೨೦೧೬-೧೭ ನೇ ಸಾಲಿನ ನೀಲ ನಕ್ಷೆ ಕಳಸಿ
On Dec 15, 2016 10:15 AM, "vijayalaxmi Sutar" <[email protected]>
wrote:

> Dhanyavad sir
> On Dec 15, 2016 09:24, "maling Reshmi" <[email protected]> wrote:
>
>> Very nice sir
>>
>> On 13-Dec-2016 9:19 pm, "Shreenivas Naik" <shreenivasnaik.hindi.vogga@gm
>> ail.com> wrote:
>>
>>>
>>> *(१) करत-करत अभ्यास के, जड़मति होत सुजान। *
>>> *रसरी आवत जात तें, सिल पर परत निसान।। *
>>> *भावार्थ :-* कुए से पानी खींचने के लिए बर्तन से बाँधी हुई रस्सी कुए के
>>> किनारे पर रखे हुए पत्थर से बार -बार रगड़ खाने से पत्थर पर भी निशान बन जाते
>>> हैं। ठीक इसी प्रकार बार -बार अभ्यास करने से मंद बुद्धि व्यक्ति भी कई
>>> नई बातें सीख कर उनका जानकार हो जाता है।
>>>
>>> *(२) मूरख को हित के वचन, सुनि उपजत है कोप। *
>>> *साँपहि दूध पिवाइये, वाके मुख विष ओप।।*
>>> *भावार्थ :- *साँप को दूध पिलाने पर भी उसके मुख से विष ही निकलता है। इसी
>>> प्रकार मूर्ख व्यक्ति को उसके हित के वचन अर्थात उसकी भलाई की बात कही जाये,
>>> तो भी उसे क्रोध ही आता है।
>>>
>>> *(३) उत्तम विद्या लीजिये, यदपि नीच पै होय। *
>>> *परो अपावन ठौर में, कंचन तजत न कोय।। *
>>> *भावार्थ :-* अपवित्र या गन्दे स्थान पर पड़े होने पर भी सोने को कोई नहीं
>>> छोड़ता है। उसी प्रकार विद्या या ज्ञान चाहे नीच व्यक्ति के पास हो, उसे ग्रहण
>>> कर लेना चाहिए।
>>>
>>> *(४) अपनी पँहुच विचारि कै, करतब करिये दौर।*
>>> *तेते पाँव पसारिये, जेती लाँबी सौर।। *
>>> *भावार्थ :-* व्यक्ति के पास ओढने के लिए जितनी लम्बी कम्बल हो, उतने ही
>>> लम्बे पैर पसारने चाहिए। इसी प्रकार उसे अपने उपलब्ध साधनों के अनुरूप ही
>>> अपना कारोबार फैलाना चाहिए।
>>>
>>> *(५) उद्यम कबहुँ न छोड़िये, पर आसा के मोद। *
>>> *गागरि कैसे फोरिये, उनियो देखि पयोद। *
>>> *भावार्थ :-* कवि वृन्द कहते हैं कि बादलों को उमड़ा हुआ देख कर हमें अपने
>>> घड़े ( मिट्टी का बर्तन जिसे पानी भरने के लिए काम में लिया जाता है ) को नहीं
>>> फोड़ना चाहिये। इसी प्रकार दूसरे लोगों से कुछ प्राप्त हो जायेगा इस आशा में
>>> हमें अपने प्रयास कभी नहीं छोड़ना चाहिये।
>>>
>>> *(६) भले- बुरे सब एक से, जौ लौं बोलत नाहिं। *
>>> *जान परंतु है काक-पिक, रितु बसंत का माहिं।।*
>>> *भावार्थ :-*  जब तक कोई व्यक्ति बोलता नहीं है, तब तक उसके भले या बुरे
>>> होने का पता नहीं चलता है। जब वह बोलता है तब ज्ञात होता कि वह भला है या बुरा
>>> है। जैसे वसंत ऋतु आने पर जब कौवा और कोयल बोलते हैं, तब उनकी कडुवी और मीठी
>>> वाणी से ज्ञात हो जाता कि कौन बुरा है और कौन भला है।
>>>
>>> *(७) जो जाको गुन जानही, सो तिहि आदर देत। *
>>> *कोकिल अबरि लेत है, काग निबौरी लेत।।  *
>>> *भावार्थ - *जो व्यक्ति जिसके गुणों को जानता है, वह उसी के गुणों का आदर
>>> - सम्मान करता है। जैसे कोयल आम का रसास्वादन करती है और जबकि कौआ नीम की
>>> निम्बौरी से ही सन्तुष्ट हो जाता है।
>>>
>>> *(८) उत्तम विद्या लीजिये,जदपि नीच पाई होय। *
>>> *परयो  अपावन ठौर में, कंचन तजय न कोय।। *
>>> *भावार्थ - *जिस प्रकार स्वर्ण अपवित्र स्थान पर पड़ा हो, तो भी उसे कोई
>>> त्यागना नहीं चाहता है। ठीक उसी प्रकार उत्तम विद्या (अच्छा ज्ञान ) कहीं या
>>> किसी से भी मिले उसको ग्रहण कर लेना चाहिए, चाहे वह (उत्तम विद्या) अधम
>>> व्यक्ति के पास ही क्यों नहीं हो।
>>>
>>> *(९)  मन भावन के मिलन के, सुख को नहिन छोर। *
>>> *बोलि उठै, नचि- नचि उठै, मोर सुनत घनघोर।। *
>>> *भावार्थ -   *कवि वृन्द कहते हैं कि जैसे मोर बादलों की गर्जना सुन कर
>>> मधुर आवाज में बोलने और नाचने लगता है उसी प्रकार हमारे  मन को प्रिय लगने
>>> वाले व्यक्ति के मिलने पर हमें असीमित आनन्द की प्राप्ति होती है और हमारी
>>> प्रसन्नता की कोई सीमा नहीं रहती है।
>>>
>>> *(१०) निरस बात, सोई सरस, जहाँ होय हिय हेत। *
>>> *गारी प्यारी लगै, ज्यों-ज्यों समधन देत।।   *
>>> *भावार्थ -* कवि वृन्द कहते हैं, जिस व्यक्ति के प्रति हमारे ह्रदय में
>>> लगाव और स्नेह का भाव होता है, उस व्यक्ति की नीरस बात भी सरस लगने लगती हैं।
>>> जैसे समधिन के द्वारा दी जाने वाली गालियाँ भी अच्छी लगती हैं क्योंकि
>>> उन गालियों में स्नेह का भाव होता है।
>>>
>>> *(११) ऊँचे बैठे ना लहै, गुन बिन बड़पन कोइ। *
>>> *बैठो देवल सिखर पर, बायस गरुड़ न होइ। *
>>> *भावार्थ - *जिस प्रकार मंदिर के उच्च शिखर पर बैठा हुआ कौआ गरुड़ की
>>> साम्यता प्राप्त नहीं कर सकता, उसी प्रकार गुण रहित व्यक्ति उच्च आसन पर बैठने
>>> मात्र से ही उच्चता को प्राप्त नहीं कर सकता।
>>>
>>> *(१२) फेर न ह्वै हैं कपट सों, जो कीजे ब्यौपार। *
>>> *जैसे हाँडी काठ की, चढ़ै न दूजी बार। *
>>> भावार्थ -  जिस प्रकार लकड़ी से बनी हुई हाँडी (बर्तन) को दुबारा चूल्हे पर
>>> नहीं चढ़ाया जा सकता है , ठीक उसी प्रकार जो मनुष्य कपट पूर्वक व्यापार
>>> करता है , उसका व्यापार लम्बे समय तक नहीं चलता है। यही बात व्यक्ति
>>> के  वव्यहार और आचरण पर भी लागू  होती है।
>>>
>>> *(१३) नैना देत बताय सब, हिये को हेत अहेत। *
>>> *जैसे निरमल आरसी, भली-बुरी कही देत।। *
>>> भावार्थ - जिस प्रकार स्वच्छ दर्पण किसी व्यक्ति की वास्तविक छवि को बता
>>> देता है। उसी प्रकार किसी व्यक्ति के मन में दूसरे व्यक्ति के प्रति स्नेह का
>>> भाव है या द्वेष का भाव है , यह बात उसके नेत्रों को देख कर ही ज्ञात की जा
>>> सकती है।
>>>
>>> *(१४) सबै सहायक सबल के, कोउ न निबल सहाय। *
>>> *पवन जगावत आग कौ, दीपहिं देत बुझाय।। *
>>> भावार्थ - तीव्र हवा प्रज्वलित अग्नि को तो और अधिक प्रचंड बना देती है ,
>>> लेकिन वही हवा दीपक को बुझा देती है।  इस संसार का यही नियम है , बलवान
>>> व्यक्ति की सहायता करने के लिए तो कई लोग सामने आ जाते हैं , जबकि निर्बल का
>>> कोई सहायक नहीं होता है।
>>>
>>> *(१५) अति हठ मत कर, हठ बढ़ै, बात न करिहै कोय। *
>>> *ज्यौं- ज्यौं भीजै कामरी, त्यौं - त्यौं भारी होय। *
>>> *भावार्थ - *जिस प्रकार कम्बल के भीगते रहने से वह भारी होता जाता है -,
>>> उसी प्रकार किसी व्यक्ति के हठ या जिद करने से, उसका जिद्दीपन बढ़ता जाता है।
>>> तथा एक समय ऐसा आता कि लोग उसके हठी स्वभाव के कारण उससे बात करना भी पसंद
>>> नहीं करते हैं।
>>>
>>> On Dec 13, 2016 9:12 PM, wrote:
>>>
>>>> वृन्द (१६४३-१७२३) हिन्दी के कवि थे। रीतिकालीन परम्परा के अन्तर्गत वृन्द
>>>> का नाम आदर के साथ लिया जाता है। इनके नीति के दोहे बहुत प्रसिद्ध हैं।
>>>>
>>>> जीवन परिचय :-
>>>>
>>>> अन्य प्राचीन कवियों की भाँति वृन्द का जीवन परिचय भी प्रमाणिक नहीं है।
>>>> पं॰ रामनरेश त्रिपाठी इनका जन्म सन् 1643 में मथुरा (उ.प्र.) क्षेत्र के किसी
>>>> गाँव का बताते हैं, जबकि डॉ॰ नगेन्द्र ने मेड़ता गाँव को इनका जन्म स्थान माना
>>>> है। इनका पूरा नाम 'वृन्दावनदास' था। वृन्द जाति के सेवक अथवा भोजक थे। वृन्द
>>>> के पूर्वज बीकानेर के रहने वाले थे परन्तु इनके पिता रूप जी जोधपुर के
>>>> राज्यान्तर्गत मेड़ते में जा बसे थे। वहीं सन् १६४३ में वृन्द का जन्म हुआ था।
>>>> वृन्द की माता का नाम कौशल्या आर पत्नी का नाम नवरंगदे था। दस वर्ष की अवस्था
>>>> में ये काशी आये और तारा जी नामक एक पंडित के पास रहकर वृन्द ने साहित्य,
>>>> दर्शन आदि विविध विधयों का ज्ञान प्राप्त किया। काशी में इन्होंने व्याकरण,
>>>> साहित्य, वेदान्त, गणित आदि का ज्ञान प्राप्त किया और काव्य रचना सीखी।
>>>>
>>>> मुगल सम्राट औरंगजेब के यहाँ ये दरबारी कवि रहे। मेड़ते वापस आने पर
>>>> जसवन्त सिंह के प्रयास से औरंगजेब के कृपापात्र नवाब मोहम्मद खाँ के माध्यम से
>>>> वृन्द का प्रवेश शाही दरवार में हो गया़। दरबार में "पयोनिधि पर्यौ चाहे
>>>> मिसिरी की पुतरी" नामक समस्या की पूर्ति करके इन्होंने औरंगजेब को प्रसन्न कर
>>>> दिया। उसने वृन्द को अपने पौत्र अजी मुशशान का अध्यापक नियुक्त कर दिया। जब
>>>> अजी मुशशान बंगाल का शाशक हुआ तो वृन्द उसके साथ चले गए। सन् १७०७ में किशनगढ़
>>>> के राजा राजसिंह ने अजी मुशशान से वृन्द को माँग लिया। सन् १७२३ में किशनगढ़
>>>> में ही वृन्द का देहावसान हो गया।
>>>>
>>>> कृतियाँ :-
>>>>
>>>> वृन्द की ग्यारह रचनाएँ प्राप्त हैं- समेत शिखर छंद, भाव पंचाशिका, शृंगार
>>>> शिक्षा, पवन पचीसी, हितोपदेश सन्धि, वृन्द सतसई, वचनिका, सत्य स्वरूप, यमक
>>>> सतसई, हितोपदेशाष्टक, भारत कथा, वृन्द ग्रन्थावली नाम से वृन्द की समस्त
>>>> रचनाओं का एक संग्रह डॉ॰ जनार्दन राव चेले द्वारा संपादित होकर १९७१ ई० में
>>>> प्रकाश में आया है।
>>>>
>>>> इनके लिखे दोहे “वृन्द विनोद सतसई” में संकलित हैं। वृन्द के “बारहमासा”
>>>> में बारहों महीनों का सुन्दर वर्णन है। “भाव पंचासिका” में शृंगार के विभिन्न
>>>> भावों के अनुसार सरस छंद लिखे हैं। “शृंगार शिक्षा” में नायिका भेद के आधार पर
>>>> आभूषण और शृंगार के साथ नायिकाओं का चित्रण है। नयन पचीसी में नेत्रों के
>>>> महत्व का चित्रण है। इस रचना में दोहा, सवैया और घनाक्षरी छन्दों का प्रयोग
>>>> हुआ है। पवन पचीसी में ऋतु वर्णन है।
>>>>
>>>> हिन्दी में वृन्द के समान सुन्दर दोहे बहुत कम कवियों ने लिखे हैं। उनके
>>>> दोहों का प्रचार शहरों से लेकर गाँवों तक में है। पवन पचीसी में "षड्ऋतु
>>>> वर्णन" के अन्तर्गत वृन्द ने पवन के वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत और
>>>> शिशिर ऋतुओं के स्वरूप और प्रभाव का वर्णन किया है। वृन्द की रचनाएँ रीति
>>>> परम्परा की हैं। उनकी “नयन पचीसी” युगीन परम्परा से जुड़ी कृति हैं। इसमे
>>>> दोहा, सवैया और घनाक्षरी छंदों का प्रयोग हुआ है। इन छंदो का प्रभाव पाठकों पर
>>>> पड़ता है। “यमक सतसई” मे विविध प्रं कार से यमक अलंकार का स्वरूप स्पष्ट किया
>>>> गया हैं। इसके अन्तर्गत 715 छंद है।
>>>>
>>>> वृन्द के नीति के दोहे जन साधारण में बहुत प्रसिद्ध हैं। इन दोहों में
>>>> लोक-व्यवहार के अनेक अनुकरणीय सिद्धांत हैं। वृन्द कवि की रचनाएँ रीतिबद्ध
>>>> परम्परा में महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। इन्होंने सरल, सरस और विदग्ध सभी
>>>> प्रकार की काव्य रचनाएँ की हैं।
>>>>
>>>> हितहू की कहिये न तिहि, जो नर होय अबोध।ज्यों नकटे को आरसी, होत दिखाये
>>>> क्रोध।।कारज धीरै होतु है, क। है होत अधीर।समय पाय तरूवर फलै, केतक सींचो
>>>> नीर।।ओछे नर के पेट में, रहै न मोटी बात।आध सेर के पात्र में, कैसे सेर
>>>> समात।।कहा कहौं विधि को अविधि, भूले परे प्रबीन।मूरख को सम्पति दई, पंडित
>>>> सम्पतिहीन।।सरस्वति के भंडार की, बड़ी अपूरब बात।ज्यों खरचै त्यों-त्यों बढ़ै,
>>>> बिन खरचै घट जात।।छमा खड्ग लीने रहै, खल को कहा बसाय।अगिन परी तृनरहित थल,
>>>> आपहिं ते बुझि जाय।।
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