This is the story of 75 years old Islam chacha who is blind by birth.
He has been selling groundnuts for last 55 years in the local trains
from Saharan pur to Haridwar.  He has now helped the entire village to
drink safe water from his collected money over the years. his savings
of Rs 42 thousand money has brought water pump in the village.  He has
also adopted one child of one of his brothers.
 
http://dehradun.amarujala.com/news/city-hulchul-dun/islam-chacha-provide-water-conection-from-his-money-hindi-news/


55 सालों से ट्रेनों में मूंगफली बेच रहे हैं नेत्रहीन इस्लाम
रुड़की के नेत्रहीन इस्लाम चाचा दुनिया को नेकी की राह दिखा रहे हैं।
लोकल ट्रेनों में मूंगफली और नमकीन बेचकर मुश्किल से गुजर बसर करने वाले
इस्लाम ने 42 हजार रुपयों से अपने गांव के लोगों के लिए एक समरसेबिल
लगवाया है।

इस काम में उनकी दशकों की बचत खर्च हो गई पर उन्हें खुशी है कि उनके
प्रयास से लोग आसानी से अपनी प्यास बुझा रहे हैं। इतना ही नहीं उनके
मोहल्ले के करीब 25 घरों के लोगों ने पाइप डाल कनेक्शन भी ले लिया है।
इसमें खर्च होने वाली बिजली का बिल भी इस्लाम ही चुकाते हैं।

गांव में पेयजल की बेहतर सुविधा के लिए इस्लाम ने तीन माह पहले एक
समसेबिल पंप लगवाया है। इस पंप को लगाने में 42 हजार रुपए का खर्च आया।
करीब छह हजार की आबादी वाले खाताखेड़ी गांव के प्रधान एजाज ने बताया कि
इस्लाम की इस नेकी के कारण पूरा गांव उसको बेहद प्यार करता है।

अब गांववालों ने तय किया है कि इस समरसेबिल पर आने वाले बिजली के खर्च को
वे लोग आपस में बांट कर चुकाएंगे।

छूकर करते हैं रुपयों की पहचान
लोकल ट्रेन में प्रतिदिन सफर करने वाले राजकीय इंटर कॉलेज इमलीखेड़ा के
प्रधानाचार्य आरपी अग्रवाल ने बताया कि इस्लाम ट्रेनों में अपना माल
बेचने के लिए मुफ्त यात्रा नहीं करते। वे बाकायदा एमएसटी बनवाकर सफर करते
हैं।

इकबालपुर रेलवे स्टेशन से सटे खाताखेड़ी गांव निवासी 75 वर्षीय इस्लाम
जन्म से नेत्रहीन हैं। लेकिन वे किसी पर बोझ नहीं बने और न किसी के आगे
हाथ फैलाया। अपनी गुजर बसर के लिए वे हरिद्वार से सहारनपुर आने-जाने वाली
लोकल ट्रेनों में मूंगफली, नमकीन आदि बेचते हैं।

लोकल ट्रेन में प्रतिदिन सफर करने वाले यात्री उनको ‘इस्लाम चाचा’ के नाम
से बुलाते हैं। इस्लाम ने बताया कि वह 55 सालों से ट्रेन में मूंगफली-
नमकीन आदि बेच रहा है। पौने दो रुपए से यह काम शुरू किया था। अब रोजाना
करीब सौ से डेढ़ सौ की कमाई हो जाती है।

इसी से उसने कई दशकों के दौरान कुछ बचत की थी जिसको समरसेबिल लगवाने में
खर्च कर दिया। वह देख नहीं सकते लेकिन हर ट्रेन को उसकी आवाज से पहचान
लेते हैं। इसी तरह रुपयों को भी वे छूते ही पहचान लेते हैं। इस्लाम के
तीन भाई हैं। तीनों के परिवार हैं। उसने अपने भाई का 11 साल का बेटा गोद
लिया हुआ है।

-- 
Avinash Shahi
Doctoral student at Centre for Law and Governance JNU


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