंसते लुशाई।पर इस बार
मिलिट्री के 35 अलग-अलग बैंड नई धुनों को लेकर पहुंचे
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With best wishes

S Chander

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