खडी बोली कविता के प्रथम महाकवि पण्डित अयोध्या सिंह उपाध्याय
 कवि-सम्राट अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ (१८६५-१९४७ ई.) राष्ट्रवाणी खडी
बोली हिंदी के प्रथम महा काव्यकार हैं। ‘प्रिय प्रवास’ (कृष्णकाव्य) ‘वैदेही
वनवास’ (रामकाव्य) उनके दो प्रमुख महाकाव्य हैं। हरिऔध हिन्दी के सूरदास के
रूप में सर्वत्र प्रसिद्ध हैं। वह हिंदी के गौरवशाली रचनाकार हैं। उन्होंने
कविता के अतिरिक्त नाटक, उपन्यास, आलोचना, पुस्तक भूमिका, आलेख आदि की रचना की
और अपना अमर स्थान सुनिर्मित किया। उनकी साहित्य साधना बहुमूल्य और प्रशस्य
है।
हरिऔध का जन्म आजमगढ जनपद के निजामाबाद उपनगर में हुआ। उनके पिता पण्डित भोला
सिंह उपाध्याय एक सम्मानित किसान थे। उनके बाबा सुमेर सिंह सिख हो गए थे।
उन्होंने युगानुरूप सर्व प्रथम रचनारम्भ बृजभाषा से किया। माता शारदा की उन पर
अनन्य कृपा थी। उनका ‘रसकलश’ नायिका भेद में देश सेविकाओं, समाज सेविका,
प्रगति नव्यकाओं के कारण सदा उल्लेख्य हैं। पण्डित कृष्ण शंकर शुक्ल ने
‘आधुनिक हिन्दी साहित्य का इतिहास में’ ‘प्रिय-प्रवास’ को हिन्दी का
सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य माना है। कवि सुमित्रानंदन पंत ‘प्रिय पति। यह मेरा
प्राण प्यारा कहाँ है’ से प्रारम्भ यशोदा विलाप आँसू बहाते हुए पढा करते थे।
हरिऔध जी ने प्रचुर मात्रा में असाधारण साहित्य की रचना की है। उनका रचना दर्श
निम*वत उल्लेख्य हैः
नाटकः ‘प्रद्युम* विजय’ (१८९३ ई.) ‘रूक्मिणी परिणय’ (१८९४ ई.)
उपन्यासः ‘प्रेमकान्ता’ (१८९१ ई.) ‘ठेठ हिंदी का ठाठ’ (१८९० ई.) ‘अधखिला फूल’
(१९०७ ई.) आदि।
संकलनः कबीर वचनावली की भूमिका, हिन्दी भाषा और साहित्य का विकास की भूमिका।
काव्यः ‘रसिक रहस्य’ (१८८९ ई.) ‘वैदेही बनवास’ (१९४० ई.)
‘प्रेमाम्म्भुवारिधि’, ‘प्रेम प्रपंच’, ‘प्रेमाम्बु प्रस्रवण’, ‘प्रेम
पुष्पहार’, ‘उद्बोधन’, ‘काव्योपवन’, ‘कृतुमुकुर’ ‘पदम-प्रसून’, ‘पदम प्रमोद’,
‘चोखे चौपदे’, ‘चुभते चौपदे’ इत्यादि।
बाल कविता- संकलनः पारिजात, ‘बोलचाल’, ‘बाल कवितावली’ आदि। अयोध्या सिंह
उपाध्याय हरिऔध जी ने बच्चों के लिए बहुत रोचक और शिक्षाप्रद कविताएँ लिखी
हैं। हिन्दी के प्रसिद्ध बाल काव्य प्रणेताओं में हरिऔध जी का प्रमुख स्थान
है।
प्रिय प्रवास खडी बोली का प्रथम महाकाव्य है जो औपचारिकता (मंगलाचरण अपालन)
में जयशंकर प्रसाद की कामायनी, आदर्शवादिता में राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त
कृत साकेत को प्रभावित करने वाली प्रथम रचना है। निश्चय ही इसे अनूप शर्मा के
‘सिद्धार्थ’ तथा ‘वर्द्धमान’, द्वारका प्रसाद मिश्र के संस्कृतनिष्ठ- अवधी
महाकाव्य ‘कृष्णायन’ का प्रेरक ग्रंथ माना जाता है। यह कृति अपनी अनूठी
काव्यात्मकता, प्रतीक-पद्धति एवं दार्शनिकता के कारण एक श्रेष्ठ महाकाव्य है।
इसका प्रभाव न्याय की नव्यता के कारण वल्देव प्रसाद मिश्र (साकेत-संत)
बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ (उर्मिला) नरेश मेहता (संशय की एक रात) डॉ. रामकुमार
वर्मा (ओ अहल्या) लक्ष्मीशंकर मिश्र निशंक (सुमित्रा, विभीषण) से यह श्रेष्ठ
महाकाव्य माना गया है। रसविभूति एवं भाषा प्रांजल्य के कारण इसे ‘लोकायतन’
(पन्त) ‘पुरुषोत्तम’ (डॉ. राम प्रसाद मिश्र) ‘श्रीकृष्ण’ (दिनेश) ‘उर्वशी’
(दिनकर) ‘उर्मिला’ (नवीन) से श्रेष्ठ महाकाव्य स्वीकार किया जाता है।
प्रिय प्रवास सत्रह सर्गीय महाकाव्य है। इसमें तथा उनके अन्य महाकाव्य ‘वैदेही
वनवास’ में रचनाकार ने मंगलाचरण का उपयोग नहीं किया। कृति नव्यता से आपूर्ण,
आरम्भ वस्तु निर्देशात्मक जिसके प्रमुख नायक लोकरक्षक, लोकनायक श्रीकृष्ण,
श्री राधा स्वकीया जन सेवारत हैं तथा श्रीदामा इत्यादि कृष्ण-सखा जीवंत पात्र
हैं। ग्रंथ की कथावस्तु के अनुकूल सुन्दर तथा उत्कृष्ट प्रारम्भ जैसा
‘प्रिय-प्रवास’ का हुआ उतना हिन्दी के किसी दूसरे काव्य का नहीं। निम* उदाहरण
अवलोकनीय है ः
‘दिवस का अवसान समीप था।
गगन था कुछ लोहित हो चला।।
तरुशिखा पर थी अब राजती।
कमलिनी-कुल-बल्लभ की प्रभा।।’
कृति के प्रथम सर्ग में श्रीकृष्ण के उत्कृष्ट रूप चरित्र तथा स्वभाग की
महत्ता की झांकी दिखाकर कवि ने ब्रज-निवासियों के उन पर अपार स्नेह का
चित्रांकन किया है। द्वितीय सर्ग में अक्रूर-आगमन एवं कृष्ण के मथुरा ले जाने
की घोषणा से यह प्रेम आशंकाओं से पुष्ट हो गया है। प्रिय प्रवास का तृतीय सर्ग
आसन्न-वात्सल्य-वियोग की दृष्टि से हिन्दी साहित्य में अन्यतम है। उन्होंने
मथुरा-प्रस्थान से पूर्व नन्द बाबा की व्यथा का जैसा सजीव चित्र खींचा है,
वैसा अन्य कोई कवि आज तक नहीं खींच सका। निम* उदाहरण इस दृष्टि से समीचीन है ः
‘सित हुए आने मुख लोभ को। कर गहे दुख-व्यंजक भाव से।।
विषम संकट बीच पडे हुए। विलखते चुपाचात ब्रजेश थे। हृदय निर्गत वाष्प समूह
से।। सजल थे युग लोचन हो रहे।। वदन से उनके चुपचाप ही। निकली अति तप्त उसाँस
थी।। शक्ति हो अति चंचल नेत्र से। छत कभी वह थे अवलोकते।।
टहलते फिरते सविषाद थे। वह कभी निज निर्जन कक्ष में। जब कभी बढती उर की व्यथा।
निकट जा करके तब द्वार के ।। वह रहे नभ नीरव देखते। निशि-घटी अवधारणा के
लिए।।’
यशोदा का जैसा चित्र प्रिय-प्रवास में मिलता है वैसा अन्यत्र कहीं नहीं। उनका
साश्रु निम* चित्र अद्वितीय यह है ः
‘हरि न जाग उठें इस सोच से।
सिसकती सक भी वह थी नहीं।।
इसलिए उनका दुख वेग से।
हृदय था शतधा अब हो रहा।।’
चतुर्थ सर्ग में प्रस्तुत नायिका राधा का स्वाभाविक चित्र दृष्टव्य है। पंचम
सर्ग में कृष्ण की सार्वभौमिकता एवं लोकप्रियता का चित्रण अभूतपूर्व है। हरिऔध
ने लोक जीवन में मुंडेरी पर बोलते काग का निम*ांकित पंक्तियों में बहुत रोचक
और प्रासंगिक वर्णन किया है ः
‘आके कागा यदि सदन में बैठता था कहीं भी।
तो तन्वंगी उस सदन की यों उसे थी सुनाती।।
जो आते हों कूँवरउड के काक जो बैठ जात।
मैं खाने को तुझे प्रतिदिन दूध औ भात दूंगी।।’
षष्ठ सर्ग में नायिका राधा पवनदूत से मथुरा जाकर कृष्ण को उसका स्मरण पवन दूत
कराने को कहती है। हनुमान नल, हंस, भ्रमर, मेघ, पवन इत्यादि विरहियों की भारी
सहायता कर चुके हैं। पवनदूत ‘आदर्श’ प्रधान ध्येय निष्ठ है।
सप्तम सर्ग के प्रारम्भ में मथुरा से कृष्ण बलराम सहित एकाकी लौटते नन्द का
ब्रज में आना अद्वितीयतापूर्वक चित्रित किया गया है ः
‘प्रिय पति। यह मेरा प्राण प्यारा कहाँ है।
दुख जलधि निमग*सा का सहारा कहाँ है।।
मुखरित करता जो सदम को था शुकों सा।
कलरव करता था जो खगों सा वनों में।।
सध्वनित पिक सा जो बाटिका को बनाता।
वह बहुविध कंठों का विधाता कहाँ है।।’
हरिऔध खडी बोली के सूरदास हैं। अष्टम सर्ग में सकल-ब्रज व्याप्त कृष्ण वियोग
व्यथा का जन्मादि-स्मृति माध्यम से ऐसा सुन्दर वर्णन किया गया जैसा कोई अन्य
कवि नहीं कर सका।
नवम-सर्ग में कृष्ण का उद्धव को मथुरा से ब्रजभूमि भेजना तथा उद्धव की यात्रा
के सन्दर्भ में अगणित एवं लताओं की सूची असफलता की द्योतक है। दशम सर्ग में
यशोदा की दयनीय दशा तथा उद्धव से उनके पुत्र वियोग का चित्र मर्मस्पर्शी है।
एकादश, द्वादश तथ त्रयोदश सर्गों में गोपों का कष्ण-वियोग प्रभावी और व्यापक
है ः
‘विपुल, ललित, लीलाधाम-आमोद प्याले,
संकल ललित-क्रीडा-कौशलों में विराजे।।
अनुपम वन माला को गले बीच डाले,
कब उमग मिलेंगे, लोक लार्वर्ण्य वाले।।
कब कुसुमित-कुंजों में बजेगी बता दो,
यह मधुमय प्यारी बांसुरी लाडिले की।।
कब कल-यमुना के कुल वृन्दावी में,
चित्त-पुलकितकारी, चारु आलाय होगा।।
चतुर्दशर्गगत उद्धव गोपी-संवाद में।
अनुराग वृत्ति पर बौद्धिकता के वर्चस्व
के कारण चिन्त्य बन गया है।
प्रिय प्रवास का पंचदश सर्ग विरह-वर्णन की दृष्टि
से सर्वोत्तम है जिसमें विरहिणी राधा का विशद
चित्रांकन सराहनीय है। विरह-संवेदना का निम* चित्र अवलोकनीय है ः’
‘मधुकर। सुन तेरी श्यामता है न वसी।
अति अनुपम जैसी श्याम के गात की है।।
पर जब आँखें देख लेती तुझे हैं।
तब, तब सुधि आती श्यामली मूर्ति की है।।
प्रियतम कटि में है सोहता वस्त्र वैसा।
गुन, गुन करता और गूंजना देख तेरा।
रसमय मुरली का नाद है याद आता।।’
षोडस सर्ग में कवि ने उद्धव सखा का कृष्ण-सन्देश तथा राधा का उत्तर लोक मंगल
के अतिरेक के रूप में
वर्णन किया है। अन्तिम सप्तदश सर्ग करुणा एवं निराशाभाव से परिपूर्ण तथा
सत्यम, शिवम् से प्रेरित एक सफल
महाकाव्य है।
हरिऔध का दूसरा प्रमुख महाकाव्य श्रीराम कथा पर आधारित ‘वैदेही वनवास’ (१९४०
ई.) है जिसकी प्रेरणा उन्हें वाल्मीकि तथा व्यास से मिली है। इस कृति में १८
सर्ग हैं। राम ने अयोध्या में सीता के लंका प्रवास से व्याप्त जन अंसतोष के
कारण भाइयों से मन्त्रणा, गुरु वशिष्ठ से परामर्श। सीता का अवध-परित्याग का
निर्णय लेकर तीन सर्गों में अवध-से वनगमन का प्रभावी वर्णन किया गया है। इस
प्रकार का कथानक कालिदास के ‘रघुवंशम्’ तथा भवभूति के ‘उत्तर राम चरितम’ में
मिलता है। कवि ने सीता का गृह त्याग अत्याधिक आदर्शवादी शैली में चित्रित किया
है जिसमें उनके कौसल्या, मांडवी आदि उपदेशवत भाषण दिए गए हैं। सीता के
प्रस्थान-काल श्रीराम तथा सीता के मानसिक द्वंद्व का मनोवैज्ञानिक चित्रण
देखते ही बनता है। दशम सर्ग में चन्द्रिका के प्रति सीता के वचन आदर्शक्रांत
हैं। एकादश सर्ग में मेघ को देखकर वे राम का स्मरण
करती हैं।
हरिऔध ने इसमें पर्वत, नदी, वन, वृक्ष, पशु, पक्षी, यज्ञ, पर्वत, पूजा, नदी
पूजा आदि का आदर्शवादी वर्णन किया है जो दृष्टव्य है ः
कलपेगा आकुल होता ही रहेगा।
व्यथित बनेगा, करेगा न मति को कहीं।।
निज बल्लभ को भूल न पाएगा कभी।
हृदय हृदय है सदा रहेगा हृदय ही।
कभी समीर नहीं होगा गति से रहित।
होगा सलित तरंगहीन न किसी समय।।
कभी अभाव न होगा भाव, विभाव का।
भावहीन होगा न कभी मनाव-हृदय।।
हरिऔध जी प्रयोगधर्मी कवि हैं। ‘प्रिय प्रवास’ में जहाँ संस्कृत-निष्ठ हिन्दी
का प्रयोग है वहीं उर्दू शैली का प्रयोग-प्रदर्शन कम नहीं है। ‘ठेठ हिंदी का
ठाठ’-संस्कृत-फारसी, अरबी, तुर्की-अंगे*जी इत्यादि भाषाओं के शब्दों का प्रयोग
दिखाई देता है। हरिऔध की प्रयोगशीतला का उदाहरण अवलोकनीय है ः
हम कहेंगे क्या कहेंगे यह सभी।
आँख के आंसू न ये होते अगर।।
बावले हम हो गए होते सभी।
सैकडों टुकडे हुआ होता जिगर।।
उन्होंने राष्ट्र प्रेम, मातृभूमि, ध्वजारोहण, राष्ट्र वंदनी,
स्वातंत्र्य-वेला, बलिदानियों को विषय बनाकर काव्य-वृष्टि की है। निम* उदाहरण
पठनार्थ समीचीन है ः
१. फरहरा हमारा था, नभ में फहराया।
सिर पर सुरपुर ने था प्रसून बरसाया।।
था रत्न हमें देता समुद्र लहराया।
था भूतल से कमनीय फूल, फल पाया।
हम-त्रिलोक में सुखित कौन बिखलाता।
था कभी हमारा यश बसुधा तले गाता।।
2. तेरा रहा नहीं है कब रंग-ढंग न्यारा।
कब था नहीं चमकता, भारत देश सितारा।
किसने भला नहीं कब जी में जगह तुझे दी।
किसका भला रहा है तू आँख कान तारा।
यह ज्ञान-ज्योति सबसे पहले जगी तुझी में। ?

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