बहुत शुक्रियाँ आपको
On Nov 2, 2016 9:32 PM, "SANJAY KUMAR PATIL" <[email protected]> wrote:

> Sir please send timetable of high school subjectwise.how  many periods per
> subject.
>
> On 29-Oct-2016 9:58 AM, "Shreenivas Naik" <shreenivasnaik.hindi.vogga@
> gmail.com> wrote:
>
>> सूरदास
>>
>> सूरदास का नाम कृष्ण भक्ति की अजस्र धारा को प्रवाहित करने वाले
>> भक्त कवियों में सर्वोपरि है। हिन्दी साहित्य में भगवान श्रीकृष्ण के अनन्य
>> उपासक और ब्रजभाषा के श्रेष्ठ कवि महात्मा सूरदास हिंदी साहित्य के सूर्य माने
>> जाते हैं। हिंदी कविता कामिनी के इस कमनीय कांत ने हिंदी भाषा को समृद्ध करने
>> में जो योगदान दिया है, वह अद्वितीय है। सूरदास हिन्दी साहित्य में भक्ति
>> काल के सगुण भक्ति शाखा के कृष्ण-भक्ति उपशाखा के महान कवि हैं।
>>
>> जीवन परिचय
>>
>> सूरदास का जन्म 1478 ईस्वी में रुनकता नामक गांव में हुआ। यह
>> गाँव मथुरा-आगरा मार्ग के किनारे स्थित है। कुछ विद्वानों का मत है कि सूर का
>> जन्म सीही नामक ग्राम में एक निर्धन सारस्वत ब्राह्मण परिवार में हुआ था। बाद
>> में ये आगरा और मथुरा के बीच गऊघाट पर आकर रहने लगे थे। सूरदास के पिता रामदास
>> गायक थे। सूरदास के जन्मांध होने के विषय में [2] मतभेद है। प्रारंभ में
>> सूरदास आगरा के समीप गऊघाट पर रहते थे। वहीं उनकी भेंट श्री वल्लभाचार्य से
>> हुई और वे उनके शिष्य बन गए। वल्लभाचार्य ने उनको पुष्टिमार्ग में दीक्षित कर
>> के कृष्णलीला के पद गाने का आदेश दिया। सूरदास की मृत्यु गोवर्धन के निकट
>> पारसौली ग्राम में १५८० ईस्वी में हुई।
>>
>> जन्मतिथि एवं जन्मस्थान के विषय में मतभेद
>>
>> सूरदास की जन्मतिथि एवं जन्मस्थान के विषय में विद्वानों में मतभेद है।
>> "साहित्य लहरी' सूर की लिखी रचना मानी जाती है। इसमें साहित्य लहरी के
>> रचना-काल के सम्बन्ध में निम्न पद मिलता है -
>>
>> मुनि पुनि के रस लेख।दसन गौरीनन्द को लिखि सुवल संवत् पेख॥
>>
>> इसका अर्थ विद्वानों ने संवत् १६०७ वि० माना है, अतएव "साहित्य लहरी' का
>> रचना काल संवत् १६०७ वि० है। इस ग्रन्थ से यह भी प्रमाण मिलता है कि सूर के
>> गुरु श्री बल्लभाचार्य थे।
>>
>> सूरदास का जन्म सं० १५३५ वि० के लगभग ठहरता है, क्योंकि बल्लभ सम्प्रदाय में
>> ऐसी मान्यता है कि बल्लभाचार्य सूरदास से दस दिन बड़े थे और बल्लभाचार्य का
>> जन्म उक्त संवत् की वैशाख् कृष्ण एकादशी को हुआ था। इसलिए सूरदास की जन्म-तिथि
>> वैशाख शुक्ला पंचमी, संवत् १५३५ वि० समीचीन जान पड़ती है। अनेक प्रमाणों के
>> आधार पर उनका मृत्यु संवत् १६२० से १६४८ वि० के मध्य स्वीकार किया जाता
>> है। रामचन्द्र शुक्ल जी के मतानुसार सूरदास का जन्म संवत् १५४० वि० के सन्निकट
>> और मृत्यु संवत् १६२० वि० के आसपास माना जाता है।
>>
>> श्री गुरु बल्लभ तत्त्व सुनायो लीला भेद बतायो।
>>
>> सूरदास की आयु "सूरसारावली' के अनुसार उस समय ६७ वर्ष थी। 'चौरासी वैष्णवन
>> की वार्ता' के आधार पर उनका जन्म रुनकता अथवा रेणु का क्षेत्र (वर्तमान जिला
>> आगरान्तर्गत) में हुआ था। मथुरा और आगरा के बीच गऊघाट पर ये निवास करते थे।
>> बल्लभाचार्य से इनकी भेंट वहीं पर हुई थी। "भावप्रकाश' में सूर का जन्म स्थान
>> सीही नामक ग्राम बताया गया है। वे सारस्वत ब्राह्मण थे और जन्म के अंधे थे।
>> "आइने अकबरी' में (संवत् १६५३ वि०) तथा "मुतखबुत-तवारीख' के अनुसार सूरदास को
>> अकबर के दरबारी संगीतज्ञों में माना है।
>>
>> क्या सूरदास जन्मान्ध थे ?
>>
>> सूरदास श्रीनाथ की "संस्कृतवार्ता मणिपाला', श्री हरिराय कृत "भाव-प्रकाश",
>> श्री गोकुलनाथ की "निजवार्ता' आदि ग्रन्थों के आधार पर, जन्म के अन्धे माने गए
>> हैं। लेकिन राधा-कृष्ण के रुप सौन्दर्य का सजीव चित्रण, नाना रंगों का वर्णन,
>> सूक्ष्म पर्यवेक्षणशीलता आदि गुणों के कारण अधिकतर वर्तमान विद्वान सूर को
>> जन्मान्ध स्वीकार नहीं करते।
>>
>> श्यामसुन्दर दास ने इस सम्बन्ध में लिखा है - "सूर वास्तव में जन्मान्ध नहीं
>> थे, क्योंकि शृंगार तथा रंग-रुपादि का जो वर्णन उन्होंने किया है वैसा कोई
>> जन्मान्ध नहीं कर सकता।" डॉक्टर हजारीप्रसाद द्विवेदी ने लिखा है - "सूरसागर
>> के कुछ पदों से यह ध्वनि अवश्य निकलती है कि सूरदास अपने को जन्म का अन्धा और
>> कर्म का अभागा कहते हैं, पर सब समय इसके अक्षरार्थ को ही प्रधान नहीं मानना
>> चाहिए।"
>>
>> रचनाएँ
>>
>> सूरदास जी द्वारा लिखित पाँच ग्रन्थ बताए जाते हैं:
>>
>> (१) सूरसागर - जो सूरदास की प्रसिद्ध रचना है। जिसमें सवा लाख पद संग्रहित
>> थे। किंतु अब सात-आठ हजार पद ही मिलते हैं।(२) सूरसारावली(३) साहित्य-लहरी -
>> जिसमें उनके कूट पद संकलित हैं।(४) नल-दमयन्ती(५) ब्याहलो
>>
>> उपरोक्त में अन्तिम दो अप्राप्य हैं।
>>
>> नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित हस्तलिखित पुस्तकों की विवरण तालिका
>> में सूरदास के १६ ग्रन्थों का उल्लेख है। इनमें सूरसागर, सूरसारावली, साहित्य
>> लहरी, नल-दमयन्ती, ब्याहलो के अतिरिक्त दशमस्कंध टीका, नागलीला, भागवत्,
>> गोवर्धन लीला, सूरपचीसी, सूरसागर सार, प्राणप्यारी, आदि ग्रन्थ सम्मिलित हैं।
>> इनमें प्रारम्भ के तीन ग्रंथ ही महत्त्वपूर्ण समझे जाते हैं, साहित्य लहरी की
>> प्राप्त प्रति में बहुत प्रक्षिप्तांश जुड़े हुए हैं।
>>
>> सूरसागर का मुख्य वर्ण्य विषय श्री कृष्ण की लीलाओं का गान रहा
>> है।सूरसारावली में कवि ने कृष्ण विषयक जिन कथात्मक और सेवा परक पदो का गान
>> किया उन्ही के सार रूप मैं उन्होने सारावली की रचना की।सहित्यलहरी मैं सूर के
>> दृष्टिकूट पद संकलित हैं।
>>
>> सूर-काव्य की विशेषताएँ
>>
>> 1. सूर के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण के अनुग्रह से मनुष्य को सद्गति मिल सकती
>> है। अटल भक्ति कर्मभेद, जातिभेद, ज्ञान, योग से श्रेष्ठ है।2. सूर ने
>> वात्सल्य, श्रृंगार और शांत रसों को मुख्य रूप से अपनाया है। सूर ने अपनी
>> कल्पना और प्रतिभा के सहारे कृष्ण के बाल्य-रूप का अति सुंदर, सरस, सजीव और
>> मनोवैज्ञानिक वर्णन किया है। बालकों की चपलता, स्पर्धा, अभिलाषा, आकांक्षा का
>> वर्णन करने में विश्व व्यापी बाल-स्वरूप का चित्रण किया है। बाल-कृष्ण की
>> एक-एक चेष्टाओं के चित्रण में कवि कमाल की होशियारी एवं सूक्ष्म निरीक्षण का
>> परिचय देते हैं-मैया कबहिं बढैगी चौटी?किती बार मोहिं दूध पियत भई, यह अजहूँ
>> है छोटी।
>>
>> सूर के कृष्ण प्रेम और माधुर्य प्रतिमूर्ति है। जिसकी अभिव्यक्ति बड़ी ही
>> स्वाभाविक और सजीव रूप में हुई है।
>>
>> 3. जो कोमलकांत पदावली, भावानुकूल शब्द-चयन, सार्थक अलंकार-योजना, धारावाही
>> प्रवाह, संगीतात्मकता एवं सजीवता सूर की भाषा में है, उसे देखकर तो यही कहना
>> पड़ता है कि सूर ने ही सर्व प्रथम ब्रजभाषा को साहित्यिक रूप दिया है।4. सूर
>> ने भक्ति के साथ श्रृंगार को जाड़कर उसके संयोग-वियाग पक्षों का जैसा वर्णन
>> किया है, वैसा अन्यत्र दुर्लभ है।5. सूर ने विनय के पद भी रचे हैं, जिसमें
>> उनकी दास्य-भावना कहीं-कहीं तुलसीदास से आगे बढ़ जाती है-हमारे प्रभु औगुन चित
>> न धरौ।समदरसी है मान तुम्हारौ, सोई पार करौ।6. सूर ने स्थान-स्थान पर कूट पद
>> भी लिखे हैं।7. प्रेम के स्वच्छ और मार्जित रूप का चित्रण भारतीय साहित्य में
>> किसी और कवि ने नहीं किया है यह सूरदास की अपनी विशेषता है। वियोग के समय
>> राधिका का जो चित्र सूरदास ने चित्रित किया है, वह इस प्रेम के योग्य है8. सूर
>> ने यशोदा आदि के शील, गुण आदि का सुंदर चित्रण किया है।9. सूर का भ्रमरगीत
>> वियोग-शृंगार का ही उत्कृष्ट ग्रंथ नहीं है, उसमें सगुण और निर्गुण का भी
>> विवेचन हुआ है। इसमें विशेषकर उद्धव-गोपी संवादों में हास्य-व्यंग्य के अच्छे
>> छींटें भी मिलते हैं।10. सूर काव्य में प्रकृति-सौंदर्य का सूक्ष्म और सजीव
>> वर्णन मिलता है।11. सूर की कविता में पुराने आख्यानों और कथनों का उल्लेख बहुत
>> स्थानों में मिलता है।12. सूर के गेय पदों में ह्रृदयस्थ भावों की बड़ी सुंदर
>> व्यजना हुई है। उनके कृष्ण-लीला संबंधी पदों में सूर के भक्त और कवि ह्रृदय की
>> सुंदर झाँकी मिलती है।13. सूर का काव्य भाव-पक्ष की दृष्टि से ही महान नहीं
>> है, कला-पक्ष की दृष्टि से भी वह उतना ही महत्वपूर्ण है। सूर की भाषा सरल,
>> स्वाभाविक तथा वाग्वैदिग्धपूर्ण है। अलंकार-योजना की दृष्टि से भी उनका
>> कला-पक्ष सबल है। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने सूर की कवित्व-शक्ति के बारे
>> में लिखा है-सूरदास जब अपने प्रिय विषय का वर्णन शुरू करते हैं तो मानो
>> अलंकार-शास्त्र हाथ जोड़कर उनके पीछे-पीछे दौड़ा करता है। उपमाओं की बाढ़ आ
>> जाती है, रूपकों की वर्षा होने लगती है।
>>
>> इस प्रकार हम देखते हैं कि सूरदास हिंदी साहित्य के महाकवि हैं, क्योंकि
>> उन्होंने न केवल भाव और भाषा की दृष्टि से साहित्य को सुसज्जित किया, वरन्
>> कृष्ण-काव्य की विशिष्ट परंपरा को भी जन्म दिया है।
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