Sir next year books change होता है य नहीं On 28-Mar-2017 7:38 PM, "Shreenivas Naik" < [email protected]> wrote:
> खडी बोली कविता के प्रथम महाकवि पण्डित अयोध्या सिंह उपाध्याय > कवि-सम्राट अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ (१८६५-१९४७ ई.) राष्ट्रवाणी खडी > बोली हिंदी के प्रथम महा काव्यकार हैं। ‘प्रिय प्रवास’ (कृष्णकाव्य) ‘वैदेही > वनवास’ (रामकाव्य) उनके दो प्रमुख महाकाव्य हैं। हरिऔध हिन्दी के सूरदास के > रूप में सर्वत्र प्रसिद्ध हैं। वह हिंदी के गौरवशाली रचनाकार हैं। उन्होंने > कविता के अतिरिक्त नाटक, उपन्यास, आलोचना, पुस्तक भूमिका, आलेख आदि की रचना की > और अपना अमर स्थान सुनिर्मित किया। उनकी साहित्य साधना बहुमूल्य और प्रशस्य > है। > हरिऔध का जन्म आजमगढ जनपद के निजामाबाद उपनगर में हुआ। उनके पिता पण्डित भोला > सिंह उपाध्याय एक सम्मानित किसान थे। उनके बाबा सुमेर सिंह सिख हो गए थे। > उन्होंने युगानुरूप सर्व प्रथम रचनारम्भ बृजभाषा से किया। माता शारदा की उन पर > अनन्य कृपा थी। उनका ‘रसकलश’ नायिका भेद में देश सेविकाओं, समाज सेविका, > प्रगति नव्यकाओं के कारण सदा उल्लेख्य हैं। पण्डित कृष्ण शंकर शुक्ल ने > ‘आधुनिक हिन्दी साहित्य का इतिहास में’ ‘प्रिय-प्रवास’ को हिन्दी का > सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य माना है। कवि सुमित्रानंदन पंत ‘प्रिय पति। यह मेरा > प्राण प्यारा कहाँ है’ से प्रारम्भ यशोदा विलाप आँसू बहाते हुए पढा करते थे। > हरिऔध जी ने प्रचुर मात्रा में असाधारण साहित्य की रचना की है। उनका रचना > दर्श निम*वत उल्लेख्य हैः > नाटकः ‘प्रद्युम* विजय’ (१८९३ ई.) ‘रूक्मिणी परिणय’ (१८९४ ई.) > उपन्यासः ‘प्रेमकान्ता’ (१८९१ ई.) ‘ठेठ हिंदी का ठाठ’ (१८९० ई.) ‘अधखिला फूल’ > (१९०७ ई.) आदि। > संकलनः कबीर वचनावली की भूमिका, हिन्दी भाषा और साहित्य का विकास की भूमिका। > काव्यः ‘रसिक रहस्य’ (१८८९ ई.) ‘वैदेही बनवास’ (१९४० ई.) > ‘प्रेमाम्म्भुवारिधि’, ‘प्रेम प्रपंच’, ‘प्रेमाम्बु प्रस्रवण’, ‘प्रेम > पुष्पहार’, ‘उद्बोधन’, ‘काव्योपवन’, ‘कृतुमुकुर’ ‘पदम-प्रसून’, ‘पदम प्रमोद’, > ‘चोखे चौपदे’, ‘चुभते चौपदे’ इत्यादि। > बाल कविता- संकलनः पारिजात, ‘बोलचाल’, ‘बाल कवितावली’ आदि। अयोध्या सिंह > उपाध्याय हरिऔध जी ने बच्चों के लिए बहुत रोचक और शिक्षाप्रद कविताएँ लिखी > हैं। हिन्दी के प्रसिद्ध बाल काव्य प्रणेताओं में हरिऔध जी का प्रमुख स्थान > है। > प्रिय प्रवास खडी बोली का प्रथम महाकाव्य है जो औपचारिकता (मंगलाचरण अपालन) > में जयशंकर प्रसाद की कामायनी, आदर्शवादिता में राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त > कृत साकेत को प्रभावित करने वाली प्रथम रचना है। निश्चय ही इसे अनूप शर्मा के > ‘सिद्धार्थ’ तथा ‘वर्द्धमान’, द्वारका प्रसाद मिश्र के संस्कृतनिष्ठ- अवधी > महाकाव्य ‘कृष्णायन’ का प्रेरक ग्रंथ माना जाता है। यह कृति अपनी अनूठी > काव्यात्मकता, प्रतीक-पद्धति एवं दार्शनिकता के कारण एक श्रेष्ठ महाकाव्य है। > इसका प्रभाव न्याय की नव्यता के कारण वल्देव प्रसाद मिश्र (साकेत-संत) > बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ (उर्मिला) नरेश मेहता (संशय की एक रात) डॉ. रामकुमार > वर्मा (ओ अहल्या) लक्ष्मीशंकर मिश्र निशंक (सुमित्रा, विभीषण) से यह श्रेष्ठ > महाकाव्य माना गया है। रसविभूति एवं भाषा प्रांजल्य के कारण इसे ‘लोकायतन’ > (पन्त) ‘पुरुषोत्तम’ (डॉ. राम प्रसाद मिश्र) ‘श्रीकृष्ण’ (दिनेश) ‘उर्वशी’ > (दिनकर) ‘उर्मिला’ (नवीन) से श्रेष्ठ महाकाव्य स्वीकार किया जाता है। > प्रिय प्रवास सत्रह सर्गीय महाकाव्य है। इसमें तथा उनके अन्य महाकाव्य > ‘वैदेही वनवास’ में रचनाकार ने मंगलाचरण का उपयोग नहीं किया। कृति नव्यता से > आपूर्ण, आरम्भ वस्तु निर्देशात्मक जिसके प्रमुख नायक लोकरक्षक, लोकनायक > श्रीकृष्ण, श्री राधा स्वकीया जन सेवारत हैं तथा श्रीदामा इत्यादि कृष्ण-सखा > जीवंत पात्र हैं। ग्रंथ की कथावस्तु के अनुकूल सुन्दर तथा उत्कृष्ट प्रारम्भ > जैसा ‘प्रिय-प्रवास’ का हुआ उतना हिन्दी के किसी दूसरे काव्य का नहीं। निम* > उदाहरण अवलोकनीय है ः > ‘दिवस का अवसान समीप था। > गगन था कुछ लोहित हो चला।। > तरुशिखा पर थी अब राजती। > कमलिनी-कुल-बल्लभ की प्रभा।।’ > कृति के प्रथम सर्ग में श्रीकृष्ण के उत्कृष्ट रूप चरित्र तथा स्वभाग की > महत्ता की झांकी दिखाकर कवि ने ब्रज-निवासियों के उन पर अपार स्नेह का > चित्रांकन किया है। द्वितीय सर्ग में अक्रूर-आगमन एवं कृष्ण के मथुरा ले जाने > की घोषणा से यह प्रेम आशंकाओं से पुष्ट हो गया है। प्रिय प्रवास का तृतीय सर्ग > आसन्न-वात्सल्य-वियोग की दृष्टि से हिन्दी साहित्य में अन्यतम है। उन्होंने > मथुरा-प्रस्थान से पूर्व नन्द बाबा की व्यथा का जैसा सजीव चित्र खींचा है, > वैसा अन्य कोई कवि आज तक नहीं खींच सका। निम* उदाहरण इस दृष्टि से समीचीन है ः > ‘सित हुए आने मुख लोभ को। कर गहे दुख-व्यंजक भाव से।। > विषम संकट बीच पडे हुए। विलखते चुपाचात ब्रजेश थे। हृदय निर्गत वाष्प समूह > से।। सजल थे युग लोचन हो रहे।। वदन से उनके चुपचाप ही। निकली अति तप्त उसाँस > थी।। शक्ति हो अति चंचल नेत्र से। छत कभी वह थे अवलोकते।। > टहलते फिरते सविषाद थे। वह कभी निज निर्जन कक्ष में। जब कभी बढती उर की > व्यथा। निकट जा करके तब द्वार के ।। वह रहे नभ नीरव देखते। निशि-घटी अवधारणा > के लिए।।’ > यशोदा का जैसा चित्र प्रिय-प्रवास में मिलता है वैसा अन्यत्र कहीं नहीं। उनका > साश्रु निम* चित्र अद्वितीय यह है ः > ‘हरि न जाग उठें इस सोच से। > सिसकती सक भी वह थी नहीं।। > इसलिए उनका दुख वेग से। > हृदय था शतधा अब हो रहा।।’ > चतुर्थ सर्ग में प्रस्तुत नायिका राधा का स्वाभाविक चित्र दृष्टव्य है। पंचम > सर्ग में कृष्ण की सार्वभौमिकता एवं लोकप्रियता का चित्रण अभूतपूर्व है। हरिऔध > ने लोक जीवन में मुंडेरी पर बोलते काग का निम*ांकित पंक्तियों में बहुत रोचक > और प्रासंगिक वर्णन किया है ः > ‘आके कागा यदि सदन में बैठता था कहीं भी। > तो तन्वंगी उस सदन की यों उसे थी सुनाती।। > जो आते हों कूँवरउड के काक जो बैठ जात। > मैं खाने को तुझे प्रतिदिन दूध औ भात दूंगी।।’ > षष्ठ सर्ग में नायिका राधा पवनदूत से मथुरा जाकर कृष्ण को उसका स्मरण पवन दूत > कराने को कहती है। हनुमान नल, हंस, भ्रमर, मेघ, पवन इत्यादि विरहियों की भारी > सहायता कर चुके हैं। पवनदूत ‘आदर्श’ प्रधान ध्येय निष्ठ है। > सप्तम सर्ग के प्रारम्भ में मथुरा से कृष्ण बलराम सहित एकाकी लौटते नन्द का > ब्रज में आना अद्वितीयतापूर्वक चित्रित किया गया है ः > ‘प्रिय पति। यह मेरा प्राण प्यारा कहाँ है। > दुख जलधि निमग*सा का सहारा कहाँ है।। > मुखरित करता जो सदम को था शुकों सा। > कलरव करता था जो खगों सा वनों में।। > सध्वनित पिक सा जो बाटिका को बनाता। > वह बहुविध कंठों का विधाता कहाँ है।।’ > हरिऔध खडी बोली के सूरदास हैं। अष्टम सर्ग में सकल-ब्रज व्याप्त कृष्ण वियोग > व्यथा का जन्मादि-स्मृति माध्यम से ऐसा सुन्दर वर्णन किया गया जैसा कोई अन्य > कवि नहीं कर सका। > नवम-सर्ग में कृष्ण का उद्धव को मथुरा से ब्रजभूमि भेजना तथा उद्धव की यात्रा > के सन्दर्भ में अगणित एवं लताओं की सूची असफलता की द्योतक है। दशम सर्ग में > यशोदा की दयनीय दशा तथा उद्धव से उनके पुत्र वियोग का चित्र मर्मस्पर्शी है। > एकादश, द्वादश तथ त्रयोदश सर्गों में गोपों का कष्ण-वियोग प्रभावी और व्यापक > है ः > ‘विपुल, ललित, लीलाधाम-आमोद प्याले, > संकल ललित-क्रीडा-कौशलों में विराजे।। > अनुपम वन माला को गले बीच डाले, > कब उमग मिलेंगे, लोक लार्वर्ण्य वाले।। > कब कुसुमित-कुंजों में बजेगी बता दो, > यह मधुमय प्यारी बांसुरी लाडिले की।। > कब कल-यमुना के कुल वृन्दावी में, > चित्त-पुलकितकारी, चारु आलाय होगा।। > चतुर्दशर्गगत उद्धव गोपी-संवाद में। > अनुराग वृत्ति पर बौद्धिकता के वर्चस्व > के कारण चिन्त्य बन गया है। > प्रिय प्रवास का पंचदश सर्ग विरह-वर्णन की दृष्टि > से सर्वोत्तम है जिसमें विरहिणी राधा का विशद > चित्रांकन सराहनीय है। विरह-संवेदना का निम* चित्र अवलोकनीय है ः’ > ‘मधुकर। सुन तेरी श्यामता है न वसी। > अति अनुपम जैसी श्याम के गात की है।। > पर जब आँखें देख लेती तुझे हैं। > तब, तब सुधि आती श्यामली मूर्ति की है।। > प्रियतम कटि में है सोहता वस्त्र वैसा। > गुन, गुन करता और गूंजना देख तेरा। > रसमय मुरली का नाद है याद आता।।’ > षोडस सर्ग में कवि ने उद्धव सखा का कृष्ण-सन्देश तथा राधा का उत्तर लोक मंगल > के अतिरेक के रूप में > वर्णन किया है। अन्तिम सप्तदश सर्ग करुणा एवं निराशाभाव से परिपूर्ण तथा > सत्यम, शिवम् से प्रेरित एक सफल > महाकाव्य है। > हरिऔध का दूसरा प्रमुख महाकाव्य श्रीराम कथा पर आधारित ‘वैदेही वनवास’ (१९४० > ई.) है जिसकी प्रेरणा उन्हें वाल्मीकि तथा व्यास से मिली है। इस कृति में १८ > सर्ग हैं। राम ने अयोध्या में सीता के लंका प्रवास से व्याप्त जन अंसतोष के > कारण भाइयों से मन्त्रणा, गुरु वशिष्ठ से परामर्श। सीता का अवध-परित्याग का > निर्णय लेकर तीन सर्गों में अवध-से वनगमन का प्रभावी वर्णन किया गया है। इस > प्रकार का कथानक कालिदास के ‘रघुवंशम्’ तथा भवभूति के ‘उत्तर राम चरितम’ में > मिलता है। कवि ने सीता का गृह त्याग अत्याधिक आदर्शवादी शैली में चित्रित किया > है जिसमें उनके कौसल्या, मांडवी आदि उपदेशवत भाषण दिए गए हैं। सीता के > प्रस्थान-काल श्रीराम तथा सीता के मानसिक द्वंद्व का मनोवैज्ञानिक चित्रण > देखते ही बनता है। दशम सर्ग में चन्द्रिका के प्रति सीता के वचन आदर्शक्रांत > हैं। एकादश सर्ग में मेघ को देखकर वे राम का स्मरण > करती हैं। > हरिऔध ने इसमें पर्वत, नदी, वन, वृक्ष, पशु, पक्षी, यज्ञ, पर्वत, पूजा, नदी > पूजा आदि का आदर्शवादी वर्णन किया है जो दृष्टव्य है ः > कलपेगा आकुल होता ही रहेगा। > व्यथित बनेगा, करेगा न मति को कहीं।। > निज बल्लभ को भूल न पाएगा कभी। > हृदय हृदय है सदा रहेगा हृदय ही। > कभी समीर नहीं होगा गति से रहित। > होगा सलित तरंगहीन न किसी समय।। > कभी अभाव न होगा भाव, विभाव का। > भावहीन होगा न कभी मनाव-हृदय।। > हरिऔध जी प्रयोगधर्मी कवि हैं। ‘प्रिय प्रवास’ में जहाँ संस्कृत-निष्ठ हिन्दी > का प्रयोग है वहीं उर्दू शैली का प्रयोग-प्रदर्शन कम नहीं है। ‘ठेठ हिंदी का > ठाठ’-संस्कृत-फारसी, अरबी, तुर्की-अंगे*जी इत्यादि भाषाओं के शब्दों का प्रयोग > दिखाई देता है। हरिऔध की प्रयोगशीतला का उदाहरण अवलोकनीय है ः > हम कहेंगे क्या कहेंगे यह सभी। > आँख के आंसू न ये होते अगर।। > बावले हम हो गए होते सभी। > सैकडों टुकडे हुआ होता जिगर।। > उन्होंने राष्ट्र प्रेम, मातृभूमि, ध्वजारोहण, राष्ट्र वंदनी, > स्वातंत्र्य-वेला, बलिदानियों को विषय बनाकर काव्य-वृष्टि की है। निम* उदाहरण > पठनार्थ समीचीन है ः > १. फरहरा हमारा था, नभ में फहराया। > सिर पर सुरपुर ने था प्रसून बरसाया।। > था रत्न हमें देता समुद्र लहराया। > था भूतल से कमनीय फूल, फल पाया। > हम-त्रिलोक में सुखित कौन बिखलाता। > था कभी हमारा यश बसुधा तले गाता।। > 2. तेरा रहा नहीं है कब रंग-ढंग न्यारा। > कब था नहीं चमकता, भारत देश सितारा। > किसने भला नहीं कब जी में जगह तुझे दी। > किसका भला रहा है तू आँख कान तारा। > यह ज्ञान-ज्योति सबसे पहले जगी तुझी में। ? > > -- > ----------- > 1.ವಿಷಯ ಶಿಕ್ಷಕರ ವೇದಿಕೆಗೆ ಶಿಕ್ಷಕರನ್ನು ಸೇರಿಸಲು ಈ ಅರ್ಜಿಯನ್ನು ತುಂಬಿರಿ. > - https://docs.google.com/forms/d/1Iv5fotalJsERorsuN5v5yHGuKrmpF > XStxBwQSYXNbzI/viewform > 2. ಇಮೇಲ್ ಕಳುಹಿಸುವಾಗ ಗಮನಿಸಬೇಕಾದ ಕೆಲವು ಮಾರ್ಗಸೂಚಿಗಳನ್ನು ಇಲ್ಲಿ ನೋಡಿ. > -http://karnatakaeducation.org.in/KOER/index.php/ವಿಷಯಶಿಕ್ > ಷಕರವೇದಿಕೆ_ಸದಸ್ಯರ_ಇಮೇಲ್_ಮಾರ್ಗಸೂಚಿ > 3. ಐ.ಸಿ.ಟಿ ಸಾಕ್ಷರತೆ ಬಗೆಗೆ ಯಾವುದೇ ರೀತಿಯ ಪ್ರಶ್ನೆಗಳಿದ್ದಲ್ಲಿ ಈ ಪುಟಕ್ಕೆ ಭೇಟಿ > ನೀಡಿ - > http://karnatakaeducation.org.in/KOER/en/index.php/Portal:ICT_Literacy > 4.ನೀವು ಸಾರ್ವಜನಿಕ ತಂತ್ರಾಂಶ ಬಳಸುತ್ತಿದ್ದೀರಾ ? ಸಾರ್ವಜನಿಕ ತಂತ್ರಾಂಶದ ಬಗ್ಗೆ > ತಿಳಿಯಲು -http://karnatakaeducation.org.in/KOER/en/index.php/ > Public_Software > ----------- > --- > You received this message because 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