Very nice sir

On 13-Dec-2016 9:19 pm, "Shreenivas Naik" <
[email protected]> wrote:

>
> *(१) करत-करत अभ्यास के, जड़मति होत सुजान। *
> *रसरी आवत जात तें, सिल पर परत निसान।। *
> *भावार्थ :-* कुए से पानी खींचने के लिए बर्तन से बाँधी हुई रस्सी कुए के
> किनारे पर रखे हुए पत्थर से बार -बार रगड़ खाने से पत्थर पर भी निशान बन जाते
> हैं। ठीक इसी प्रकार बार -बार अभ्यास करने से मंद बुद्धि व्यक्ति भी कई
> नई बातें सीख कर उनका जानकार हो जाता है।
>
> *(२) मूरख को हित के वचन, सुनि उपजत है कोप। *
> *साँपहि दूध पिवाइये, वाके मुख विष ओप।।*
> *भावार्थ :- *साँप को दूध पिलाने पर भी उसके मुख से विष ही निकलता है। इसी
> प्रकार मूर्ख व्यक्ति को उसके हित के वचन अर्थात उसकी भलाई की बात कही जाये,
> तो भी उसे क्रोध ही आता है।
>
> *(३) उत्तम विद्या लीजिये, यदपि नीच पै होय। *
> *परो अपावन ठौर में, कंचन तजत न कोय।। *
> *भावार्थ :-* अपवित्र या गन्दे स्थान पर पड़े होने पर भी सोने को कोई नहीं
> छोड़ता है। उसी प्रकार विद्या या ज्ञान चाहे नीच व्यक्ति के पास हो, उसे ग्रहण
> कर लेना चाहिए।
>
> *(४) अपनी पँहुच विचारि कै, करतब करिये दौर।*
> *तेते पाँव पसारिये, जेती लाँबी सौर।। *
> *भावार्थ :-* व्यक्ति के पास ओढने के लिए जितनी लम्बी कम्बल हो, उतने ही
> लम्बे पैर पसारने चाहिए। इसी प्रकार उसे अपने उपलब्ध साधनों के अनुरूप ही
> अपना कारोबार फैलाना चाहिए।
>
> *(५) उद्यम कबहुँ न छोड़िये, पर आसा के मोद। *
> *गागरि कैसे फोरिये, उनियो देखि पयोद। *
> *भावार्थ :-* कवि वृन्द कहते हैं कि बादलों को उमड़ा हुआ देख कर हमें अपने
> घड़े ( मिट्टी का बर्तन जिसे पानी भरने के लिए काम में लिया जाता है ) को नहीं
> फोड़ना चाहिये। इसी प्रकार दूसरे लोगों से कुछ प्राप्त हो जायेगा इस आशा में
> हमें अपने प्रयास कभी नहीं छोड़ना चाहिये।
>
> *(६) भले- बुरे सब एक से, जौ लौं बोलत नाहिं। *
> *जान परंतु है काक-पिक, रितु बसंत का माहिं।।*
> *भावार्थ :-*  जब तक कोई व्यक्ति बोलता नहीं है, तब तक उसके भले या बुरे
> होने का पता नहीं चलता है। जब वह बोलता है तब ज्ञात होता कि वह भला है या बुरा
> है। जैसे वसंत ऋतु आने पर जब कौवा और कोयल बोलते हैं, तब उनकी कडुवी और मीठी
> वाणी से ज्ञात हो जाता कि कौन बुरा है और कौन भला है।
>
> *(७) जो जाको गुन जानही, सो तिहि आदर देत। *
> *कोकिल अबरि लेत है, काग निबौरी लेत।।  *
> *भावार्थ - *जो व्यक्ति जिसके गुणों को जानता है, वह उसी के गुणों का आदर -
> सम्मान करता है। जैसे कोयल आम का रसास्वादन करती है और जबकि कौआ नीम की
> निम्बौरी से ही सन्तुष्ट हो जाता है।
>
> *(८) उत्तम विद्या लीजिये,जदपि नीच पाई होय। *
> *परयो  अपावन ठौर में, कंचन तजय न कोय।। *
> *भावार्थ - *जिस प्रकार स्वर्ण अपवित्र स्थान पर पड़ा हो, तो भी उसे कोई
> त्यागना नहीं चाहता है। ठीक उसी प्रकार उत्तम विद्या (अच्छा ज्ञान ) कहीं या
> किसी से भी मिले उसको ग्रहण कर लेना चाहिए, चाहे वह (उत्तम विद्या) अधम
> व्यक्ति के पास ही क्यों नहीं हो।
>
> *(९)  मन भावन के मिलन के, सुख को नहिन छोर। *
> *बोलि उठै, नचि- नचि उठै, मोर सुनत घनघोर।। *
> *भावार्थ -   *कवि वृन्द कहते हैं कि जैसे मोर बादलों की गर्जना सुन कर
> मधुर आवाज में बोलने और नाचने लगता है उसी प्रकार हमारे  मन को प्रिय लगने
> वाले व्यक्ति के मिलने पर हमें असीमित आनन्द की प्राप्ति होती है और हमारी
> प्रसन्नता की कोई सीमा नहीं रहती है।
>
> *(१०) निरस बात, सोई सरस, जहाँ होय हिय हेत। *
> *गारी प्यारी लगै, ज्यों-ज्यों समधन देत।।   *
> *भावार्थ -* कवि वृन्द कहते हैं, जिस व्यक्ति के प्रति हमारे ह्रदय में लगाव
> और स्नेह का भाव होता है, उस व्यक्ति की नीरस बात भी सरस लगने लगती हैं। जैसे
> समधिन के द्वारा दी जाने वाली गालियाँ भी अच्छी लगती हैं क्योंकि उन गालियों
> में स्नेह का भाव होता है।
>
> *(११) ऊँचे बैठे ना लहै, गुन बिन बड़पन कोइ। *
> *बैठो देवल सिखर पर, बायस गरुड़ न होइ। *
> *भावार्थ - *जिस प्रकार मंदिर के उच्च शिखर पर बैठा हुआ कौआ गरुड़ की साम्यता
> प्राप्त नहीं कर सकता, उसी प्रकार गुण रहित व्यक्ति उच्च आसन पर बैठने मात्र
> से ही उच्चता को प्राप्त नहीं कर सकता।
>
> *(१२) फेर न ह्वै हैं कपट सों, जो कीजे ब्यौपार। *
> *जैसे हाँडी काठ की, चढ़ै न दूजी बार। *
> भावार्थ -  जिस प्रकार लकड़ी से बनी हुई हाँडी (बर्तन) को दुबारा चूल्हे पर
> नहीं चढ़ाया जा सकता है , ठीक उसी प्रकार जो मनुष्य कपट पूर्वक व्यापार करता
> है , उसका व्यापार लम्बे समय तक नहीं चलता है। यही बात व्यक्ति के  वव्यहार और
> आचरण पर भी लागू  होती है।
>
> *(१३) नैना देत बताय सब, हिये को हेत अहेत। *
> *जैसे निरमल आरसी, भली-बुरी कही देत।। *
> भावार्थ - जिस प्रकार स्वच्छ दर्पण किसी व्यक्ति की वास्तविक छवि को बता
> देता है। उसी प्रकार किसी व्यक्ति के मन में दूसरे व्यक्ति के प्रति स्नेह का
> भाव है या द्वेष का भाव है , यह बात उसके नेत्रों को देख कर ही ज्ञात की जा
> सकती है।
>
> *(१४) सबै सहायक सबल के, कोउ न निबल सहाय। *
> *पवन जगावत आग कौ, दीपहिं देत बुझाय।। *
> भावार्थ - तीव्र हवा प्रज्वलित अग्नि को तो और अधिक प्रचंड बना देती है ,
> लेकिन वही हवा दीपक को बुझा देती है।  इस संसार का यही नियम है , बलवान
> व्यक्ति की सहायता करने के लिए तो कई लोग सामने आ जाते हैं , जबकि निर्बल का
> कोई सहायक नहीं होता है।
>
> *(१५) अति हठ मत कर, हठ बढ़ै, बात न करिहै कोय। *
> *ज्यौं- ज्यौं भीजै कामरी, त्यौं - त्यौं भारी होय। *
> *भावार्थ - *जिस प्रकार कम्बल के भीगते रहने से वह भारी होता जाता है -, उसी
> प्रकार किसी व्यक्ति के हठ या जिद करने से, उसका जिद्दीपन बढ़ता जाता है। तथा
> एक समय ऐसा आता कि लोग उसके हठी स्वभाव के कारण उससे बात करना भी पसंद नहीं
> करते हैं।
>
> On Dec 13, 2016 9:12 PM, wrote:
>
>> वृन्द (१६४३-१७२३) हिन्दी के कवि थे। रीतिकालीन परम्परा के अन्तर्गत वृन्द
>> का नाम आदर के साथ लिया जाता है। इनके नीति के दोहे बहुत प्रसिद्ध हैं।
>>
>> जीवन परिचय :-
>>
>> अन्य प्राचीन कवियों की भाँति वृन्द का जीवन परिचय भी प्रमाणिक नहीं है। पं॰
>> रामनरेश त्रिपाठी इनका जन्म सन् 1643 में मथुरा (उ.प्र.) क्षेत्र के किसी गाँव
>> का बताते हैं, जबकि डॉ॰ नगेन्द्र ने मेड़ता गाँव को इनका जन्म स्थान माना है।
>> इनका पूरा नाम 'वृन्दावनदास' था। वृन्द जाति के सेवक अथवा भोजक थे। वृन्द के
>> पूर्वज बीकानेर के रहने वाले थे परन्तु इनके पिता रूप जी जोधपुर के
>> राज्यान्तर्गत मेड़ते में जा बसे थे। वहीं सन् १६४३ में वृन्द का जन्म हुआ था।
>> वृन्द की माता का नाम कौशल्या आर पत्नी का नाम नवरंगदे था। दस वर्ष की अवस्था
>> में ये काशी आये और तारा जी नामक एक पंडित के पास रहकर वृन्द ने साहित्य,
>> दर्शन आदि विविध विधयों का ज्ञान प्राप्त किया। काशी में इन्होंने व्याकरण,
>> साहित्य, वेदान्त, गणित आदि का ज्ञान प्राप्त किया और काव्य रचना सीखी।
>>
>> मुगल सम्राट औरंगजेब के यहाँ ये दरबारी कवि रहे। मेड़ते वापस आने पर जसवन्त
>> सिंह के प्रयास से औरंगजेब के कृपापात्र नवाब मोहम्मद खाँ के माध्यम से वृन्द
>> का प्रवेश शाही दरवार में हो गया़। दरबार में "पयोनिधि पर्यौ चाहे मिसिरी की
>> पुतरी" नामक समस्या की पूर्ति करके इन्होंने औरंगजेब को प्रसन्न कर दिया। उसने
>> वृन्द को अपने पौत्र अजी मुशशान का अध्यापक नियुक्त कर दिया। जब अजी मुशशान
>> बंगाल का शाशक हुआ तो वृन्द उसके साथ चले गए। सन् १७०७ में किशनगढ़ के राजा
>> राजसिंह ने अजी मुशशान से वृन्द को माँग लिया। सन् १७२३ में किशनगढ़ में ही
>> वृन्द का देहावसान हो गया।
>>
>> कृतियाँ :-
>>
>> वृन्द की ग्यारह रचनाएँ प्राप्त हैं- समेत शिखर छंद, भाव पंचाशिका, शृंगार
>> शिक्षा, पवन पचीसी, हितोपदेश सन्धि, वृन्द सतसई, वचनिका, सत्य स्वरूप, यमक
>> सतसई, हितोपदेशाष्टक, भारत कथा, वृन्द ग्रन्थावली नाम से वृन्द की समस्त
>> रचनाओं का एक संग्रह डॉ॰ जनार्दन राव चेले द्वारा संपादित होकर १९७१ ई० में
>> प्रकाश में आया है।
>>
>> इनके लिखे दोहे “वृन्द विनोद सतसई” में संकलित हैं। वृन्द के “बारहमासा” में
>> बारहों महीनों का सुन्दर वर्णन है। “भाव पंचासिका” में शृंगार के विभिन्न
>> भावों के अनुसार सरस छंद लिखे हैं। “शृंगार शिक्षा” में नायिका भेद के आधार पर
>> आभूषण और शृंगार के साथ नायिकाओं का चित्रण है। नयन पचीसी में नेत्रों के
>> महत्व का चित्रण है। इस रचना में दोहा, सवैया और घनाक्षरी छन्दों का प्रयोग
>> हुआ है। पवन पचीसी में ऋतु वर्णन है।
>>
>> हिन्दी में वृन्द के समान सुन्दर दोहे बहुत कम कवियों ने लिखे हैं। उनके
>> दोहों का प्रचार शहरों से लेकर गाँवों तक में है। पवन पचीसी में "षड्ऋतु
>> वर्णन" के अन्तर्गत वृन्द ने पवन के वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत और
>> शिशिर ऋतुओं के स्वरूप और प्रभाव का वर्णन किया है। वृन्द की रचनाएँ रीति
>> परम्परा की हैं। उनकी “नयन पचीसी” युगीन परम्परा से जुड़ी कृति हैं। इसमे
>> दोहा, सवैया और घनाक्षरी छंदों का प्रयोग हुआ है। इन छंदो का प्रभाव पाठकों पर
>> पड़ता है। “यमक सतसई” मे विविध प्रं कार से यमक अलंकार का स्वरूप स्पष्ट किया
>> गया हैं। इसके अन्तर्गत 715 छंद है।
>>
>> वृन्द के नीति के दोहे जन साधारण में बहुत प्रसिद्ध हैं। इन दोहों में
>> लोक-व्यवहार के अनेक अनुकरणीय सिद्धांत हैं। वृन्द कवि की रचनाएँ रीतिबद्ध
>> परम्परा में महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। इन्होंने सरल, सरस और विदग्ध सभी
>> प्रकार की काव्य रचनाएँ की हैं।
>>
>> हितहू की कहिये न तिहि, जो नर होय अबोध।ज्यों नकटे को आरसी, होत दिखाये
>> क्रोध।।कारज धीरै होतु है, क। है होत अधीर।समय पाय तरूवर फलै, केतक सींचो
>> नीर।।ओछे नर के पेट में, रहै न मोटी बात।आध सेर के पात्र में, कैसे सेर
>> समात।।कहा कहौं विधि को अविधि, भूले परे प्रबीन।मूरख को सम्पति दई, पंडित
>> सम्पतिहीन।।सरस्वति के भंडार की, बड़ी अपूरब बात।ज्यों खरचै त्यों-त्यों बढ़ै,
>> बिन खरचै घट जात।।छमा खड्ग लीने रहै, खल को कहा बसाय।अगिन परी तृनरहित थल,
>> आपहिं ते बुझि जाय।।
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