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Headmaster dutys
On Mar 29, 2017 5:09 PM, "Kamakshi HN" <[email protected]> wrote:

> Sir next year books change होता है  य  नहीं
>
> On 28-Mar-2017 7:38 PM, "Shreenivas Naik" <shreenivasnaik.hindi.vogga@
> gmail.com> wrote:
>
>> खडी बोली कविता के प्रथम महाकवि पण्डित अयोध्या सिंह उपाध्याय
>>  कवि-सम्राट अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ (१८६५-१९४७ ई.) राष्ट्रवाणी खडी
>> बोली हिंदी के प्रथम महा काव्यकार हैं। ‘प्रिय प्रवास’ (कृष्णकाव्य) ‘वैदेही
>> वनवास’ (रामकाव्य) उनके दो प्रमुख महाकाव्य हैं। हरिऔध हिन्दी के सूरदास के
>> रूप में सर्वत्र प्रसिद्ध हैं। वह हिंदी के गौरवशाली रचनाकार हैं। उन्होंने
>> कविता के अतिरिक्त नाटक, उपन्यास, आलोचना, पुस्तक भूमिका, आलेख आदि की रचना की
>> और अपना अमर स्थान सुनिर्मित किया। उनकी साहित्य साधना बहुमूल्य और प्रशस्य
>> है।
>> हरिऔध का जन्म आजमगढ जनपद के निजामाबाद उपनगर में हुआ। उनके पिता पण्डित
>> भोला सिंह उपाध्याय एक सम्मानित किसान थे। उनके बाबा सुमेर सिंह सिख हो गए थे।
>> उन्होंने युगानुरूप सर्व प्रथम रचनारम्भ बृजभाषा से किया। माता शारदा की उन पर
>> अनन्य कृपा थी। उनका ‘रसकलश’ नायिका भेद में देश सेविकाओं, समाज सेविका,
>> प्रगति नव्यकाओं के कारण सदा उल्लेख्य हैं। पण्डित कृष्ण शंकर शुक्ल ने
>> ‘आधुनिक हिन्दी साहित्य का इतिहास में’ ‘प्रिय-प्रवास’ को हिन्दी का
>> सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य माना है। कवि सुमित्रानंदन पंत ‘प्रिय पति। यह मेरा
>> प्राण प्यारा कहाँ है’ से प्रारम्भ यशोदा विलाप आँसू बहाते हुए पढा करते थे।
>> हरिऔध जी ने प्रचुर मात्रा में असाधारण साहित्य की रचना की है। उनका रचना
>> दर्श निम*वत उल्लेख्य हैः
>> नाटकः ‘प्रद्युम* विजय’ (१८९३ ई.) ‘रूक्मिणी परिणय’ (१८९४ ई.)
>> उपन्यासः ‘प्रेमकान्ता’ (१८९१ ई.) ‘ठेठ हिंदी का ठाठ’ (१८९० ई.) ‘अधखिला
>> फूल’ (१९०७ ई.) आदि।
>> संकलनः कबीर वचनावली की भूमिका, हिन्दी भाषा और साहित्य का विकास की भूमिका।
>> काव्यः ‘रसिक रहस्य’ (१८८९ ई.) ‘वैदेही बनवास’ (१९४० ई.)
>> ‘प्रेमाम्म्भुवारिधि’, ‘प्रेम प्रपंच’, ‘प्रेमाम्बु प्रस्रवण’, ‘प्रेम
>> पुष्पहार’, ‘उद्बोधन’, ‘काव्योपवन’, ‘कृतुमुकुर’ ‘पदम-प्रसून’, ‘पदम प्रमोद’,
>> ‘चोखे चौपदे’, ‘चुभते चौपदे’ इत्यादि।
>> बाल कविता- संकलनः पारिजात, ‘बोलचाल’, ‘बाल कवितावली’ आदि। अयोध्या सिंह
>> उपाध्याय हरिऔध जी ने बच्चों के लिए बहुत रोचक और शिक्षाप्रद कविताएँ लिखी
>> हैं। हिन्दी के प्रसिद्ध बाल काव्य प्रणेताओं में हरिऔध जी का प्रमुख स्थान
>> है।
>> प्रिय प्रवास खडी बोली का प्रथम महाकाव्य है जो औपचारिकता (मंगलाचरण अपालन)
>> में जयशंकर प्रसाद की कामायनी, आदर्शवादिता में राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त
>> कृत साकेत को प्रभावित करने वाली प्रथम रचना है। निश्चय ही इसे अनूप शर्मा के
>> ‘सिद्धार्थ’ तथा ‘वर्द्धमान’, द्वारका प्रसाद मिश्र के संस्कृतनिष्ठ- अवधी
>> महाकाव्य ‘कृष्णायन’ का प्रेरक ग्रंथ माना जाता है। यह कृति अपनी अनूठी
>> काव्यात्मकता, प्रतीक-पद्धति एवं दार्शनिकता के कारण एक श्रेष्ठ महाकाव्य है।
>> इसका प्रभाव न्याय की नव्यता के कारण वल्देव प्रसाद मिश्र (साकेत-संत)
>> बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ (उर्मिला) नरेश मेहता (संशय की एक रात) डॉ. रामकुमार
>> वर्मा (ओ अहल्या) लक्ष्मीशंकर मिश्र निशंक (सुमित्रा, विभीषण) से यह श्रेष्ठ
>> महाकाव्य माना गया है। रसविभूति एवं भाषा प्रांजल्य के कारण इसे ‘लोकायतन’
>> (पन्त) ‘पुरुषोत्तम’ (डॉ. राम प्रसाद मिश्र) ‘श्रीकृष्ण’ (दिनेश) ‘उर्वशी’
>> (दिनकर) ‘उर्मिला’ (नवीन) से श्रेष्ठ महाकाव्य स्वीकार किया जाता है।
>> प्रिय प्रवास सत्रह सर्गीय महाकाव्य है। इसमें तथा उनके अन्य महाकाव्य
>> ‘वैदेही वनवास’ में रचनाकार ने मंगलाचरण का उपयोग नहीं किया। कृति नव्यता से
>> आपूर्ण, आरम्भ वस्तु निर्देशात्मक जिसके प्रमुख नायक लोकरक्षक, लोकनायक
>> श्रीकृष्ण, श्री राधा स्वकीया जन सेवारत हैं तथा श्रीदामा इत्यादि कृष्ण-सखा
>> जीवंत पात्र हैं। ग्रंथ की कथावस्तु के अनुकूल सुन्दर तथा उत्कृष्ट प्रारम्भ
>> जैसा ‘प्रिय-प्रवास’ का हुआ उतना हिन्दी के किसी दूसरे काव्य का नहीं। निम*
>> उदाहरण अवलोकनीय है ः
>> ‘दिवस का अवसान समीप था।
>> गगन था कुछ लोहित हो चला।।
>> तरुशिखा पर थी अब राजती।
>> कमलिनी-कुल-बल्लभ की प्रभा।।’
>> कृति के प्रथम सर्ग में श्रीकृष्ण के उत्कृष्ट रूप चरित्र तथा स्वभाग की
>> महत्ता की झांकी दिखाकर कवि ने ब्रज-निवासियों के उन पर अपार स्नेह का
>> चित्रांकन किया है। द्वितीय सर्ग में अक्रूर-आगमन एवं कृष्ण के मथुरा ले जाने
>> की घोषणा से यह प्रेम आशंकाओं से पुष्ट हो गया है। प्रिय प्रवास का तृतीय सर्ग
>> आसन्न-वात्सल्य-वियोग की दृष्टि से हिन्दी साहित्य में अन्यतम है। उन्होंने
>> मथुरा-प्रस्थान से पूर्व नन्द बाबा की व्यथा का जैसा सजीव चित्र खींचा है,
>> वैसा अन्य कोई कवि आज तक नहीं खींच सका। निम* उदाहरण इस दृष्टि से समीचीन है ः
>> ‘सित हुए आने मुख लोभ को। कर गहे दुख-व्यंजक भाव से।।
>> विषम संकट बीच पडे हुए। विलखते चुपाचात ब्रजेश थे। हृदय निर्गत वाष्प समूह
>> से।। सजल थे युग लोचन हो रहे।। वदन से उनके चुपचाप ही। निकली अति तप्त उसाँस
>> थी।। शक्ति हो अति चंचल नेत्र से। छत कभी वह थे अवलोकते।।
>> टहलते फिरते सविषाद थे। वह कभी निज निर्जन कक्ष में। जब कभी बढती उर की
>> व्यथा। निकट जा करके तब द्वार के ।। वह रहे नभ नीरव देखते। निशि-घटी अवधारणा
>> के लिए।।’
>> यशोदा का जैसा चित्र प्रिय-प्रवास में मिलता है वैसा अन्यत्र कहीं नहीं।
>> उनका साश्रु निम* चित्र अद्वितीय यह है ः
>> ‘हरि न जाग उठें इस सोच से।
>> सिसकती सक भी वह थी नहीं।।
>> इसलिए उनका दुख वेग से।
>> हृदय था शतधा अब हो रहा।।’
>> चतुर्थ सर्ग में प्रस्तुत नायिका राधा का स्वाभाविक चित्र दृष्टव्य है। पंचम
>> सर्ग में कृष्ण की सार्वभौमिकता एवं लोकप्रियता का चित्रण अभूतपूर्व है। हरिऔध
>> ने लोक जीवन में मुंडेरी पर बोलते काग का निम*ांकित पंक्तियों में बहुत रोचक
>> और प्रासंगिक वर्णन किया है ः
>> ‘आके कागा यदि सदन में बैठता था कहीं भी।
>> तो तन्वंगी उस सदन की यों उसे थी सुनाती।।
>> जो आते हों कूँवरउड के काक जो बैठ जात।
>> मैं खाने को तुझे प्रतिदिन दूध औ भात दूंगी।।’
>> षष्ठ सर्ग में नायिका राधा पवनदूत से मथुरा जाकर कृष्ण को उसका स्मरण पवन
>> दूत कराने को कहती है। हनुमान नल, हंस, भ्रमर, मेघ, पवन इत्यादि विरहियों की
>> भारी सहायता कर चुके हैं। पवनदूत ‘आदर्श’ प्रधान ध्येय निष्ठ है।
>> सप्तम सर्ग के प्रारम्भ में मथुरा से कृष्ण बलराम सहित एकाकी लौटते नन्द का
>> ब्रज में आना अद्वितीयतापूर्वक चित्रित किया गया है ः
>> ‘प्रिय पति। यह मेरा प्राण प्यारा कहाँ है।
>> दुख जलधि निमग*सा का सहारा कहाँ है।।
>> मुखरित करता जो सदम को था शुकों सा।
>> कलरव करता था जो खगों सा वनों में।।
>> सध्वनित पिक सा जो बाटिका को बनाता।
>> वह बहुविध कंठों का विधाता कहाँ है।।’
>> हरिऔध खडी बोली के सूरदास हैं। अष्टम सर्ग में सकल-ब्रज व्याप्त कृष्ण वियोग
>> व्यथा का जन्मादि-स्मृति माध्यम से ऐसा सुन्दर वर्णन किया गया जैसा कोई अन्य
>> कवि नहीं कर सका।
>> नवम-सर्ग में कृष्ण का उद्धव को मथुरा से ब्रजभूमि भेजना तथा उद्धव की
>> यात्रा के सन्दर्भ में अगणित एवं लताओं की सूची असफलता की द्योतक है। दशम सर्ग
>> में यशोदा की दयनीय दशा तथा उद्धव से उनके पुत्र वियोग का चित्र मर्मस्पर्शी
>> है। एकादश, द्वादश तथ त्रयोदश सर्गों में गोपों का कष्ण-वियोग प्रभावी और
>> व्यापक है ः
>> ‘विपुल, ललित, लीलाधाम-आमोद प्याले,
>> संकल ललित-क्रीडा-कौशलों में विराजे।।
>> अनुपम वन माला को गले बीच डाले,
>> कब उमग मिलेंगे, लोक लार्वर्ण्य वाले।।
>> कब कुसुमित-कुंजों में बजेगी बता दो,
>> यह मधुमय प्यारी बांसुरी लाडिले की।।
>> कब कल-यमुना के कुल वृन्दावी में,
>> चित्त-पुलकितकारी, चारु आलाय होगा।।
>> चतुर्दशर्गगत उद्धव गोपी-संवाद में।
>> अनुराग वृत्ति पर बौद्धिकता के वर्चस्व
>> के कारण चिन्त्य बन गया है।
>> प्रिय प्रवास का पंचदश सर्ग विरह-वर्णन की दृष्टि
>> से सर्वोत्तम है जिसमें विरहिणी राधा का विशद
>> चित्रांकन सराहनीय है। विरह-संवेदना का निम* चित्र अवलोकनीय है ः’
>> ‘मधुकर। सुन तेरी श्यामता है न वसी।
>> अति अनुपम जैसी श्याम के गात की है।।
>> पर जब आँखें देख लेती तुझे हैं।
>> तब, तब सुधि आती श्यामली मूर्ति की है।।
>> प्रियतम कटि में है सोहता वस्त्र वैसा।
>> गुन, गुन करता और गूंजना देख तेरा।
>> रसमय मुरली का नाद है याद आता।।’
>> षोडस सर्ग में कवि ने उद्धव सखा का कृष्ण-सन्देश तथा राधा का उत्तर लोक मंगल
>> के अतिरेक के रूप में
>> वर्णन किया है। अन्तिम सप्तदश सर्ग करुणा एवं निराशाभाव से परिपूर्ण तथा
>> सत्यम, शिवम् से प्रेरित एक सफल
>> महाकाव्य है।
>> हरिऔध का दूसरा प्रमुख महाकाव्य श्रीराम कथा पर आधारित ‘वैदेही वनवास’ (१९४०
>> ई.) है जिसकी प्रेरणा उन्हें वाल्मीकि तथा व्यास से मिली है। इस कृति में १८
>> सर्ग हैं। राम ने अयोध्या में सीता के लंका प्रवास से व्याप्त जन अंसतोष के
>> कारण भाइयों से मन्त्रणा, गुरु वशिष्ठ से परामर्श। सीता का अवध-परित्याग का
>> निर्णय लेकर तीन सर्गों में अवध-से वनगमन का प्रभावी वर्णन किया गया है। इस
>> प्रकार का कथानक कालिदास के ‘रघुवंशम्’ तथा भवभूति के ‘उत्तर राम चरितम’ में
>> मिलता है। कवि ने सीता का गृह त्याग अत्याधिक आदर्शवादी शैली में चित्रित किया
>> है जिसमें उनके कौसल्या, मांडवी आदि उपदेशवत भाषण दिए गए हैं। सीता के
>> प्रस्थान-काल श्रीराम तथा सीता के मानसिक द्वंद्व का मनोवैज्ञानिक चित्रण
>> देखते ही बनता है। दशम सर्ग में चन्द्रिका के प्रति सीता के वचन आदर्शक्रांत
>> हैं। एकादश सर्ग में मेघ को देखकर वे राम का स्मरण
>> करती हैं।
>> हरिऔध ने इसमें पर्वत, नदी, वन, वृक्ष, पशु, पक्षी, यज्ञ, पर्वत, पूजा, नदी
>> पूजा आदि का आदर्शवादी वर्णन किया है जो दृष्टव्य है ः
>> कलपेगा आकुल होता ही रहेगा।
>> व्यथित बनेगा, करेगा न मति को कहीं।।
>> निज बल्लभ को भूल न पाएगा कभी।
>> हृदय हृदय है सदा रहेगा हृदय ही।
>> कभी समीर नहीं होगा गति से रहित।
>> होगा सलित तरंगहीन न किसी समय।।
>> कभी अभाव न होगा भाव, विभाव का।
>> भावहीन होगा न कभी मनाव-हृदय।।
>> हरिऔध जी प्रयोगधर्मी कवि हैं। ‘प्रिय प्रवास’ में जहाँ संस्कृत-निष्ठ
>> हिन्दी का प्रयोग है वहीं उर्दू शैली का प्रयोग-प्रदर्शन कम नहीं है। ‘ठेठ
>> हिंदी का ठाठ’-संस्कृत-फारसी, अरबी, तुर्की-अंगे*जी इत्यादि भाषाओं के शब्दों
>> का प्रयोग दिखाई देता है। हरिऔध की प्रयोगशीतला का उदाहरण अवलोकनीय है ः
>> हम कहेंगे क्या कहेंगे यह सभी।
>> आँख के आंसू न ये होते अगर।।
>> बावले हम हो गए होते सभी।
>> सैकडों टुकडे हुआ होता जिगर।।
>> उन्होंने राष्ट्र प्रेम, मातृभूमि, ध्वजारोहण, राष्ट्र वंदनी,
>> स्वातंत्र्य-वेला, बलिदानियों को विषय बनाकर काव्य-वृष्टि की है। निम* उदाहरण
>> पठनार्थ समीचीन है ः
>> १. फरहरा हमारा था, नभ में फहराया।
>> सिर पर सुरपुर ने था प्रसून बरसाया।।
>> था रत्न हमें देता समुद्र लहराया।
>> था भूतल से कमनीय फूल, फल पाया।
>> हम-त्रिलोक में सुखित कौन बिखलाता।
>> था कभी हमारा यश बसुधा तले गाता।।
>> 2. तेरा रहा नहीं है कब रंग-ढंग न्यारा।
>> कब था नहीं चमकता, भारत देश सितारा।
>> किसने भला नहीं कब जी में जगह तुझे दी।
>> किसका भला रहा है तू आँख कान तारा।
>> यह ज्ञान-ज्योति सबसे पहले जगी तुझी में। ?
>>
>> --
>> -----------
>> 1.ವಿಷಯ ಶಿಕ್ಷಕರ ವೇದಿಕೆಗೆ ಶಿಕ್ಷಕರನ್ನು ಸೇರಿಸಲು ಈ ಅರ್ಜಿಯನ್ನು ತುಂಬಿರಿ.
>> - https://docs.google.com/forms/d/1Iv5fotalJsERorsuN5v5yHGuKrm
>> pFXStxBwQSYXNbzI/viewform
>> 2. ಇಮೇಲ್ ಕಳುಹಿಸುವಾಗ ಗಮನಿಸಬೇಕಾದ ಕೆಲವು ಮಾರ್ಗಸೂಚಿಗಳನ್ನು ಇಲ್ಲಿ ನೋಡಿ.
>> -http://karnatakaeducation.org.in/KOER/index.php/ವಿಷಯಶಿಕ್ಷಕರ
>> ವೇದಿಕೆ_ಸದಸ್ಯರ_ಇಮೇಲ್_ಮಾರ್ಗಸೂಚಿ
>> 3. ಐ.ಸಿ.ಟಿ ಸಾಕ್ಷರತೆ ಬಗೆಗೆ ಯಾವುದೇ ರೀತಿಯ ಪ್ರಶ್ನೆಗಳಿದ್ದಲ್ಲಿ ಈ ಪುಟಕ್ಕೆ ಭೇಟಿ
>> ನೀಡಿ -
>> http://karnatakaeducation.org.in/KOER/en/index.php/Portal:ICT_Literacy
>> 4.ನೀವು ಸಾರ್ವಜನಿಕ ತಂತ್ರಾಂಶ ಬಳಸುತ್ತಿದ್ದೀರಾ ? ಸಾರ್ವಜನಿಕ ತಂತ್ರಾಂಶದ ಬಗ್ಗೆ
>> ತಿಳಿಯಲು -http://karnatakaeducation.org.in/KOER/en/index.php/Public_
>> Software
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> 1.ವಿಷಯ ಶಿಕ್ಷಕರ ವೇದಿಕೆಗೆ ಶಿಕ್ಷಕರನ್ನು ಸೇರಿಸಲು ಈ ಅರ್ಜಿಯನ್ನು ತುಂಬಿರಿ.
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> 2. ಇಮೇಲ್ ಕಳುಹಿಸುವಾಗ ಗಮನಿಸಬೇಕಾದ ಕೆಲವು ಮಾರ್ಗಸೂಚಿಗಳನ್ನು ಇಲ್ಲಿ ನೋಡಿ.
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> ಷಕರವೇದಿಕೆ_ಸದಸ್ಯರ_ಇಮೇಲ್_ಮಾರ್ಗಸೂಚಿ
> 3. ಐ.ಸಿ.ಟಿ ಸಾಕ್ಷರತೆ ಬಗೆಗೆ ಯಾವುದೇ ರೀತಿಯ ಪ್ರಶ್ನೆಗಳಿದ್ದಲ್ಲಿ ಈ ಪುಟಕ್ಕೆ ಭೇಟಿ
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