Sir please send timetable of high school subjectwise.how many periods per subject.
On 29-Oct-2016 9:58 AM, "Shreenivas Naik" < [email protected]> wrote: > सूरदास > > सूरदास का नाम कृष्ण भक्ति की अजस्र धारा को प्रवाहित करने वाले > भक्त कवियों में सर्वोपरि है। हिन्दी साहित्य में भगवान श्रीकृष्ण के अनन्य > उपासक और ब्रजभाषा के श्रेष्ठ कवि महात्मा सूरदास हिंदी साहित्य के सूर्य माने > जाते हैं। हिंदी कविता कामिनी के इस कमनीय कांत ने हिंदी भाषा को समृद्ध करने > में जो योगदान दिया है, वह अद्वितीय है। सूरदास हिन्दी साहित्य में भक्ति > काल के सगुण भक्ति शाखा के कृष्ण-भक्ति उपशाखा के महान कवि हैं। > > जीवन परिचय > > सूरदास का जन्म 1478 ईस्वी में रुनकता नामक गांव में हुआ। यह > गाँव मथुरा-आगरा मार्ग के किनारे स्थित है। कुछ विद्वानों का मत है कि सूर का > जन्म सीही नामक ग्राम में एक निर्धन सारस्वत ब्राह्मण परिवार में हुआ था। बाद > में ये आगरा और मथुरा के बीच गऊघाट पर आकर रहने लगे थे। सूरदास के पिता रामदास > गायक थे। सूरदास के जन्मांध होने के विषय में [2] मतभेद है। प्रारंभ में > सूरदास आगरा के समीप गऊघाट पर रहते थे। वहीं उनकी भेंट श्री वल्लभाचार्य से > हुई और वे उनके शिष्य बन गए। वल्लभाचार्य ने उनको पुष्टिमार्ग में दीक्षित कर > के कृष्णलीला के पद गाने का आदेश दिया। सूरदास की मृत्यु गोवर्धन के निकट > पारसौली ग्राम में १५८० ईस्वी में हुई। > > जन्मतिथि एवं जन्मस्थान के विषय में मतभेद > > सूरदास की जन्मतिथि एवं जन्मस्थान के विषय में विद्वानों में मतभेद है। > "साहित्य लहरी' सूर की लिखी रचना मानी जाती है। इसमें साहित्य लहरी के > रचना-काल के सम्बन्ध में निम्न पद मिलता है - > > मुनि पुनि के रस लेख।दसन गौरीनन्द को लिखि सुवल संवत् पेख॥ > > इसका अर्थ विद्वानों ने संवत् १६०७ वि० माना है, अतएव "साहित्य लहरी' का रचना > काल संवत् १६०७ वि० है। इस ग्रन्थ से यह भी प्रमाण मिलता है कि सूर के गुरु > श्री बल्लभाचार्य थे। > > सूरदास का जन्म सं० १५३५ वि० के लगभग ठहरता है, क्योंकि बल्लभ सम्प्रदाय में > ऐसी मान्यता है कि बल्लभाचार्य सूरदास से दस दिन बड़े थे और बल्लभाचार्य का > जन्म उक्त संवत् की वैशाख् कृष्ण एकादशी को हुआ था। इसलिए सूरदास की जन्म-तिथि > वैशाख शुक्ला पंचमी, संवत् १५३५ वि० समीचीन जान पड़ती है। अनेक प्रमाणों के > आधार पर उनका मृत्यु संवत् १६२० से १६४८ वि० के मध्य स्वीकार किया जाता > है। रामचन्द्र शुक्ल जी के मतानुसार सूरदास का जन्म संवत् १५४० वि० के सन्निकट > और मृत्यु संवत् १६२० वि० के आसपास माना जाता है। > > श्री गुरु बल्लभ तत्त्व सुनायो लीला भेद बतायो। > > सूरदास की आयु "सूरसारावली' के अनुसार उस समय ६७ वर्ष थी। 'चौरासी वैष्णवन की > वार्ता' के आधार पर उनका जन्म रुनकता अथवा रेणु का क्षेत्र (वर्तमान जिला > आगरान्तर्गत) में हुआ था। मथुरा और आगरा के बीच गऊघाट पर ये निवास करते थे। > बल्लभाचार्य से इनकी भेंट वहीं पर हुई थी। "भावप्रकाश' में सूर का जन्म स्थान > सीही नामक ग्राम बताया गया है। वे सारस्वत ब्राह्मण थे और जन्म के अंधे थे। > "आइने अकबरी' में (संवत् १६५३ वि०) तथा "मुतखबुत-तवारीख' के अनुसार सूरदास को > अकबर के दरबारी संगीतज्ञों में माना है। > > क्या सूरदास जन्मान्ध थे ? > > सूरदास श्रीनाथ की "संस्कृतवार्ता मणिपाला', श्री हरिराय कृत "भाव-प्रकाश", > श्री गोकुलनाथ की "निजवार्ता' आदि ग्रन्थों के आधार पर, जन्म के अन्धे माने गए > हैं। लेकिन राधा-कृष्ण के रुप सौन्दर्य का सजीव चित्रण, नाना रंगों का वर्णन, > सूक्ष्म पर्यवेक्षणशीलता आदि गुणों के कारण अधिकतर वर्तमान विद्वान सूर को > जन्मान्ध स्वीकार नहीं करते। > > श्यामसुन्दर दास ने इस सम्बन्ध में लिखा है - "सूर वास्तव में जन्मान्ध नहीं > थे, क्योंकि शृंगार तथा रंग-रुपादि का जो वर्णन उन्होंने किया है वैसा कोई > जन्मान्ध नहीं कर सकता।" डॉक्टर हजारीप्रसाद द्विवेदी ने लिखा है - "सूरसागर > के कुछ पदों से यह ध्वनि अवश्य निकलती है कि सूरदास अपने को जन्म का अन्धा और > कर्म का अभागा कहते हैं, पर सब समय इसके अक्षरार्थ को ही प्रधान नहीं मानना > चाहिए।" > > रचनाएँ > > सूरदास जी द्वारा लिखित पाँच ग्रन्थ बताए जाते हैं: > > (१) सूरसागर - जो सूरदास की प्रसिद्ध रचना है। जिसमें सवा लाख पद संग्रहित > थे। किंतु अब सात-आठ हजार पद ही मिलते हैं।(२) सूरसारावली(३) साहित्य-लहरी - > जिसमें उनके कूट पद संकलित हैं।(४) नल-दमयन्ती(५) ब्याहलो > > उपरोक्त में अन्तिम दो अप्राप्य हैं। > > नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित हस्तलिखित पुस्तकों की विवरण तालिका में > सूरदास के १६ ग्रन्थों का उल्लेख है। इनमें सूरसागर, सूरसारावली, साहित्य > लहरी, नल-दमयन्ती, ब्याहलो के अतिरिक्त दशमस्कंध टीका, नागलीला, भागवत्, > गोवर्धन लीला, सूरपचीसी, सूरसागर सार, प्राणप्यारी, आदि ग्रन्थ सम्मिलित हैं। > इनमें प्रारम्भ के तीन ग्रंथ ही महत्त्वपूर्ण समझे जाते हैं, साहित्य लहरी की > प्राप्त प्रति में बहुत प्रक्षिप्तांश जुड़े हुए हैं। > > सूरसागर का मुख्य वर्ण्य विषय श्री कृष्ण की लीलाओं का गान रहा है।सूरसारावली > में कवि ने कृष्ण विषयक जिन कथात्मक और सेवा परक पदो का गान किया उन्ही के सार > रूप मैं उन्होने सारावली की रचना की।सहित्यलहरी मैं सूर के दृष्टिकूट पद > संकलित हैं। > > सूर-काव्य की विशेषताएँ > > 1. सूर के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण के अनुग्रह से मनुष्य को सद्गति मिल सकती > है। अटल भक्ति कर्मभेद, जातिभेद, ज्ञान, योग से श्रेष्ठ है।2. सूर ने > वात्सल्य, श्रृंगार और शांत रसों को मुख्य रूप से अपनाया है। सूर ने अपनी > कल्पना और प्रतिभा के सहारे कृष्ण के बाल्य-रूप का अति सुंदर, सरस, सजीव और > मनोवैज्ञानिक वर्णन किया है। बालकों की चपलता, स्पर्धा, अभिलाषा, आकांक्षा का > वर्णन करने में विश्व व्यापी बाल-स्वरूप का चित्रण किया है। बाल-कृष्ण की > एक-एक चेष्टाओं के चित्रण में कवि कमाल की होशियारी एवं सूक्ष्म निरीक्षण का > परिचय देते हैं-मैया कबहिं बढैगी चौटी?किती बार मोहिं दूध पियत भई, यह अजहूँ > है छोटी। > > सूर के कृष्ण प्रेम और माधुर्य प्रतिमूर्ति है। जिसकी अभिव्यक्ति बड़ी ही > स्वाभाविक और सजीव रूप में हुई है। > > 3. जो कोमलकांत पदावली, भावानुकूल शब्द-चयन, सार्थक अलंकार-योजना, धारावाही > प्रवाह, संगीतात्मकता एवं सजीवता सूर की भाषा में है, उसे देखकर तो यही कहना > पड़ता है कि सूर ने ही सर्व प्रथम ब्रजभाषा को साहित्यिक रूप दिया है।4. सूर > ने भक्ति के साथ श्रृंगार को जाड़कर उसके संयोग-वियाग पक्षों का जैसा वर्णन > किया है, वैसा अन्यत्र दुर्लभ है।5. सूर ने विनय के पद भी रचे हैं, जिसमें > उनकी दास्य-भावना कहीं-कहीं तुलसीदास से आगे बढ़ जाती है-हमारे प्रभु औगुन चित > न धरौ।समदरसी है मान तुम्हारौ, सोई पार करौ।6. सूर ने स्थान-स्थान पर कूट पद > भी लिखे हैं।7. प्रेम के स्वच्छ और मार्जित रूप का चित्रण भारतीय साहित्य में > किसी और कवि ने नहीं किया है यह सूरदास की अपनी विशेषता है। वियोग के समय > राधिका का जो चित्र सूरदास ने चित्रित किया है, वह इस प्रेम के योग्य है8. सूर > ने यशोदा आदि के शील, गुण आदि का सुंदर चित्रण किया है।9. सूर का भ्रमरगीत > वियोग-शृंगार का ही उत्कृष्ट ग्रंथ नहीं है, उसमें सगुण और निर्गुण का भी > विवेचन हुआ है। इसमें विशेषकर उद्धव-गोपी संवादों में हास्य-व्यंग्य के अच्छे > छींटें भी मिलते हैं।10. सूर काव्य में प्रकृति-सौंदर्य का सूक्ष्म और सजीव > वर्णन मिलता है।11. सूर की कविता में पुराने आख्यानों और कथनों का उल्लेख बहुत > स्थानों में मिलता है।12. सूर के गेय पदों में ह्रृदयस्थ भावों की बड़ी सुंदर > व्यजना हुई है। उनके कृष्ण-लीला संबंधी पदों में सूर के भक्त और कवि ह्रृदय की > सुंदर झाँकी मिलती है।13. सूर का काव्य भाव-पक्ष की दृष्टि से ही महान नहीं > है, कला-पक्ष की दृष्टि से भी वह उतना ही महत्वपूर्ण है। सूर की भाषा सरल, > स्वाभाविक तथा वाग्वैदिग्धपूर्ण है। अलंकार-योजना की दृष्टि से भी उनका > कला-पक्ष सबल है। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने सूर की कवित्व-शक्ति के बारे > में लिखा है-सूरदास जब अपने प्रिय विषय का वर्णन शुरू करते हैं तो मानो > अलंकार-शास्त्र हाथ जोड़कर उनके पीछे-पीछे दौड़ा करता है। उपमाओं की बाढ़ आ > जाती है, रूपकों की वर्षा होने लगती है। > > इस प्रकार हम देखते हैं कि सूरदास हिंदी साहित्य के महाकवि हैं, क्योंकि > उन्होंने न केवल भाव और भाषा की दृष्टि से साहित्य को सुसज्जित किया, वरन् > कृष्ण-काव्य की विशिष्ट परंपरा को भी जन्म दिया है। > > -- > 1. Webpage for this HindiSTF is : https://groups.google.com/d/ > forum/hindistf > Hindi KOER web portal is available on http://karnatakaeducation.org. > in/KOER/en/index.php/Portal:Hindi > > 2. For Ubuntu 14.04 installation, visit http://karnatakaeducation.org. > in/KOER/en/index.php/Kalpavriksha (It has Hindi interface also) > > 3. For doubts on Ubuntu and other public software, visit > http://karnatakaeducation.org.in/KOER/en/index.php/ > Frequently_Asked_Questions > > 4. If a teacher wants to join STF, visit http://karnatakaeducation.org. > in/KOER/en/index.php/Become_a_STF_groups_member > > 5. Are you using pirated software? Use Sarvajanika Tantramsha, see > http://karnatakaeducation.org.in/KOER/en/index.php/Why_public_software > सार्वजनिक संस्थानों के लिए सार्वजनिक सॉफ्टवेयर > --- > You received this message because you are subscribed to the Google Groups > "HindiSTF" group. > To unsubscribe from this group and stop receiving emails from it, send an > email to [email protected]. > To post to this group, send email to [email protected]. > Visit this group at https://groups.google.com/group/hindistf. > To view this discussion on the web, visit https://groups.google.com/d/ > msgid/hindistf/CAOWNnMHA%2BUJ_XdKr%3DVmCyTDfpzXgZzg6bN- > nLb3VAiZgXd384Q%40mail.gmail.com > <https://groups.google.com/d/msgid/hindistf/CAOWNnMHA%2BUJ_XdKr%3DVmCyTDfpzXgZzg6bN-nLb3VAiZgXd384Q%40mail.gmail.com?utm_medium=email&utm_source=footer> > . > For more options, visit https://groups.google.com/d/optout. > -- 1. Webpage for this HindiSTF is : https://groups.google.com/d/forum/hindistf Hindi KOER web portal is available on http://karnatakaeducation.org.in/KOER/en/index.php/Portal:Hindi 2. For Ubuntu 14.04 installation, visit http://karnatakaeducation.org.in/KOER/en/index.php/Kalpavriksha (It has Hindi interface also) 3. For doubts on Ubuntu and other public software, visit http://karnatakaeducation.org.in/KOER/en/index.php/Frequently_Asked_Questions 4. If a teacher wants to join STF, visit http://karnatakaeducation.org.in/KOER/en/index.php/Become_a_STF_groups_member 5. Are you using pirated software? Use Sarvajanika Tantramsha, see http://karnatakaeducation.org.in/KOER/en/index.php/Why_public_software सार्वजनिक संस्थानों के लिए सार्वजनिक सॉफ्टवेयर --- You received this message because you are subscribed to the Google Groups "HindiSTF" group. To unsubscribe from this group and stop receiving emails from it, send an email to [email protected]. To post to this group, send an email to [email protected]. Visit this group at https://groups.google.com/group/hindistf. To view this discussion on the web, visit https://groups.google.com/d/msgid/hindistf/CACjaYw99X94hfeJnJHJVRJO3nXpf7n%3DvsAh8foNRjMVGpYES1g%40mail.gmail.com. For more options, visit https://groups.google.com/d/optout.
